विकास की धारणीयता आधुनिक अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण का मूल मंत्र है। इसका अभिप्राय ऐसे विकास से है जो न केवल वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करे, बल्कि भावी पीढ़ियों के हितों और संसाधनों तक उनकी पहुँच को भी सुनिश्चित करे। यह दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग सिखाता है। आज विश्वभर में तीव्र औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, जिससे भविष्य संकट में पड़ सकता है। इसलिए, सतत विकास की अवधारणा अनिवार्य हो गई है।
पंजाब के किसान हरजीत सिंह हाल ही में बहुत चिंतित हैं। उनके गाँव में भूमिगत जल का स्तर पिछले दस वर्षों में लगभग 5 मीटर नीचे चला गया है। पहले 50 फीट पर पानी मिल जाता था, अब 150 फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं मिल रहा। यह समस्या केवल उनके गाँव की नहीं, बल्कि पूरे राज्य और देश के कई हिस्सों की है। यही तो है संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन, जो विकास की धारणीयता के अभाव का सबसे बड़ा उदाहरण है।
धारणीय विकास की अवधारणा
विकास का अर्थ केवल आर्थिक उन्नति नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पर्यावरणीय सुधारों से जुड़ा है। धारणीय विकास की परिभाषा 1987 में ब्रंटलैंड आयोग ने दी थी: “ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकता पूरी करने की योग्यता से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे।” यह विचार पृथ्वी की सीमित वहन क्षमता को ध्यान में रखता है। यदि हम प्राकृतिक पूँजी को समाप्त करते गए, तो राष्ट्रीय आय तो बढ़ेगी, लेकिन दीर्घकालीन कल्याण नहीं होगा। धारणीयता तीन स्तंभों पर टिकी है: आर्थिक व्यवहार्यता, सामाजिक समानता, और पर्यावरणीय संरक्षण।
धारणीयता का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या तथा उपभोग की माँग बढ़ रही है। यदि विकास की गति धारणीय न हुई, तो हमारी सार्वजनिक सुविधाओं जैसे जल, स्वच्छ वायु और उपजाऊ भूमि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक आपदाएँ और जलवायु परिवर्तन भी अनियोजित विकास के ही परिणाम हैं। अतः प्रत्येक नागरिक और सरकार को मिलकर ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जो दीर्घकाल तक चल सकें।
संसाधनों का वर्गीकरण: नवीकरणीय और अनवीकरणीय
प्राकृतिक संसाधनों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है। पहले हैं नवीकरणीय संसाधन, जिनकी पुनर्पूर्ति प्राकृतिक रूप से होती रहती है। इनमें वन, भूमिगत जल, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और मत्स्य संपदा शामिल हैं। यदि हम इनका उपयोग सीमित मात्रा में करें और पुनर्भरण की दर बनाए रखें, तो ये सदा उपलब्ध रहते हैं। लेकिन यदि दोहन की दर पुनर्भरण की दर से अधिक हो जाए, तो ये भी समाप्त हो सकते हैं, जैसा कि भूमिगत जल के साथ हो रहा है। दूसरे हैं अनवीकरणीय संसाधन, जिनके सीमित भंडार हैं और बनने में करोड़ों वर्ष लगते हैं। एक बार प्रयोग कर लेने पर ये समाप्त हो जाते हैं। इनके उदाहरण हैं कच्चा तेल, कोयला, खनिज जैसे लौह अयस्क, बॉक्साइट आदि। इनका विकल्प खोजना और विवेकपूर्ण उपयोग ही एकमात्र मार्ग है।
भारत में संसाधनों के अति-उपयोग के उदाहरण
भारत में तीव्र विकास की चाह में अनेक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे उनका भविष्य खतरे में है। यहाँ दो प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत हैं।
भूमिगत जल का संकट
भारत विश्व का सबसे बड़ा भूमिगत जल उपयोगकर्ता है। कृषि क्षेत्र में लगभग 70% भूमिगत जल का प्रयोग सिंचाई के लिए होता है। हरित क्रांति के दौरान अधिक उपज देने वाली फसलों के लिए नलकूपों की संख्या बहुत बढ़ गई, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, भारत के 300 से अधिक जिलों में भूमिगत जल स्तर 4 मीटर से अधिक गिर चुका है। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे गंभीर है, जहाँ जलस्तर प्रतिवर्ष 1 मीटर तक गिर रहा है। इसके अतिरिक्त, कई स्थानों पर आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे रासायनिक प्रदूषण के कारण जल अनुपयोगी हो गया है। यह एक नवीकरणीय संसाधन के अति-उपयोग का प्रत्यक्ष उदाहरण है, जो भविष्य में खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है।
कच्चे तेल का खतरा
कच्चा तेल एक अनवीकरणीय संसाधन है जिसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, प्लास्टिक निर्माण आदि में बड़े पैमाने पर होता है। वैश्विक स्तर पर, वर्तमान खपत दर पर कच्चे तेल के सिद्ध भंडार केवल 47 वर्षों में समाप्त हो जाएँगे। भारत अपनी आवश्यकता का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश की आर्थिक वृद्धि की गति धीमी पड़ जाती है। भविष्य में जब भंडार समाप्त होंगे, तो संकट और गहराएगा। इसलिए, सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और जैव ईंधन जैसे विकल्पों को प्रोत्साहित करना शुरू किया है।
वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
पर्यावरणीय गिरावट किसी एक देश की सीमा में बंधी नहीं है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, समुद्रों का प्रदूषण, वनों की कटाई—ये सभी वैश्विक समस्याएँ हैं जो सीमाओं के पार प्रभाव डालती हैं। एक देश में उत्पन्न प्रदूषण हवा और जल के माध्यम से दूसरे देशों को प्रभावित करता है। इसलिए सभी देशों का भविष्य परस्पर जुड़ा है। पेरिस जलवायु समझौता (2015) इसी वैश्विक चिंता का परिणाम है, जिसमें देशों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने का संकल्प लिया है।
प्रसिद्ध उद्धरण: “हमने पृथ्वी को अपने भावी बच्चों से उधार लिया है, अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं पाया।” यह हमें स्मरण कराता है कि हमारा नैतिक दायित्व है कि हम धरती को उसी रूप में या और बेहतर रूप में अगली पीढ़ी को सौंपें। इसलिए मानव विकास सूचकांक में सुधार के लिए साफ-सुथरे पर्यावरण की आवश्यकता होती है। यह धारणीयता का ही एक पहलू है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: विकास: विभिन्न दृष्टिकोण और लक्ष्य
- भाग 2: राष्ट्रीय विकास का मापन: आय और उसकी सीमाएँ
- भाग 3: विकास के अन्य सूचकांक और सार्वजनिक सुविधाएँ
- भाग 4: मानव विकास सूचकांक और देशों की तुलना
- You are Reading Here: विकास की धारणीयता
- भाग 6: अभ्यास और मूल्यांकन