छपाई की तकनीक ने केवल अमीर लोगों या धर्मगुरुओं को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि इसने महिलाओं और समाज के सबसे निचले व गरीब तबके को भी एक नई आवाज़ दी। लेकिन जब ये आवाज़ें अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ उठने लगीं, तो सरकार ने प्रेस पर पाबंदियाँ लगा दीं। आइए इस अंतिम भाग में महिलाओं, […]
Read Moreभाग 4: भारत में मुद्रण का संसार और शुरुआती छपाई
पिछले भाग में हमने जाना था कि मुद्रण क्रांति ने यूरोप में कैसे तहलका मचाया और दुनिया को कैसे बदल दिया। अब हम यूरोप से निकलकर अपने प्यारे देश ‘भारत’ की ओर चलते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि जब भारत में छपाई की मशीनें नहीं थीं, तब हमारे प्राचीन ग्रंथ और किताबें कैसे […]
Read Moreभाग 3: मुद्रण क्रांति और उसका असर: पाठक वर्ग और धार्मिक विवाद
नमस्कार विद्यार्थियों! कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने जाना था कि योहान गुटेन्बर्ग ने कैसे आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया और बाइबल छापी। छापेखाने का आविष्कार केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं था। इसने लोगों की ज़िंदगी को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। […]
Read Moreभाग 2: यूरोप में मुद्रण का आना और गुटेन्बर्ग प्रेस
कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने जाना था कि छपाई की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई थी। लेकिन आज हम जिस छपाई मशीन (Printing Press) को देखते हैं, वह पूर्वी एशिया से निकलकर यूरोप कैसे पहुँची? और यूरोप के लोगों […]
Read Moreभाग 1: शुरुआती छपी किताबें – चीन, जापान और कोरिया की कहानी
कक्षा 10 इतिहास के अंतिम अध्याय ‘मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया’ के पहले भाग में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आज हमारे चारों तरफ छपी हुई चीज़ें हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया में छपाई (Printing) की मशीन नहीं थी, तब किताबें कैसे तैयार होती थीं? मुद्रण की सबसे पहली तकनीक यूरोप […]
Read Moreअध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया – सम्पूर्ण व्याख्या
कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस शानदार कक्षा में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आज हम अपनी किताब का अंतिम और सबसे रोचक अध्याय शुरू करने जा रहे हैं—‘मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया’। आज हमारे चारों तरफ छपी हुई चीज़ें हैं—किताबें, अख़बार, विज्ञापन, कैलेंडर और पत्रिकाएँ। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया में […]
Read Moreभाग 5: औद्योगिक विकास की विशेषताएँ और वस्तुओं का विज्ञापन
पिछले भाग में हमने भारत में खुले शुरुआती कारखानों और उद्यमियों के बारे में जाना था। आज के इस अंतिम भाग में हम जानेंगे कि बीसवीं सदी में भारत का औद्योगिक विकास कैसे हुआ। इसके साथ ही हम यह भी समझेंगे कि जब कारखानों में ढेरों सामान बनने लगा, तो ब्रिटिश और भारतीय निर्माताओं ने […]
Read Moreभाग 4: भारत में शुरुआती कारखाने और उद्यमी
पिछले भाग में हमने देखा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के गुमाश्तों और ब्रिटिश मिलों के कारण भारतीय बुनकरों का कैसे पतन हो गया। लेकिन क्या भारत में कारखाने नहीं खुले? बिल्कुल खुले! उन्नीसवीं सदी के मध्य से भारत में भी औद्योगिक विकास शुरू हो गया था। आज के इस भाग में हम जानेंगे कि […]
Read Moreभाग 3: भारतीय कपड़े का युग और गुमाश्तों की भूमिका
पिछले भाग में हमने जाना था कि उन्नीसवीं सदी में हाथ का श्रम मशीनों से कैसे टकरा रहा था और मज़दूरों का जीवन कितना कठिन था। अब हम यूरोप से निकलकर अपने देश ‘भारत’ की तरफ चलते हैं। कारखानों और मशीनों के आने से पहले पूरी दुनिया में भारत के सूती और रेशमी कपड़ों का […]
Read Moreभाग 2: हाथ का श्रम, वाष्प शक्ति और मज़दूरों का जीवन
हमें लगता है कि जब मशीनें आ गईं, तो सारे उद्योगपतियों ने तुरंत मशीनें खरीद ली होंगी और हाथ से काम करना बंद कर दिया होगा। लेकिन सच तो कुछ और ही था! उन्नीसवीं सदी के विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों से ज़्यादा इंसानी हाथों को पसंद करते थे। आइए जानते हैं ऐसा क्यों […]
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