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विनिर्माण उद्योग: अर्थ, महत्व, प्रकार और प्रमुख उद्योग — कक्षा 10 भूगोल | UP Board

कक्षा 10 की भूगोल की पुस्तक में ‘विनिर्माण उद्योग’ (Manufacturing Industries) नामक अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय हमें बताता है कि कैसे कच्चे माल से तैयार माल बनाया जाता है, और इस प्रक्रिया का हमारी अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है। UP Board के छात्रों के लिए यह चैप्टर परीक्षा में अच्छे अंक लाने का एक मजबूत आधार है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे विनिर्माण का अर्थ, इसके प्रकार, प्रमुख उद्योगों की विशेषताएँ, और उनसे जुड़े पर्यावरणीय मुद्दे। यह लेख आपकी तैयारी को आसान बना देगा।

एक बार की बात है, जब हरीश नाम का एक लड़का अपने माता-पिता के साथ दीवाली की खरीदारी करने बाजार गया। वहाँ उसने देखा कि दुकानें ढेर सारे सामान से भरी हुई थीं – जूते, कपड़े, चीनी, चाय, मिट्टी के दीये और बर्तन। उसे आश्चर्य हुआ कि इतनी सारी चीज़ें कैसे बनती हैं। तब उसके पिता ने समझाया कि कुछ चीज़ें बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में मशीनों से बनती हैं, कुछ छोटे कारखानों में और कुछ घरों में हाथ से। बस, यही समझ लो कि कच्चे पदार्थ को उपयोगी उत्पाद में बदलने की इस प्रक्रिया को ही विनिर्माण कहा जाता है। यही नहीं, इस प्रक्रिया से करोड़ों लोगों को रोज़गार मिलता है और देश की तरक्की होती है।

विनिर्माण का महत्व

किसी भी देश के आर्थिक विकास का मापदण्ड वहाँ के विनिर्माण उद्योगों की उन्नति को माना जाता है। विनिर्माण उद्योग कृषि के आधुनिकीकरण में मदद करते हैं और द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न कर कृषि पर निर्भरता कम करते हैं। देश का औद्योगिक विकास बेरोजगारी और गरीबी उन्मूलन के लिए आवश्यक है। भारत में सार्वजनिक और संयुक्त क्षेत्र के उद्योगों की स्थापना क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने के उद्देश्य से की गई थी। निर्मित वस्तुओं का निर्यात व्यापार को बढ़ाता है और विदेशी मुद्रा अर्जित करता है। विकसित देश वे हैं जो अपने कच्चे माल को मूल्यवान वस्तुओं में बदलने में सक्षम हैं। अतः भारत का विकास भी तीव्र औद्योगिक विकास पर निर्भर है।

उद्योग और कृषि: एक दूसरे के पूरक

कृषि और उद्योग एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। उदाहरण के लिए, भारत में कृषि-आधारित उद्योगों ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद की है। ये उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर होते हैं, और किसान इनके द्वारा निर्मित सिंचाई पंप, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनें आदि का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह, विनिर्माण उद्योगों के विकास से न केवल कृषि की उत्पादकता बढ़ी है बल्कि उत्पादन प्रक्रिया सक्षम हुई है। वैश्वीकरण के दौर में हमारे उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना होगा, जिसके लिए गुणवत्ता पर जोर देना जरूरी है।

उद्योगों का वर्गीकरण

दैनिक जीवन में हम अनेक प्रकार के उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं – ट्रांजिस्टर, बिजली के बल्ब, वनस्पति तेल, सीमेंट, काँच, पेट्रोल, माचिस, वाहन, दवाइयाँ आदि। अगर हम इन उद्योगों को कुछ मापदंडों पर वर्गीकृत करें तो इन्हें समझना आसान हो जाता है।

कच्चे माल के स्रोत के आधार पर

  • कृषि आधारित उद्योग: सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, पटसन, रेशम, चीनी, चाय, कॉफी, वनस्पति तेल आदि।
  • खनिज आधारित उद्योग: लोहा-इस्पात, सीमेंट, एल्युमिनियम, मशीन, पेट्रोरसायन आदि।

स्वामित्व के आधार पर

  • सार्वजनिक क्षेत्र: सरकार द्वारा संचालित, जैसे BHEL, SAIL।
  • निजी क्षेत्र: व्यक्तिगत या समूह द्वारा संचालित, जैसे टिस्को, बजाज ऑटो।
  • सहकारी उद्योग: कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले उत्पादकों या श्रमिकों का सामूहिक स्वामित्व, जैसे महाराष्ट्र की चीनी मिलें।

पूँजी निवेश के आधार पर

  • लघु उद्योग: अधिकतम निवेश सीमा (वर्तमान में एक करोड़ रुपये) तक।
  • बड़े उद्योग: इससे अधिक निवेश वाले।

भूमिका के आधार पर

  • आधारभूत उद्योग: जिन पर अन्य उद्योग निर्भर हों, जैसे लोहा-इस्पात, ताँबा प्रगलन, एल्युमिनियम प्रगलन।
  • उपभोक्ता उद्योग: जो उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं के काम आते हैं, जैसे चीनी, टूथपेस्ट, कागज, पंखे, सिलाई मशीन।

इसके अलावा, कच्चे और तैयार माल के भार के अनुसार भारी उद्योग (जैसे इस्पात) और हल्के उद्योग (जैसे विद्युतीय सामान) में भी बाँटा जाता है।

प्रमुख विनिर्माण उद्योग

सूती वस्त्र उद्योग

भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका विशेष स्थान है। प्राचीन काल में यह हाथ से कताई और हथकरघा बुनाई पर आधारित था। अठारहवीं शताब्दी के बाद विद्युत करघों का प्रयोग शुरू हुआ। औपनिवेशिक काल में इंग्लैंड की मशीन निर्मित कपड़े की प्रतिस्पर्धा से भारतीय उद्योग को हानि हुई। 1854 में मुंबई में पहली सफल सूती वस्त्र मिल स्थापित हुई। दो विश्व युद्धों के दौरान भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा मिला। वर्तमान में कताई मुख्यतः महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु में केंद्रित है, जबकि बुनाई पूरे देश में फैली है। खादी कुटीर उद्योग के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करती है। यह उद्योग कपास उत्पादकों, कताई करने वालों, रंगरेजों, डिजाइनरों, पैकर्स और सिलाई करने वालों को रोजगार देता है। इसके अतिरिक्त, रसायन, रंजक, पैकेजिंग और इंजीनियरिंग जैसे सहायक उद्योग भी विकसित होते हैं। मोटे तौर पर, भारत सूत उत्पादन में विश्वस्तरीय है, लेकिन बुने हुए वस्त्र की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है।

पटसन उद्योग

भारत पटसन और जूट उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक है तथा बांग्लादेश के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक। पहली पटसन मिल 1855 में कोलकाता के पास रिशरा में लगी। 1947 के विभाजन के बाद लगभग तीन-चौथाई पटसन उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में चला गया, लेकिन मिलें भारत में रहीं। वर्तमान में अधिकांश मिलें पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के 98 किमी लंबे और 3 किमी चौड़े संकरे पट्टे पर स्थित हैं। यहाँ इसके स्थानीयकरण के कई कारक हैं, जैसे पटसन उत्पादक क्षेत्रों की निकटता, सस्ता जल परिवहन, पर्याप्त जल, सस्ता श्रम और कोलकाता बंदरगाह की सुविधाएँ। यह उद्योग किसानों से लेकर मिल श्रमिकों तक, बड़ी संख्या में लोगों को आजीविका प्रदान करता है।

चीनी उद्योग

भारत विश्व में चीनी उत्पादन में दूसरे स्थान पर है, लेकिन गुड़ और खांडसारी उत्पादन में पहले स्थान पर। चीनी उद्योग मौसमी होने के कारण सहकारी क्षेत्र के लिए उपयुक्त है। इस उद्योग में गन्ना भारी कच्चा माल है और ढुलाई में इसकी सुक्रोज मात्रा कम हो जाती है, इसलिए मिलें उत्पादक क्षेत्रों के पास होती हैं। 60% मिलें उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्यों में भी इनकी संख्या बढ़ी है, क्योंकि वहाँ गन्ने में अधिक सुक्रोज और ठंडी जलवायु अनुकूल है, साथ ही सहकारी समितियाँ सफल रही हैं।

लोहा-इस्पात उद्योग

यह एक आधारभूत (Basic) भारी उद्योग है, जिस पर अनेक अन्य उद्योग निर्भर हैं। लोहा-इस्पात उत्पादन और खपत को देश के विकास का पैमाना माना जाता है। इस उद्योग के प्रमुख कच्चे माल हैं: लौह-अयस्क, कोकिंग कोल, चूना पत्थर (अनुपात 4:2:1) और थोड़ी मात्रा में मैंगनीज। ये सभी भारी एवं स्थूल होते हैं, इसलिए परिवहन लागत अधिक होने के कारण ये उद्योग कच्चे माल के स्रोतों के पास स्थापित होते हैं। भारत में अधिकांश इस्पात संयंत्र छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में केंद्रित हैं। प्रमुख इस्पात संयंत्र हैं: जमशेदपुर (टिस्को), बोकारो, भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला, विजयनगर, सेलम, बर्नपुर और विशाखापट्नम आदि। इस्पात का उपयोग इंजीनियरिंग, निर्माण, रक्षा, चिकित्सा, वैज्ञानिक उपकरणों से लेकर अनेक उपभोक्ता वस्तुओं तक में होता है।

एल्युमिनियम प्रगलन उद्योग

एल्युमिनियम एक हल्की, सुदृढ़ धातु है, जिसका उपयोग विमान, बर्तन, तार आदि बनाने में होता है। इस उद्योग में कच्चा माल बॉक्साइट है और प्रति टन उत्पादन के लिए अत्यधिक विद्युत (18,600 किलोवाट) की जरूरत होती है, इसलिए ये सस्ती विद्युत आपूर्ति के स्रोतों के निकट स्थापित होते हैं। भारत में एल्युमिनियम प्रगलन संयंत्र उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में हैं।

रसायन उद्योग

भारत में रसायन उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी लगभग 3% है। यह उद्योग आकार की दृष्टि से एशिया में तीसरे और विश्व में 12वें स्थान पर है। अकार्बनिक रसायनों में सल्फ्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, सोडा ऐश, कास्टिक सोडा आदि शामिल हैं, जिनका उपयोग उर्वरक, साबुन, काँच आदि बनाने में होता है। कार्बनिक रसायनों में पेट्रोसायन महत्वपूर्ण हैं, जो कृत्रिम वस्त्र, रबर, प्लास्टिक, रंजक और दवाएँ बनाने के काम आते हैं। पेट्रोरसायन उद्योग प्रायः तेल शोधनशालाओं के पास स्थापित होते हैं।

उर्वरक उद्योग

हरित क्रांति के बाद इस उद्योग का विस्तार हुआ। यह मुख्यतः नाइट्रोजनी उर्वरक (यूरिया), फॉस्फेटिक उर्वरक (DAP) और मिश्रित उर्वरकों का उत्पादन करता है। पोटाश का आयात करना पड़ता है क्योंकि देश में इसके भंडार नहीं हैं। गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पंजाब और केरल कुल उर्वरक उत्पादन का लगभग 50% उत्पादन करते हैं।

सीमेंट उद्योग

सीमेंट उद्योग निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक है। इसमें चूना पत्थर, सिलिका और जिप्सम जैसे भारी कच्चे माल की आवश्यकता होती है, इसलिए यह इकाइयाँ कच्चे माल के स्रोतों और बाजार के पास स्थापित होती हैं। पहला सीमेंट उद्योग 1904 में चेन्नई में लगाया गया। स्वतंत्रता के बाद इसका तेजी से विकास हुआ।

मोटरगाड़ी उद्योग

यह उद्योग यात्रियों और सामान के तीव्र परिवहन के लिए विभिन्न वाहनों का निर्माण करता है – ट्रक, बसें, कारें, मोटरसाइकिल, स्कूटर, तिपहिया वाहन। उदारीकरण के बाद इस उद्योग में अपार वृद्धि हुई है, विशेषकर कार और दोपहिया वाहनों की माँग बढ़ने से। प्रमुख निर्माण केंद्र हैं: दिल्ली, गुड़गाँव, मुंबई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर और बेंगलुरु।

सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग

इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में ट्रांजिस्टर से लेकर टेलीविजन, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और दूरसंचार उपकरण तक का निर्माण होता है। बेंगलुरु को ‘भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी’ कहा जाता है। अन्य प्रमुख केंद्र मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, कोलकाता और लखनऊ हैं। सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की सफलता के पीछे हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का निरंतर विकास है। सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क भारत के कई शहरों में स्थित हैं।

औद्योगिक प्रदूषण और उसका नियंत्रण

उद्योग आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण को भी क्षति पहुँचाते हैं। ये चार प्रकार के प्रदूषण फैलाते हैं: वायु, जल, भूमि और ध्वनि प्रदूषण।

  • वायु प्रदूषण: उद्योगों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, ठोस और द्रव कण वायु प्रदूषित करते हैं। भोपाल गैस त्रासदी इसका भयंकर उदाहरण है।
  • जल प्रदूषण: कागज, रसायन, वस्त्र, चमड़ा उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट नदियों को प्रदूषित करते हैं। इनमें भारी धातु, अम्ल, क्षार और कृत्रिम रसायन होते हैं।
  • तापीय प्रदूषण: कारखानों और तापघरों से गर्म पानी नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होता है।
  • भूमि प्रदूषण: कूड़ा-कर्कट, हानिकारक रसायन और औद्योगिक अवशेष भूमि को अनुपजाऊ बनाते हैं और भूमिगत जल को भी प्रदूषित करते हैं।
  • ध्वनि प्रदूषण: मशीनों, जेनरेटरों और निर्माण कार्यों से उत्पन्न अत्यधिक ध्वनि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

पर्यावरण संरक्षण के उपाय

  1. जल का न्यूनतम उपयोग और पुनर्चक्रण।
  2. वर्षा जल संग्रहण।
  3. गर्म जल और अपशिष्ट का नदियों में छोड़ने से पूर्व तीन चरणों में शोधन: प्राथमिक (यांत्रिक), द्वितीयक (जैविक), तृतीयक (रासायनिक, जैविक, भौतिक)।
  4. भूमिगत जल के अतिदोहन पर प्रतिबंध।
  5. वायु प्रदूषण कम करने के लिए ऊँची चिमनियाँ, एलेक्ट्रोस्टैटिक अवक्षेपण यंत्र और तेल/गैस का प्रयोग।
  6. ध्वनि नियंत्रण के लिए साइलेंसर, ध्वनि अवशोषक उपकरण और मशीनों का नियमित रखरखाव।
  7. हरित क्षेत्र का विकास और वृक्षारोपण।

विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना ही सतत् पोषणीय विकास का लक्ष्य है।

👨‍🏫 शिक्षक की सलाह: इस अध्याय से परीक्षा में अक्सर लोहा-इस्पात उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग और चीनी उद्योग के स्थानीयकरण कारकों पर 3-4 अंक के प्रश्न पूछे जाते हैं। साथ ही, औद्योगिक प्रदूषण और उसके नियंत्रण के उपाय भी एक महत्वपूर्ण टॉपिक है। मानचित्र कार्य में भारत के प्रमुख इस्पात संयंत्रों, सूती वस्त्र केंद्रों और सॉफ्टवेयर पार्कों को अवश्य याद करें।
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