मुद्रा और साख कक्षा 10 के अर्थशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है, जो हमारे दैनिक आर्थिक जीवन की आधारशिला रखता है। इस लेख में आपको यूपी बोर्ड एवं अन्य राज्य बोर्डों के लिए मुद्रा और साख के नोट्स, मुद्रा के आधुनिक रूप, बैंकिंग प्रणाली, ऋण की शर्तें, औपचारिक व अनौपचारिक साख, स्वयं सहायता समूह और डिजिटल भुगतान के बारे में सरल और सटीक जानकारी मिलेगी। यहाँ मुद्रा और साख पाठ के प्रत्येक पहलू को उदाहरणों और महत्वपूर्ण प्रश्नों के साथ समझाया गया है, ताकि आप बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें।
- भाग 1: मुद्रा: विनिमय का माध्यम
- भाग 2: मुद्रा के आधुनिक रूप और बैंकों की भूमिका
- भाग 3: साख (ऋण) की अवधारणा और ऋण की शर्तें
- भाग 4: औपचारिक और अनौपचारिक साख के स्रोत
- भाग 5: स्वयं सहायता समूह और कर्जदारों की पहुँच
राहुल एक छोटा-सा दुकानदार है। हर दिन वह ग्राहकों को सामान बेचता है और बदले में उनसे रुपए लेता है। इन रुपयों से वह थोक व्यापारी से नया माल खरीदता है, बिजली-पानी का बिल भरता है और अपनी बचत बैंक में जमा करता है। कभी-कभी जब त्योहारों पर सामान की माँग बढ़ जाती है, तो उसे अतिरिक्त पूँजी की जरूरत होती है और वह बैंक से ऋण ले लेता है। इस तरह मुद्रा और साख उसके व्यवसाय की रीढ़ हैं। आइए, समझते हैं कि आखिर मुद्रा है क्या, बैंक कैसे काम करते हैं और साख का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
मुद्रा: विनिमय का माध्यम
प्राचीन काल में जब मुद्रा नहीं थी, तब लोग वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) का उपयोग करते थे। इसमें एक वस्तु को दूसरी वस्तु से सीधे बदला जाता था। उदाहरण के लिए, एक किसान अपने गेहूँ को एक जूता निर्माता को देकर बदले में जूते ले सकता था। लेकिन इसमें बड़ी समस्या थी – आवश्यकताओं का दोहरा संयोग (Double Coincidence of Wants) का होना आवश्यक था। अगर जूते बनाने वाले को गेहूँ नहीं चाहिए होता बल्कि कपड़ा चाहिए होता, तो यह लेन-देन संभव नहीं हो पाता।
मुद्रा ने इस समस्या का समाधान किया। मुद्रा विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange) बनकर सभी लेन-देनों को सरल बना देती है। अब कोई भी व्यक्ति अपनी वस्तु या सेवा को पहले मुद्रा में बदलता है और फिर उस मुद्रा से अपनी इच्छानुसार किसी भी अन्य वस्तु या सेवा को खरीद सकता है। इसलिए हर कोई मुद्रा में भुगतान लेना पसंद करता है।
मुद्रा के आधुनिक रूप
वर्तमान में मुद्रा के दो मुख्य आधुनिक रूप हैं – करेंसी (Currency) और बैंकों में माँग जमाएँ (Demand Deposits)।
करेंसी
करेंसी में कागज़ के नोट और सिक्के शामिल हैं। भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) केंद्र सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है। कानूनी रूप से, कोई भी व्यक्ति रुपयों में भुगतान अस्वीकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि आधुनिक मुद्रा का अपना कोई उपयोग मूल्य नहीं होता (जैसे सोना-चाँदी के सिक्कों का होता था), बल्कि इसे सरकार के आदेश से स्वीकार किया जाता है। इसे विधिमान्य मुद्रा (Legal Tender) कहते हैं।
बैंकों में जमा और चैक
लोग अपना अतिरिक्त धन बैंकों में जमा करते हैं, जिसे माँग जमा कहते हैं क्योंकि माँगने पर इसे तुरंत निकाला जा सकता है। बैंक इन जमाओं पर ब्याज भी देते हैं। माँग जमा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके आधार पर हम चैक (Cheque) के माध्यम से बिना नकदी के भुगतान कर सकते हैं। चैक बैंक को एक आदेश होता है कि वह हमारे खाते से एक निश्चित राशि किसी अन्य व्यक्ति को दे। इस प्रकार, बिना नकदी का उपयोग किए भी माँग जमा भुगतान का साधन बन जाती है। इसीलिए इसे भी मुद्रा का हिस्सा माना जाता है।
नवंबर 2016 में भारत सरकार ने विमुद्रीकरण (Demonetisation) की नीति लागू कर 500 और 1000 के पुराने नोटों को अमान्य कर दिया। इसका उद्देश्य नकदी पर निर्भरता घटाना, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना था। इसके बाद से मोबाइल वॉलेट, UPI, RTGS जैसे नकदीरहित लेन-देन (Cashless Transactions) तेजी से लोकप्रिय हुए।
बैंकों की ऋण गतिविधियाँ
बैंक जनता से जमा राशि स्वीकार करते हैं और उसके एक बड़े भाग का उपयोग ऋण देने में करते हैं। भारत में बैंकों को जमा का लगभग 5% नकद अपने पास रखना होता है (यह RBI द्वारा निर्धारित होता है), शेष राशि ऋण के रूप में दे दी जाती है। यह संभव इसलिए हो पाता है क्योंकि सभी जमाकर्ता एक साथ अपना पैसा निकालने नहीं आते।
बैंक जमाकर्ताओं (Depositors) और कर्जदारों (Borrowers) के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं। वे जमा पर कम ब्याज देते हैं और ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं। यही अंतर बैंक की आय का मुख्य स्रोत है।
साख और ऋण की शर्तें
साख (Credit) का अर्थ है कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ प्रदान करना और बाद में भुगतान का वादा लेना। लेकिन हर ऋण समान नहीं होता। ऋण समझौते में मुख्यतः चार बातें तय होती हैं – ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार (Collateral), आवश्यक दस्तावेज़ और भुगतान की शर्तें। समर्थक ऋणाधार वह संपत्ति है जिसे कर्जदार गारंटी के रूप में रखता है, जैसे – ज़मीन, भवन, वाहन, पशु, बैंक जमा आदि। यदि कर्ज वापस न किया जाए, तो ऋणदाता इस संपत्ति को बेचकर अपनी रकम वसूल सकता है।
ऋण की शर्तें कर्जदार की स्थिति को बेहतर या बदतर दोनों बना सकती हैं। उदाहरण के लिए सलीम (जूता निर्माता) ने त्योहारों के लिए ऋण लेकर उत्पादन बढ़ाया और मुनाफा कमाया – यहाँ ऋण ने सकारात्मक भूमिका निभाई। दूसरी ओर स्वप्ना (छोटी किसान) फसल खराब होने के कारण कर्ज नहीं चुका सकी और उसे ज़मीन बेचनी पड़ी – यह कर्ज-जाल (Debt Trap) का दुष्चक्र है। अतः ऋण विकास में सहायक भी हो सकता है और विनाशकारी भी, यह ऋण की शर्तों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
औपचारिक और अनौपचारिक साख के स्रोत
भारत में साख के दो प्रमुख प्रकार के स्रोत हैं – औपचारिक और अनौपचारिक।
औपचारिक स्रोत
इनमें वाणिज्यिक बैंक, सहकारी समितियाँ और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक आते हैं। ये संस्थाएँ भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नियंत्रित होती हैं। RBI सभी बैंकों पर नज़र रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि बैंक न केवल व्यावसायिक वर्ग को बल्कि किसानों, छोटे उद्यमियों और गरीबों को भी ऋण दें। औपचारिक ऋणों की ब्याज दरें अपेक्षाकृत कम और नियमित होती हैं, लेकिन इनके लिए समर्थक ऋणाधार और कागजी दस्तावेज़ों की जरूरत अधिक होती है।
अनौपचारिक स्रोत
गाँवों में साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार, मित्र और ज़मींदार अनौपचारिक साख के स्रोत हैं। इनसे ऋण लेना आसान होता है, क्योंकि ये व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं और कई बार बिना ऋणाधार के भी दे देते हैं, लेकिन इनकी ब्याज दरें बहुत अधिक (60% वार्षिक तक) हो सकती हैं। अक्सर गरीब लोग इनके चंगुल में कर्ज-जाल में फँस जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि औपचारिक ऋण का दायरा बढ़े और गरीबों तक आसान शर्तों पर ऋण पहुँचे।
स्वयं सहायता समूह (SHGs) – गरीबों के लिए नई उम्मीद
ग्रामीण क्षेत्रों की निर्धन महिलाओं को औपचारिक ऋण दिलाने के लिए स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups) एक प्रभावी मॉडल साबित हुए हैं। 15-20 सदस्यों का यह समूह नियमित बचत करता है और आपस में छोटे-छोटे ऋण देता है। कुछ समय बाद समूह बैंक से ऋण लेने योग्य हो जाता है। बैंक, समूह के नाम से ऋण देते हैं, जिसकी अदायगी की जिम्मेदारी पूरे समूह की होती है। इस प्रकार, बिना ऋणाधार की समस्या के भी गरीब महिलाओं को सस्ती दर पर ऋण मिल जाता है। इसके साथ ही समूह की बैठकों में स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी चर्चा होती है, जिससे महिलाओं का सशक्तिकरण होता है।
प्रो. मोहम्मद युनूस, ग्रामीण बैंक के संस्थापक (नोबेल शांति पुरस्कार-2006) का कथन है – “यदि गरीबों को उचित शर्तों पर ऋण दिया जाए, तो लाखों छोटे प्रयास मिलकर विकास का सबसे बड़ा चमत्कार रच सकते हैं।”
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