भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of Indian Economy in Hindi) कक्षा 10 अर्थशास्त्र (Class 10 Economics) के अध्याय 2 का विषय है। यह अध्याय UP बोर्ड पाठ्यक्रम (UP Board Syllabus) के अंतर्गत आता है और बोर्ड परीक्षाओं (Board Exams) में इससे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं जैसे प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक, संगठित एवं असंगठित क्षेत्रक, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रक, सकल घरेलू उत्पाद (GDP), सकल मूल्य वर्धन (GVA), अल्प बेरोजगारी और रोजगार सृजन के उपायों आदि का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इस लेख में हम भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक के नोट्स (Notes), व्याख्या और परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर (Question-Answer) प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आपको UP Board कक्षा 10 की अर्थशास्त्र परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होंगे।
आपने अपने दैनिक जीवन में देखा होगा कि एक किसान खेत में गेहूँ उगाता है, जो प्राथमिक क्षेत्र की गतिविधि है। फिर वह गेहूँ एक आटा मिल में पिसवाकर आटा बनवाता है, जो द्वितीयक क्षेत्रक (विनिर्माण) का उदाहरण है। उसके बाद एक ट्रक ड्राइवर उस आटे को शहर की दुकान तक पहुँचाता है (तृतीयक क्षेत्रक – परिवहन सेवा), जहाँ से उपभोक्ता उसे खरीदता है। इसी तरह, स्कूल में शिक्षक (तृतीयक सेवा), बिजली का उत्पादन (द्वितीयक), और बिजली के लिए कोयला खनन (प्राथमिक) आदि सभी गतिविधियाँ आपस में जुड़ी हैं। यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था के ये सभी क्षेत्रक परस्पर निर्भर हैं।
- भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- भाग 2: क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- भाग 3: भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान
- भाग 4: क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- भाग 5: बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
- भाग 6: संगठित, असंगठित और स्वामित्व आधारित क्षेत्रक
प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक का वर्गीकरण
1. प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector)
जब हम प्राकृतिक संसाधनों का प्रत्यक्ष उपयोग करके कोई वस्तु उत्पन्न करते हैं, तो उसे प्राथमिक क्षेत्रक कहते हैं। इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहा जाता है। इसमें कृषि, पशुपालन, मछली पालन, वानिकी, खनन एवं उत्खनन जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक कारकों जैसे वर्षा, सूर्य का प्रकाश, जलवायु आदि पर निर्भर है, इसलिए इसका उत्पादन मौसमी प्रकृति का होता है। भारत में लगभग 50% से अधिक श्रमिक इसी क्षेत्रक में कार्यरत हैं।
2. द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector)
इसे औद्योगिक क्षेत्रक कहते हैं। यहाँ प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण (Manufacturing) द्वारा उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है। उदाहरण के लिए, कपास से धागा और कपड़ा बनाना, गन्ने से चीनी और गुड़ बनाना, लकड़ी से फर्नीचर, मिट्टी से ईंट आदि। यह क्षेत्र प्राथमिक क्षेत्रक के उत्पादों को अधिक मूल्यवान बनाता है। विनिर्माण कार्य कारखानों, कार्यशालाओं या घरों में भी हो सकता है।
3. तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector)
यह सेवा क्षेत्रक है, जो प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के विकास में मदद करता है। तृतीयक गतिविधियाँ स्वयं वस्तुओं का उत्पादन नहीं करतीं, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया को आसान बनाती हैं। इसमें परिवहन, संचार, बैंकिंग, बीमा, व्यापार, चिकित्सा, शिक्षा, पर्यटन, मनोरंजन और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) जैसी सेवाएँ शामिल हैं। वर्तमान में यह क्षेत्र सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है।
तीनों क्षेत्रकों का तुलनात्मक अध्ययन और राष्ट्रीय आय
किसी देश में उत्पादित कुल वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को जानने के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का आकलन किया जाता है। GDP की गणना करते समय केवल अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य शामिल किया जाता है, ताकि दोहरी गणना (Double Counting) से बचा जा सके। उदाहरण के लिए, यदि किसान गेहूँ ₹20/किलो बेचता है, आटा मिल ₹25/किलो आटा बेचता है, और बिस्कुट कंपनी ₹80 का बिस्कुट बेचती है, तो GDP में केवल बिस्कुट का ₹80 जोड़ा जाएगा, क्योंकि गेहूँ और आटे का मूल्य पहले से इसमें शामिल है।
हाल के वर्षों में भारत में तृतीयक क्षेत्रक का GDP में योगदान तेज़ी से बढ़ा है। 1977-78 में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे बड़ा उत्पादक था, जबकि 2017-18 में तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। इसका प्रमुख कारण बुनियादी सेवाओं की माँग, सूचना प्रौद्योगिकी का विकास, आय में वृद्धि के कारण नई सेवाओं की माँग आदि है। लेकिन रोज़गार के मोर्चे पर स्थिति भिन्न है: आज भी भारत में सबसे अधिक रोज़गार प्राथमिक क्षेत्रक (मुख्यतः कृषि) में मिलता है। इस विसंगति का कारण द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों में रोज़गार के सीमित अवसर होना है।
संगठित और असंगठित क्षेत्रक
रोज़गार की शर्तों और विनियमों के आधार पर अर्थव्यवस्था को दो भागों में बाँटा गया है:
संगठित क्षेत्रक
यह वह क्षेत्र है जहाँ उद्यम पंजीकृत होते हैं और सरकारी नियमों का पालन करते हैं। श्रमिकों को रोज़गार सुरक्षा, नियमित वेतन, भविष्य निधि, सवेतन छुट्टी, पेंशन, चिकित्सा सुविधा आदि लाभ मिलते हैं। उदाहरण: सरकारी कार्यालय, बड़ी कंपनियाँ, बैंक, रेलवे, आदि।
असंगठित क्षेत्रक
यह छोटी-बिखरी इकाइयों से बना क्षेत्र है, जो प्रायः सरकारी नियंत्रण से बाहर होता है। यहाँ श्रमिकों को अनियमित एवं कम मजदूरी, असुरक्षित रोज़गार, शोषण, लंबे काम के घंटे आदि की समस्या होती है। असंगठित क्षेत्रक में सर्वाधिक लोग कार्यरत हैं – भारत में लगभग 80% श्रमिक इसी क्षेत्रक में काम करते हैं। कृषि, छोटी दुकानें, निर्माण श्रमिक, ठेला विक्रेता, घरेलू कामगार आदि इसके उदाहरण हैं।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक
स्वामित्व के आधार पर क्षेत्रकों का वर्गीकरण: सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector) में सरकार का स्वामित्व होता है, जैसे भारतीय रेल, डाकघर, बिजली विभाग, आकाशवाणी, आदि। सरकार का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि जन-कल्याण होता है। वहीं निजी क्षेत्रक (Private Sector) में एकल व्यक्ति या कंपनी का स्वामित्व होता है, जैसे टिस्को, रिलायंस, इंफोसिस। निजी क्षेत्र लाभ कमाने के लिए कार्य करता है। सरकार बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में खर्च करती है क्योंकि भारी निवेश और कम प्रतिफल के कारण निजी क्षेत्र इनमें रुचि नहीं लेता।
अल्प बेरोजगारी और रोजगार सृजन के उपाय
कृषि क्षेत्र में प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) एक गंभीर समस्या है। इस स्थिति में आवश्यकता से अधिक लोग काम में लगे होते हैं, परंतु उनके हट जाने पर भी उत्पादन प्रभावित नहीं होता। उदाहरण के लिए, एक छोटे किसान परिवार के पाँच सदस्य दो हेक्टेयर भूमि पर काम करते हैं, जबकि वास्तव में तीन लोग ही पर्याप्त हैं। यदि शेष दो को अन्यत्र रोजगार मिल जाए तो कुल उत्पादन वही रहेगा। इसी प्रकार, शहरों में सेवा क्षेत्र के अनेक लोग (प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, ठेला विक्रेता) अल्प बेरोजगार होते हैं।
सरकार ने रोजगार बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं: मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005) के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई थी। अब इसे विकसित भारत-रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (2025) के रूप में जारी रखा गया है। सिंचाई, कृषि साख, भंडारण, प्रसंस्करण उद्योग, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में निवेश से भी रोजगार सृजन संभव है।
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