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ऊर्जा संसाधन: गैर-परंपरागत स्रोत एवं संरक्षण

गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत वे हैं जो नवीकरणीय होते हैं और प्राकृतिक रूप से पुनः उत्पन्न होते रहते हैं। ये स्रोत पर्यावरण के अनुकूल हैं और इनसे प्रदूषण नहीं फैलता। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस, ज्वारीय ऊर्जा और भू-तापीय ऊर्जा प्रमुख गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत हैं। इन स्रोतों का विकास एवं उपयोग हमें जीवाश्म ईंधनों पर हमारी निर्भरता कम करने में मदद करता है। ऊर्जा संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, जिसके द्वारा हम सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सतत विकास की ओर बढ़ सकते हैं।

कल्पना कीजिए, आपके खेत में लगा सौर पंप दिन भर सूर्य के प्रकाश से बिजली बनाकर सिंचाई करता है, या आपके गाँव का बायोगैस संयंत्र खाना पकाने का ईंधन देता है। ये सब गैर-परंपरागत ऊर्जा के जीवंत उदाहरण हैं। ये स्रोत न केवल दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों को ऊर्जा प्रदान करते हैं बल्कि हमारे जीवन स्तर को सुधारने में भी सहायक हैं।

गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का बढ़ता महत्व

पारंपरिक ऊर्जा स्रोत जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। इनके अंधाधुंध दोहन से न केवल ये समाप्त हो रहे हैं बल्कि पर्यावरण में प्रदूषण भी बढ़ रहा है। दूसरी ओर, गैर-परंपरागत स्रोत अक्षय हैं। ये कभी समाप्त नहीं होते। उदाहरण के लिए, सूर्य का प्रकाश और पवन सदैव उपलब्ध रहते हैं। इसलिए, ऊर्जा सुरक्षा और हरित भविष्य के लिए इन नवीकरणीय स्रोतों पर ध्यान देना अत्यावश्यक है। सरकार भी विभिन्न योजनाओं जैसे ‘नेशनल सोलर मिशन’ के माध्यम से इन्हें बढ़ावा दे रही है।

प्रमुख गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत और भारत में उनकी स्थिति

सौर ऊर्जा

सौर ऊर्जा वह ऊर्जा है जो सूर्य के प्रकाश से प्राप्त होती है। यह सबसे प्रचुर और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी के द्वारा सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत में बदला जाता है। भारत में सौर ऊर्जा का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है। सौर लालटेन, सौर कुकर और सौर जल-पंप जैसे उपकरण लोकप्रिय हो रहे हैं। बड़े पैमाने पर सौर संयंत्र गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में स्थापित किए गए हैं। भारत में सौर ऊर्जा की विशाल संभावनाएँ हैं क्योंकि अधिकांश भाग में वर्ष भर पर्याप्त धूप रहती है। भारत सरकार ने 2022 तक 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा था और राष्ट्रीय स्तर पर सोलर पार्क विकसित किए जा रहे हैं। अनुमान है कि भारत लगभग 5000 ट्रिलियन किलोवॉट घंटा प्रति वर्ष सौर ऊर्जा प्राप्त कर सकता है।

पवन ऊर्जा

पवन ऊर्जा का उपयोग पवन चक्कियों (विंडमिल) के द्वारा किया जाता है। पवन चक्की की पंखुड़ियाँ हवा से घूमती हैं और जनरेटर चलाकर विद्युत उत्पादन करती हैं। भारत में पवन ऊर्जा का उत्पादन मुख्यतः तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों में होता है। तमिलनाडु का नागरकोइल-मदुरई पेटी क्षेत्र पवन ऊर्जा के लिए अत्यधिक प्रभावी है। राजस्थान का जैसलमेर भी पवन ऊर्जा का महत्वपूर्ण केंद्र है। भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगभग 40 गीगावॉट से अधिक है तथा यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। भारत में लगभग 300 गीगावॉट पवन ऊर्जा उत्पादन की क्षमता का अनुमान है।

बायोगैस

बायोगैस एक जैविक ईंधन है जो झाड़ियों, कृषि अपशिष्ट, पशुओं के गोबर और अन्य जैव पदार्थों के अपघटन से बनता है। इसमें मुख्यतः मीथेन गैस होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस प्लांट बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इससे दोहरा लाभ होता है: एक तो स्वच्छ ईंधन प्राप्त होता है जिसका उपयोग खाना पकाने और प्रकाश करने में किया जा सकता है, दूसरा अपशिष्ट से उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद प्राप्त होती है। यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है। इस प्रकार, बायोगैस संयंत्र ग्रामीण भारत में ऊर्जा और कृषि दोनों क्षेत्रों में क्रांति ला सकते हैं।

ज्वारीय ऊर्जा

समुद्र में ज्वार-भाटा के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा को ज्वारीय ऊर्जा कहते हैं। यह ऊर्जा भी नवीकरणीय होती है। भारत में कुछ स्थानों पर ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन की आदर्श दशाएँ पाई जाती हैं, जैसे खम्भात की खाड़ी (गुजरात), कच्छ की खाड़ी (गुजरात) और सुंदरवन (पश्चिम बंगाल)। इन क्षेत्रों में ज्वारीय ऊर्जा परियोजनाएँ विकसित की जा रही हैं। इस दिशा में अनुसंधान जारी है। हालांकि, यह तकनीक अभी महँगी है, परंतु भविष्य में ऊर्जा का एक विश्वसनीय स्रोत हो सकती है।

भू-तापीय ऊर्जा

पृथ्वी के आंतरिक भाग में अत्यधिक तापमान होता है। जब यह ताप भूपृष्ठ के समीप आता है, तो भू-तापीय ऊर्जा के रूप में उपयोग किया जा सकता है। भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाएँ हिमाचल प्रदेश के मणिकरण और लद्दाख की पूरा घाटी में हैं। इन स्थानों पर गर्म पानी के सोते निकलते हैं, जिनका उपयोग घरों को गर्म करने और विद्युत उत्पादन में किया जा सकता है। भू-तापीय ऊर्जा का उपयोग हीटिंग सिस्टम और विद्युत उत्पादन दोनों में किया जा सकता है। मणिकरण परियोजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

ऊर्जा संरक्षण: क्यों और कैसे?

ऊर्जा की बढ़ती माँग और सीमित संसाधनों के कारण ऊर्जा संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है। यदि हम ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं करेंगे, तो भावी पीढ़ियों के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। सतत विकास की अवधारणा में ऊर्जा संरक्षण शामिल है। इसके लिए हमें निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिए:

  • सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें, जिससे पेट्रोल-डीजल की बचत हो।
  • जब आवश्यकता न हो तो बिजली के उपकरण बंद कर दें।
  • कुशल उपकरणों जैसे एलईडी बल्ब, स्टार-रेटेड उपकरणों का प्रयोग करें।
  • गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दें।
  • ऊर्जा की बचत को अपनी आदत बनाएँ।

याद रखिए, “ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा उत्पादन है।”

हम सभी को मिलकर ऊर्जा संरक्षण की आदत डालनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी संसाधनों का लाभ उठा सकें।

👨🏫 शिक्षक की सलाह: बच्चों, इस अध्याय में प्रमुख गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों और उनके भारत में स्थानों पर विशेष ध्यान दें। बोर्ड परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि नागरकोइल, जैसलमेर, मणिकरण आदि किस ऊर्जा से संबंधित हैं। साथ ही, बायोगैस संयंत्र के दोहरे लाभ और ऊर्जा संरक्षण के उपाय भी महत्वपूर्ण हैं। ‘गैर-परंपरागत और परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में अंतर’ लिखने का प्रश्न अवश्य आता है, इसलिए इसकी तैयारी करें।
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