भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान एक जटिल विषय है जो अर्थव्यवस्था की संरचना को समझने के लिए आवश्यक है। वर्ष 1977-78 से 2017-18 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में सभी क्षेत्रकों—प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक—के उत्पादन में वृद्धि हुई है, परंतु सबसे अधिक वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में दर्ज की गई है। वर्तमान में तृतीयक क्षेत्रक का सकल मूल्य वर्धन (जी.वी.ए.) में लगभग 50% से अधिक योगदान है, जबकि प्राथमिक क्षेत्रक का योगदान घटकर मात्र 16% रह गया है। रोज़गार के मामले में, हालाँकि, प्राथमिक क्षेत्रक की हिस्सेदारी सबसे अधिक बनी हुई है। यह विरोधाभास भारत की आर्थिक नीतियों और संरचनात्मक चुनौतियों को उजागर करता है।
एक छोटे से गाँव में, रामलाल का परिवार पीढ़ियों से खेती करता आ रहा है। परिवार के सात सदस्य खेतों में काम करते हैं, लेकिन पर्याप्त आय नहीं हो पाती क्योंकि खेत छोटे हैं और सभी को पूरे साल काम नहीं मिलता। दूसरी ओर, रामलाल का बेटा शहर में एक आईटी कंपनी में नौकरी करता है और उसकी आय खेती से कहीं अधिक है। यह उदाहरण बताता है कि उत्पादन और रोज़गार में क्षेत्रकों का योगदान कितना भिन्न है और क्यों तृतीयक क्षेत्रक तेजी से बढ़ रहा है।
भारत में उत्पादन के क्षेत्रकों का बदलता स्वरूप
1977-78 से 2017-18 की अवधि में भारत के सकल मूल्य वर्धन (जी.वी.ए.) में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक तीनों क्षेत्रकों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। लेकिन विकास की गति भिन्न-भिन्न रही है।
प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि) का जी.वी.ए. में योगदान 1977-78 के लगभग 47% से घटकर 2017-18 में लगभग 16% रह गया। द्वितीयक क्षेत्रक (उद्योग, निर्माण आदि) का योगदान मामूली बढ़ोतरी के साथ लगभग 29% से बढ़कर 34% हुआ। परंतु तृतीयक क्षेत्रक (सेवाएं) ने सबसे तीव्र गति पकड़ी और इसका योगदान 24% से बढ़कर 50% से अधिक हो गया। इस प्रकार, तृतीयक क्षेत्रक अब अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र बन चुका है।
रोज़गार के क्षेत्र में क्षेत्रकों की भूमिका
उत्पादन की तुलना में रोज़गार का वितरण एकदम भिन्न तस्वीर प्रस्तुत करता है। वर्तमान में, भारत की लगभग 44% से अधिक श्रम शक्ति अभी भी प्राथमिक क्षेत्रक में कार्यरत है। यह हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम तो हुई है, फिर भी सबसे बड़ी बनी हुई है। द्वितीयक क्षेत्रक लगभग 25% रोज़गार प्रदान करता है, जबकि तृतीयक क्षेत्रक लगभग 31% रोज़गार उपलब्ध कराता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि तृतीयक क्षेत्रक उत्पादन में आधे से अधिक योगदान करने के बावजूद रोज़गार में एक-तिहाई से भी कम हिस्सा रखता है। इसके विपरीत, प्राथमिक क्षेत्रक में उत्पादन का हिस्सा घटकर 16% रह गया है, लेकिन रोज़गार का 44% से अधिक भाग इसमें सिमटा हुआ है। यह विषमता भारतीय अर्थव्यवस्था की एक बड़ी चुनौती है।
उत्पादन और रोज़गार के बीच विरोधाभास के कारण
इस विरोधाभास का मुख्य कारण कृषि में व्याप्त अल्प बेरोज़गारी (या प्रच्छन्न बेरोज़गारी) है। खेतों पर आवश्यकता से अधिक लोग काम कर रहे हैं, जिनमें से कई का सीमांत उत्पादन लगभग शून्य होता है। ये लोग खेती छोड़कर अन्य क्षेत्रों में नहीं जा पाते क्योंकि उनके पास वैकल्पिक रोज़गार के अवसर नहीं हैं।
दूसरी ओर, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक पर्याप्त रोज़गार सृजन नहीं कर पाए हैं। उद्योगों में मशीनीकरण और पूँजी-गहन तकनीकों के कारण रोज़गार वृद्धि सीमित रही है। सेवा क्षेत्र में भी कई उच्च-कौशल वाले रोज़गार हैं जो सीमित संख्या में ही उपलब्ध हैं। परिणामस्वरूप, अधिकांश श्रम शक्ति प्राथमिक क्षेत्रक में ही बंधी रह जाती है।
तृतीयक क्षेत्रक के महत्वपूर्ण होने के प्रमुख कारण
तृतीयक क्षेत्रक की तीव्र वृद्धि के पीछे कई कारक हैं:
1. बुनियादी सेवाओं की आवश्यकता
हर अर्थव्यवस्था को अस्पताल, स्कूल, डाक, पुलिस, अदालत, परिवहन और संचार जैसी बुनियादी सेवाओं की जरूरत होती है। ये सेवाएं आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य हैं और इनकी माँग बढ़ती ही जाती है।
2. कृषि और उद्योग के विकास से सेवाओं की माँग
जैसे-जैसे कृषि और उद्योग का विकास होता है, उन्हें परिवहन, भंडारण, बैंकिंग, बीमा और विपणन जैसी सहायक सेवाओं की आवश्यकता बढ़ती है। इससे तृतीयक क्षेत्रक का विस्तार होता है।
3. आय बढ़ने पर उपभोक्ता सेवाओं की माँग
लोगों की आय बढ़ने के साथ वे अधिक पर्यटन, बाहर भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और होम डिलीवरी जैसी सेवाओं पर खर्च करते हैं। यह सेवाओं की माँग को बढ़ाता है।
4. सूचना प्रौद्योगिकी आधारित नई सेवाएं
हाल के वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) ने सेवा क्षेत्र में क्रांति ला दी है। सॉफ्टवेयर विकास, बीपीओ, ई-कॉमर्स, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन शिक्षा जैसी नई सेवाओं ने तृतीयक क्षेत्रक के विकास को नई दिशा दी है।
इस अध्याय के अन्य उप-पाठ:
- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
- संगठित, असंगठित और स्वामित्व आधारित क्षेत्रक
Total Slides: 8
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- भाग 2: क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- You are Reading Here: भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान
- भाग 4: क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- भाग 5: बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
- भाग 6: संगठित, असंगठित और स्वामित्व आधारित क्षेत्रक