खनन के प्रभाव और खनिज संरक्षण कक्षा 10 भूगोल के अंतर्गत ‘खनिज तथा ऊर्जा संसाधन’ पाठ का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस उप-पाठ में हम खनन से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों, पर्यावरणीय क्षति, मेघालय में रैट होल खनन, तथा खनिजों के संरक्षण की आवश्यकता और उपायों के बारे में विस्तार से जानेंगे। खनिज हमारे दैनिक जीवन के लिए अनिवार्य हैं, किंतु इनका अविवेकपूर्ण दोहन गंभीर समस्याएँ उत्पन्न करता है।
कल्पना कीजिए, आपने समाचारों में कभी देखा होगा कि किसी कोयला खदान में छत गिरने से कई मजदूर दब गए या किसी खदान में आग लगने से हफ्तों धुआँ निकलता रहा। ऐसी घटनाएँ खनन की खतरनाक वास्तविकता को दर्शाती हैं। इसी प्रकार, मेघालय के कुछ क्षेत्रों में परिवारों द्वारा संकरी सुरंगों में अवैध रूप से कोयला निकालना, जिसे रैट होल खनन कहते हैं, वहाँ के पर्यावरण और लोगों के जीवन को तबाह कर रहा है। आइए, खनन के इन्हीं प्रभावों और खनिज संरक्षण की अनिवार्यता को विस्तार से समझें।
खनन के जोखिम: खदान श्रमिकों को स्वास्थ्य संबंधी खतरे
खदानों में काम करने वाले श्रमिकों को अनेक प्रकार के स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ता है। खनन कार्यों से निकलने वाली धूल और धुएँ के कारण श्रमिकों को फेफड़ों की गंभीर बीमारियाँ हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, कोयला खदानों में कोयले की धूल के लगातार संपर्क में रहने से न्यूमोकोनियोसिस (काला फेफड़ा रोग) होता है, जबकि पत्थर की खदानों में सिलिका धूल के कारण सिलिकोसिस नामक बीमारी होती है। इन रोगों से फेफड़े कठोर हो जाते हैं और साँस लेना मुश्किल हो जाता है।
स्वास्थ्य जोखिमों के अतिरिक्त, खदानों में दुर्घटनाएँ भी आम हैं। छत गिरने (रूफ कोलैप्स) की घटनाएँ होती रहती हैं, जिससे श्रमिक फँस जाते हैं और जानें चली जाती हैं। भूमिगत खदानों में जलप्लावन (फ्लडिंग) एक और बड़ा खतरा है, खासकर बरसात के मौसम में। कोयला खदानों में आग लगने की घटनाएँ भी स्थाई खतरा हैं; झारखंड की झरिया कोयला खदानों में लगभग एक शताब्दी से आग जल रही है, जिसने वहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है।
खनन के पर्यावरणीय प्रभाव
खनन का पर्यावरण पर दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ता है। जल स्रोतों का संदूषण एक प्रमुख समस्या है। खदानों से निकलने वाले रसायन और भारी धातुएँ जैसे आर्सेनिक, सीसा, पारा आस-पास की नदियों और भूजल में मिल जाती हैं। इससे पीने का पानी विषाक्त हो जाता है और जलीय जीवन नष्ट होता है। अम्लीय खदान जल निकास (एसिड माइन ड्रेनेज) भी एक गंभीर चिंता है।
खनन से निकले अवशिष्ट और मलबे के ढेर भूमि क्षरण का कारण बनते हैं। विशाल क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी बंजर हो जाती है और मृदा अपघटन तेजी से होता है। खनन क्षेत्रों के आस-पास धूल का उठना वायु प्रदूषण को बढ़ाता है, जिससे स्थानीय निवासियों को श्वसन संबंधी बीमारियाँ होती हैं और कृषि उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
रैट होल खनन: मेघालय की अवैध प्रथा
रैट होल खनन खनन की एक अवैध और खतरनाक विधि है, जो मुख्यतः मेघालय राज्य में प्रचलित थी। इसमें परिवारों द्वारा संकरी सुरंगों (बिलों) से कोयला निकाला जाता है। इन सुरंगों का आकार इतना छोटा होता है कि केवल बच्चे ही इनमें रेंगकर प्रवेश कर सकते हैं। यह प्रथा अत्यधिक शोषणकारी है, क्योंकि इसमें बाल श्रम शामिल होता है और सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं होता।
वर्ष 2014 में, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने रैट होल खनन को अवैध घोषित करते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया। NGT ने पाया कि इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो रही है, जैसे वनों का विनाश, जल स्रोतों का दूषित होना और मिट्टी का कटाव। प्रतिबंध के बावजूद, कुछ क्षेत्रों में यह गुप्त रूप से जारी है।
खनिज संरक्षण की आवश्यकता
हमें खनिजों का संरक्षण करने की तत्काल आवश्यकता है क्योंकि ये अनवीकरणीय संसाधन हैं। जैसा कि हमने पिछले उप-पाठ खनिज: परिचय एवं महत्व में पढ़ा, खनिजों का निर्माण लाखों वर्षों में होता है, जबकि हमारी उपभोग दर बहुत तीव्र है। फलस्वरूप, समृद्ध अयस्क भंडार तेज़ी से घट रहे हैं। अब हमें खनिज निकालने के लिए अधिक गहराई में जाना पड़ रहा है, जिससे निकाले गए अयस्कों की गुणवत्ता भी घटती जा रही है।
खनिजों का सीमित भंडार भविष्य की आवश्यकताओं के लिए एक गंभीर चुनौती है। यदि हमने संरक्षण नहीं किया तो एक दिन ये पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे। इसलिए, सतत पोषणीय विकास की अवधारणा के तहत हमें इनका विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए।
खनिज संरक्षण के उपाय
खनिजों के संरक्षण के लिए हम कई उपाय अपना सकते हैं। निम्न कोटि अयस्कों के उपयोग के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी का विकास करना आवश्यक है। पहले जिन अयस्कों को बेकार समझा जाता था, आधुनिक तकनीकों से उन से भी धातुएँ निकाली जा सकती हैं।
धातुओं का पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) एक महत्वपूर्ण उपाय है। स्क्रैप धातुओं को पिघलाकर दोबारा उपयोग में लाने से नए खनन की आवश्यकता घटती है। इसके साथ ही, जहाँ संभव हो, हमें खनिजों के प्रतिस्थापनों (विकल्पों) का प्रयोग करना चाहिए, जैसे प्लास्टिक, सिरेमिक या अन्य कृत्रिम पदार्थ।
खनिजों का संतत पोषणीय उपयोग आवश्यक है, अर्थात हम इतना ही उपयोग करें कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बचा रहे। भारत में अधिकांश खनिजों का राष्ट्रीयकरण किया जा चुका है, और सरकारी अनुमति के बिना खनन करना अवैध है। सरकार द्वारा खनन नीतियों में संरक्षण को बढ़ावा दिया जाता है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: खनिज: परिचय एवं महत्व
- भाग 2: खनिजों का वर्गीकरण तथा शैल समूहों में उपलब्धता
- भाग 3: भारत में प्रमुख खनिजों का वितरण (धात्विक एवं अधात्विक)
- You are Reading Here: खनन के प्रभाव एवं खनिज संरक्षण
- भाग 5: ऊर्जा संसाधन: परंपरागत स्रोत
- भाग 6: ऊर्जा संसाधन: गैर-परंपरागत स्रोत एवं संरक्षण