कक्षा 10 अर्थशास्त्र का अध्याय ‘विकास’ एक ऐसा विषय है जो छात्रों को विकास की बहुआयामी प्रकृति, उसके मापदंडों, विभिन्न सूचकांकों और धारणीयता के महत्व से परिचित कराता है। यह अध्याय न केवल आर्थिक उन्नति बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, समानता और पर्यावरणीय संतुलन जैसे पहलुओं को भी शामिल करता है। विद्यार्थी यहाँ जानेंगे कि विश्व बैंक और यूएनडीपी जैसी संस्थाएँ विकास को कैसे मापती हैं, तथा भारत के राज्यों और पड़ोसी देशों की तुलना किन आधारों पर की जाती है। इसके अतिरिक्त, धारणीय विकास की अवधारणा और संसाधनों के अति-उपयोग के दुष्परिणामों पर भी विस्तृत चर्चा की गई है। यह पाठ UP Board कक्षा 10 की परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसे अच्छी तरह समझने के लिए यहाँ दिए गए नोट्स, प्रश्नोत्तर और उदाहरण सहायक होंगे।
रमेश और सुरेश एक ही गाँव के दो मित्र हैं। रमेश के पिता भूमिहीन मजदूर हैं, और उनका परिवार रोज कमाकर खाने वाला है, जबकि सुरेश के पिता संपन्न किसान हैं जो पंजाब में बड़े खेत जोतते हैं। रमेश के लिए विकास का अर्थ है — उसके पिता को अधिक मजदूरी, उसकी बहन को स्कूल जाने का अवसर, और गाँव के तालाब की सफाई। दूसरी ओर, सुरेश चाहता है कि उसके पिता को फसलों के अच्छे दाम मिलें, ताकि वे विदेश में जाकर पढ़ सकें। इस प्रकार, दोनों की विकास की कल्पनाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं, और यही इस अध्याय का मूल संदेश है — विकास का अर्थ सबके लिए एक-सा नहीं होता।
- भाग 1: विकास: विभिन्न दृष्टिकोण और लक्ष्य
- भाग 2: राष्ट्रीय विकास का मापन: आय और उसकी सीमाएँ
- भाग 3: विकास के अन्य सूचकांक और सार्वजनिक सुविधाएँ
- भाग 4: मानव विकास सूचकांक और देशों की तुलना
- भाग 5: विकास की धारणीयता
- भाग 6: अभ्यास और मूल्यांकन
विकास की परिभाषा और विभिन्न लक्ष्य
विकास केवल आय का बढ़ना नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में समग्र सुधार को कहते हैं। लोगों की विकास संबंधी अभिलाषाएँ उनकी परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। तालिका 1.1 में दर्शाया गया है कि एक भूमिहीन ग्रामीण मजदूर चाहता है कि उसे काम के अधिक दिन, बेहतर मज़दूरी, तथा बच्चों के लिए स्थानीय स्कूल सुलभ हों। वहीं पंजाब का संपन्न किसान उच्च समर्थन मूल्य एवं विदेशों में बच्चों को बसाने की इच्छा रखता है। एक आदिवासी किसान जो केवल वर्षा पर निर्भर है, सिंचाई की सुविधा व बाँध के विस्थापन से बचाव चाहता है, जबकि एक शहरी अमीर परिवार की लड़की अपने भाई के समान स्वतंत्रता और निर्णय-क्षमता की आकांक्षा रखती है।
आय और भौतिक लक्ष्यों के अलावा अन्य इच्छाएँ
यद्यपि अधिकांश लोग अधिक आय की इच्छा रखते हैं, परंतु वे समानता, स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान जैसी अभौतिक वस्तुओं को भी उतना ही महत्व देते हैं। उदाहरण के लिए, एक महिला के लिए नौकरी के साथ-साथ घर में आदरपूर्ण व्यवहार भी विकास का संकेत है। इसी प्रकार, दोस्ती, पारिवारिक सहयोग और सामाजिक मान्यता मात्र पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं। अतः विकास का अर्थ केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ नहीं, बल्कि जीवन की वे सभी स्थितियाँ हैं जो व्यक्ति को संतुष्टि और गरिमा प्रदान करें।
विकास के लक्ष्यों में परस्पर विरोध
कई बार दो व्यक्तियों या समूहों के विकास-लक्ष्यों में टकराव भी हो सकता है। उदाहरणतः नर्मदा नदी पर बाँध बनाने से उद्योगपतियों और सिंचाई-सुविधा चाहने वाले किसानों को लाभ होता है, किंतु आदिवासी और विस्थापित परिवारों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसी तरह, एक फैक्ट्री मालिक अधिक बिजली के लिए बाँध चाहता है, जबकि स्थानीय लोग तालाब या चेक डैम को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए, विकास की अवधारणा में समावेशी दृष्टिकोण आवश्यक है।
विकास को मापने की विधियाँ
आय का मापदंड
पारंपरिक रूप से किसी देश के विकास को मापने के लिए प्रतिव्यक्ति आय (Per Capita Income) का उपयोग किया जाता है। विश्व बैंक ने इसी आधार पर देशों को निम्न आय, मध्यम आय और उच्च आय वर्गों में बाँटा है। परंतु इस मापदंड की कई सीमाएँ हैं — यह आय के वितरण की विषमता को नहीं दर्शाता और स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे गैर-आर्थिक घटकों की उपेक्षा करता है। उदाहरणार्थ, केरल की प्रतिव्यक्ति आय हरियाणा से कम होने के बावजूद उसका मानव विकास स्तर ऊँचा है।
सार्वजनिक सेवाएँ और विकास
केरल में शिशु मृत्यु दर (IMR) काफ़ी कम है, क्योंकि वहाँ सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) सुचारू रूप से कार्य करती है और स्वास्थ्य एवं शिक्षा की बुनियादी सुविधाएँ पर्याप्त हैं। यह देखा गया है कि सामूहिक सेवाएँ व्यक्तिगत स्तर की तुलना में अधिक सस्ती और प्रभावी होती हैं। तमिलनाडु में 90 प्रतिशत ग्रामीण लोग राशन की दुकानों का प्रयोग करते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में केवल 35 प्रतिशत। यह अंतर उनके जीवन-स्तर को सीधे प्रभावित करता है।
मानव विकास सूचकांक (HDI)
विकास का सबसे व्यापक मापदंड मानव विकास सूचकांक है, जिसे यूएनडीपी (UNDP) प्रतिवर्ष अपनी मानव विकास रिपोर्ट में प्रकाशित करता है। यह प्रतिव्यक्ति आय, जन्म के समय संभावित आयु (Life Expectancy) और शिक्षा स्तर (विद्यालयी औसत वर्ष एवं अपेक्षित वर्ष) के तीन घटकों को सम्मिलित करता है। नवीनतम रिपोर्ट (2025, 2023-24 के आँकड़ों पर) के अनुसार 193 देशों में भारत का HDI क्रमांक 130 है। इसी तालिका में श्रीलंका (89), बांग्लादेश (130 के आसपास) और नेपाल (145) जैसे पड़ोसी देशों से तुलना करने पर ज्ञात होता है कि केवल आय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा सूचकांक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
धारणीय विकास और पर्यावरण
भूमिगत जल का अति-उपयोग
विकास की वर्तमान गति के धारणीय न होने की चेतावनी वैज्ञानिक बार-बार दे रहे हैं। भारत के 300 से अधिक जिलों में पिछले 20 वर्षों में भूमिगत जल का स्तर 4 मीटर से अधिक गिरा है। पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे कृषि-प्रधान क्षेत्रों में भूमिगत जल का अति-उपयोग चिंताजनक सीमा तक पहुँच गया है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले 25 वर्षों में देश का 60 प्रतिशत भाग जल-संकट झेलेगा। यह स्थिति नवीकरणीय साधन (Renewable Resource) की सीमाओं को रेखांकित करती है — प्रकृति की पुनःपूर्ति क्षमता से अधिक दोहन विनाश का कारण बनता है।
गैर-नवीकरणीय संसाधन और ऊर्जा संकट
दूसरी ओर कच्चा तेल जैसे गैर-नवीकरणीय संसाधनों का भण्डार सीमित है। तालिका 1.7 के अनुसार, विश्व के ज्ञात तेल भण्डार 1732 हजार मिलियन बैरल हैं और वर्तमान खपत दर पर वे केवल 47 वर्षों में समाप्त हो जाएँगे। मध्य-पूर्व के पास 70 वर्ष का भण्डार है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के पास मात्र 10.5 वर्ष। भारत जैसे देशों के लिए, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें गंभीर आर्थिक चुनौती बन सकती हैं। अतः धारणीय विकास की अवधारणा हमें भावी पीढ़ी के अधिकारों की सुरक्षा करना सिखाती है।
विकास की प्रकृति: क्या हमेशा बढ़ता स्तर चाहिए?
प्रसिद्ध भारतीय अर्थशास्त्री ने ठीक ही कहा था — “हमने विश्व को अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं किया है; हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।” इस उक्ति का तात्पर्य है कि विकास का स्तर भले ही ऊँचा हो, परंतु यदि वह पर्यावरण को हानि पहुँचाए तो वह धारणीय नहीं कहलाएगा। बहस इस बात पर जारी है कि क्या हमें केवल आर्थिक विकास को देखना चाहिए या जीवन की समग्र गुणवत्ता को। इसी संदर्भ में मानव विकास की नई धारणा अधिक प्रासंगिक हो उठी है।
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