राष्ट्रीय विकास का मापन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए विभिन्न पैमाने इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें सबसे सरल और प्रचलित पैमाना प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) है। यह किसी देश की कुल आय को वहाँ की कुल जनसंख्या से भाग देकर निकाला जाता है और यह दर्शाता है कि यदि आय का समान वितरण हो तो प्रत्येक नागरिक को कितनी राशि प्राप्त होगी। विश्व बैंक इसी आधार पर देशों का वर्गीकरण करता है। लेकिन क्या केवल आय से ही वास्तविक विकास का आकलन संभव है? इस उप-पाठ में हम राष्ट्रीय विकास के मापन में आय के उपयोग और उसकी सीमाओं को विस्तार से समझेंगे।
एक गाँव में चार परिवार हैं—राजेश, सुरेश, मोहन और रामू। राजेश की मासिक आय ₹10,000 है, सुरेश की ₹7,000, मोहन की ₹3,000 और रामू बेरोजगार है, उसकी आय ₹0 है। चारों की कुल आय ₹20,000 है और औसत आय ₹5,000 प्रति परिवार आती है। पर क्या आप मानेंगे कि गाँव के सभी परिवार समृद्ध हैं? जाहिर है नहीं, क्योंकि रामू के पास तो कुछ भी नहीं है। यह सरल उदाहरण बताता है कि औसत आय असमानताओं को छुपा सकती है। ठीक इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय भी देश के अंदर मौजूद आर्थिक विषमताओं को प्रकट नहीं करती।
प्रति व्यक्ति आय: अर्थ और गणना
किसी देश की एक वर्ष में उत्पन्न सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को सकल राष्ट्रीय आय (GNI) कहते हैं। जब इस GNI को देश की जनसंख्या से भाग दिया जाता है, तो प्रति व्यक्ति आय प्राप्त होती है। यह एक औसत आँकड़ा है और यह बताता है कि प्रति व्यक्ति औसतन कितनी आय उपलब्ध है। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश की GNI 100 अरब रुपये है और जनसंख्या 10 करोड़ है, तो प्रति व्यक्ति आय = 100,00,00,00,000 ÷ 10,00,00,000 = 10,000 रुपये। यह गणना अंतरराष्ट्रीय तुलना के लिए अमेरिकी डॉलर में भी की जाती है। प्रति व्यक्ति आय को वास्तविक रूप में मापने के लिए स्थिर मूल्यों का प्रयोग किया जाता है ताकि मुद्रास्फीति का प्रभाव न पड़े।
विश्व बैंक द्वारा देशों का वर्गीकरण
विश्व बैंक हर साल अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में देशों को उनकी प्रति व्यक्ति आय के आधार पर वर्गीकृत करता है। वर्तमान में (2023-24) श्रेणियाँ इस प्रकार हैं:
- निम्न आय: $1,135 से कम (जैसे अफगानिस्तान, सोमालिया)
- निम्न-मध्यम आय: $1,136 से $4,465 (जैसे भारत, बांग्लादेश)
- उच्च-मध्यम आय: $4,466 से $13,845 (जैसे चीन, ब्राजील)
- उच्च आय: $13,846 से अधिक (जैसे अमेरिका, जर्मनी)
भारत इस वर्गीकरण में निम्न-मध्यम आय वर्ग में आता है। यह वर्गीकरण हमें यह समझने में मदद करता है कि विभिन्न देश आर्थिक रूप से कहाँ खड़े हैं, लेकिन यह विकास के अन्य पहलुओं जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा को नहीं दर्शाता। विश्व बैंक हर साल मुद्रास्फीति और अन्य आर्थिक कारकों के अनुसार इन सीमाओं में संशोधन करता है।
आय माप की प्रमुख सीमाएँ
प्रति व्यक्ति आय विकास का एक अपूर्ण माप है, क्योंकि इसमें कई कमियाँ हैं:
- आय वितरण की असमानता: यह औसत आय बताती है, न कि यह कि देश के कितने लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। एक अमीर देश में भी बहुत से लोग निर्धन हो सकते हैं।
- गैर-आय कारकों की अनदेखी: यह जीवन की गुणवत्ता, जैसे स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, पर्यावरण, और सामाजिक सुरक्षा का हिसाब नहीं रखती। उदाहरण के लिए, अधिक आय वाला देश वायु प्रदूषण या वनों की कटाई से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचा सकता है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव हानिकारक होता है।
- मुद्रा विनिमय दर की समस्या: अलग-अलग देशों की मुद्राओं की क्रय शक्ति भिन्न होती है; केवल डॉलर में रूपांतरण करने से सही तुलना नहीं हो पाती।
- असंगठित क्षेत्र और घरेलू कार्य: बहुत से आर्थिक क्रियाकलाप, जैसे घरेलू कार्य या असंगठित मजदूरी, GNI में शामिल नहीं होते, जिससे आय का कम आकलन हो सकता है।
इन सीमाओं के कारण ही अर्थशास्त्री विकास के लिए मानव विकास सूचकांक जैसे अन्य पैमाने विकसित करते हैं, जिनमें आय के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा को भी शामिल किया जाता है।
केरल और हरियाणा: एक तुलनात्मक अध्ययन
भारत के भीतर ही देखें तो केरल और हरियाणा का उदाहरण बहुत शिक्षाप्रद है। वर्ष 2019-20 के आँकड़ों के अनुसार, हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹2,64,000 थी, जबकि केरल की लगभग ₹2,04,000। स्पष्ट है कि हरियाणा अधिक समृद्ध प्रतीत होता है। लेकिन जब हम विकास के अन्य सूचकों पर नज़र डालते हैं तो तस्वीर बदल जाती है।
- शिशु मृत्यु दर (प्रति 1,000 जीवित जन्म पर): केरल में 7, जबकि हरियाणा में 30।
- साक्षरता दर: केरल में 94% से अधिक, हरियाणा में लगभग 76%।
- जीवन प्रत्याशा: केरल में लगभग 75 वर्ष, हरियाणा में लगभग 68 वर्ष।
- स्वास्थ्य सेवाएँ: केरल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का जाल बिछा है; हरियाणा में यह सुविधा अपेक्षाकृत कम है।
ये आँकड़े दर्शाते हैं कि हरियाणा की आय अधिक होते हुए भी केरल के लोगों का जीवन स्तर बेहतर है। इसका कारण सार्वजनिक सुविधाओं पर किया गया सरकारी खर्च और सामाजिक जागरूकता है। इसलिए केवल आय विकास का सही पैमाना नहीं हो सकती; हमें विकास के विभिन्न लक्ष्य और पहलुओं पर ध्यान देना होगा। केरल ने साबित किया है कि यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पर्याप्त निवेश हो, तो कम आय के बावजूद उच्च मानव विकास संभव है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, राष्ट्रीय विकास के मापन में प्रति व्यक्ति आय एक आधारभूत और आवश्यक सूचक है, परंतु यह अकेला पर्याप्त नहीं है। यह न तो आय के वितरण को बताती है, न ही जीवन की गुणवत्ता को। इसीलिए हमें ऐसे बहुआयामी सूचकांकों की आवश्यकता है जो आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पक्षों को समाहित करें। अगले उप-पाठों में हम ऐसे ही मानव विकास सूचकांक और विकास की धारणीयता पर चर्चा करेंगे।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: विकास: विभिन्न दृष्टिकोण और लक्ष्य
- You are Reading Here: राष्ट्रीय विकास का मापन: आय और उसकी सीमाएँ
- भाग 3: विकास के अन्य सूचकांक और सार्वजनिक सुविधाएँ
- भाग 4: मानव विकास सूचकांक और देशों की तुलना
- भाग 5: विकास की धारणीयता
- भाग 6: अभ्यास और मूल्यांकन