किसी भी अर्थव्यवस्था में रोज़गार की प्रकृति और स्वामित्व के आधार पर क्षेत्रकों का वर्गीकरण किया जाता है। संगठित और असंगठित क्षेत्रक श्रमिकों की कार्य स्थितियों और सरकारी नियमों के अनुपालन को दर्शाते हैं, जबकि सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक यह बताते हैं कि उत्पादन के साधनों पर किसका स्वामित्व है। इस अध्याय में हम इन्हीं पहलुओं को विस्तार से समझेंगे।
कांता एक निजी कंपनी में कार्यरत है। उसे नियमित वेतन, सवेतन छुट्टियाँ, भविष्य निधि और चिकित्सा सुविधाएँ प्राप्त हैं। दूसरी ओर, कमल एक ढाबे पर काम करता है, जहाँ उसे न तो नियुक्ति पत्र मिलता है और न ही कोई निश्चित कार्य अवधि। कभी-कभी उसे बिना किसी सूचना के काम से निकाल भी दिया जाता है। यह अंतर संगठित और असंगठित क्षेत्रकों के बीच का है। इसी प्रकार, रेलवे स्टेशन का स्वामित्व सरकार के पास है, जबकि टिस्को जैसी कंपनी निजी स्वामित्व में है। यह सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक का अंतर है।
संगठित क्षेत्रक (Organised Sector)
संगठित क्षेत्रक में वे सभी उद्यम और कार्यालय शामिल होते हैं जहाँ रोज़गार की शर्तें नियमित होती हैं और सरकारी नियमों का पालन किया जाता है। इस क्षेत्रक में श्रमिकों को रोज़गार की सुरक्षा प्राप्त होती है। उन्हें कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, भविष्य निधि अधिनियम आदि के तहत कई लाभ मिलते हैं। सरकार इस क्षेत्रक पर कड़ी निगरानी रखती है ताकि श्रमिकों का शोषण न हो।
संगठित क्षेत्रक की विशेषताएँ
- रोज़गार की अवधि नियमित होती है।
- श्रमिकों को नियुक्ति पत्र प्रदान किया जाता है।
- सवेतन छुट्टी, भविष्य निधि, पेंशन, चिकित्सा भत्ते आदि की सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
- सरकारी नियमों का कड़ाई से अनुपालन होता है।
- यह क्षेत्रक अपेक्षाकृत छोटा है लेकिन इसमें बेहतर कार्य परिस्थितियाँ होती हैं।
उदाहरण: कांता का कार्यालय, सरकारी विभाग, बैंक, बड़ी कंपनियाँ आदि।
असंगठित क्षेत्रक (Unorganised Sector)
असंगठित क्षेत्रक में छोटी और बिखरी हुई इकाइयाँ शामिल होती हैं जो प्रायः सरकारी नियंत्रण से बाहर होती हैं। इस क्षेत्रक में रोज़गार असुरक्षित होता है। श्रमिकों को न तो नियमित वेतन मिलता है, न ही कोई भत्ता। इनकी छंटनी मनमाने ढंग से की जा सकती है। भारत में लगभग 90% से अधिक श्रमिक इसी क्षेत्रक में कार्यरत हैं।
उदाहरण: कमल का ढाबा, खेतिहर मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक आदि।
असंगठित क्षेत्रक की समस्याएँ
- कम और अनियमित वेतन।
- कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं (जैसे भविष्य निधि, पेंशन)।
- स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संबंधी जोखिम।
- मनमानी छंटनी और कार्य की अनिश्चितता।
- सरकारी कानूनों की अनदेखी।
असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण
इनकी सुरक्षा के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे न्यूनतम मजदूरी निर्धारण, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, और श्रम कानूनों का सख्ती से पालन। फिर भी, इस क्षेत्रक में सुधार हेतु और प्रयासों की आवश्यकता है।
स्वामित्व आधारित क्षेत्रक: सार्वजनिक और निजी
सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector)
इस क्षेत्रक में परिसंपत्तियों (भवन, मशीनें, भूमि आदि) का स्वामित्व सरकार के पास होता है। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण है, न कि केवल लाभ कमाना। सरकार जनता को आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराती है, खासकर वे सेवाएँ जिनमें भारी निवेश की आवश्यकता होती है या जिन्हें निजी क्षेत्र उचित मूल्य पर उपलब्ध नहीं करा सकता। उदाहरण: भारतीय रेलवे, डाकघर, सड़कें, सरकारी स्कूल और अस्पताल, बिजली वितरण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
निजी क्षेत्रक (Private Sector)
इस क्षेत्रक में स्वामित्व निजी व्यक्तियों या कंपनियों के पास होता है। मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। ये उद्यम स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं और प्रतिस्पर्धा करते हैं। उदाहरण: टिस्को, रिलायंस इंडस्ट्रीज, इन्फोसिस, निजी स्कूल और अस्पताल।
भारत में असंगठित क्षेत्रक का महत्व और सरकार की भूमिका
भारत जैसे विकासशील देश में असंगठित क्षेत्रक बहुत बड़ी आबादी को रोज़गार प्रदान करता है। हालाँकि, इस क्षेत्रक के श्रमिकों की स्थिति दयनीय है। सरकार को इनके लिए उचित मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्रक को भी सामाजिक कल्याण की प्राथमिकता देनी चाहिए, विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं में।
अंत में, हम देखते हैं कि आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जा सकता है। प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक की अवधारणा भी इसी श्रृंखला का हिस्सा है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- भाग 2: क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- भाग 3: भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान
- भाग 4: क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- भाग 5: बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
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