आर्थिक विकास के साथ किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया रही है। तृतीयक क्षेत्रक, जिसे सेवा क्षेत्रक भी कहा जाता है, आज विकसित और विकासशील दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं में सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रक बनकर उभरा है। भारत में भी यह क्षेत्रक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और रोज़गार दोनों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। आइए, इस लेख में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों के विकास क्रम और भारत में सेवा क्षेत्रक के बढ़ते प्रभुत्व के कारणों एवं चुनौतियों को समझें।
आपने गाँव-देहात में देखा होगा कि पहले ज़्यादातर लोग खेती-बाड़ी पर निर्भर थे। धीरे-धीरे छोटे-बड़े कारखाने लगने लगे, लोग नौकरी के लिए शहरों की ओर जाने लगे। आज बड़े शहरों में बैंक, अस्पताल, आईटी कंपनियाँ, कॉल सेंटर जैसी सेवाएँ सबसे ज़्यादा रोज़गार देती हैं। यह बदलाव सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हुआ है।
क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास
विकासशील देशों में शुरुआत में प्राथमिक क्षेत्रक का दबदबा रहता है। कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, खनन आदि प्रमुख गतिविधियाँ हैं। अधिकांश जनसंख्या जीविका के लिए प्रकृति पर निर्भर होती है। ऐसी अर्थव्यवस्थाएँ मुख्यतः ग्रामीण एवं पारंपरिक होती हैं। जैसे-जैसे तकनीक और मशीनों का विकास होता है, द्वितीयक क्षेत्रक (विनिर्माण और निर्माण) का विस्तार होता है। औद्योगीकरण से कारखाने, निर्माण कार्य, बिजली उत्पादन आदि बढ़ते हैं। श्रमिक खेतों से कारखानों की ओर रुख करते हैं। विकसित राष्ट्रों में, जहाँ आय स्तर ऊँचा होता है, लोग अधिक सेवाओं की माँग करते हैं। परिणामस्वरूप, तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ा बन जाता है। इसमें बैंकिंग, बीमा, परिवहन, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन जैसी सेवाएँ शामिल हैं। यह तृतीयक क्षेत्रक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाता है और रोज़गार एवं उत्पादन में प्राथमिक एवं द्वितीयक क्षेत्रकों को पीछे छोड़ देता है। इस क्रम को ‘आर्थिक विकास की मंज़िलें’ कहा जा सकता है। यह प्रक्रिया विश्व के लगभग सभी देशों में देखने को मिलती है, हालाँकि इसकी गति और समय भिन्न-भिन्न हो सकता है।
भारत में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्व
भारत में भी यही प्रवृत्ति देखने को मिलती है। आज़ादी के बाद पहले दशकों में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे अधिक रोज़गार और उत्पादन देता था। फिर हरित क्रांति, उद्योगों की स्थापना और आर्थिक सुधारों से द्वितीयक क्षेत्रक का विस्तार हुआ। वर्तमान में, तृतीयक क्षेत्रक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 50% से अधिक योगदान दे रहा है और यह सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन चुका है। रोज़गार के मामले में भले ही अभी भी प्राथमिक क्षेत्रक बड़ा है, पर तृतीयक क्षेत्रक तेजी से रोज़गार सृजन कर रहा है और भविष्य में इसकी भूमिका और बढ़ने वाली है।
तृतीयक क्षेत्रक के विकास के प्रमुख कारण
(क) बुनियादी सेवाओं की आवश्यकता
किसी भी समाज को चलाने के लिए सरकारी प्रशासन, पुलिस, अदालतें, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सेवाएँ अनिवार्य हैं। इन सेवाओं का विस्तार अपने आप में तृतीयक क्षेत्रक को बढ़ाता है। सरकार इनपर बहुत अधिक खर्च करती है जिससे रोज़गार उत्पन्न होता है और अर्थव्यवस्था सुचारू चलती है।
(ख) कृषि और उद्योग का विकास
प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के विकास के साथ परिवहन, भंडारण (गोदाम), संचार और व्यापार जैसी सहायक सेवाओं की माँग बढ़ती है। उदाहरण के लिए, खाद्यान्न को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए ट्रक, रेलगाड़ी, जहाज़ चाहिए। कारखाने में बने माल को गोदामों में रखना पड़ता है। ये सभी सेवाएँ तृतीयक क्षेत्रक का हिस्सा बनती हैं और इनका तेज़ी से विस्तार होता है। क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता का यह सबसे अच्छा उदाहरण है।
(ग) बढ़ती आय और उपभोक्ता सेवाएँ
जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ती है, वे अधिक सुविधाएँ चाहते हैं—रेस्तरां, पर्यटन, निजी अस्पताल, शॉपिंग मॉल, होटल, मनोरंजन आदि। इसके चलते इन सेवाओं का बाज़ार फैलता है। लोग अब केवल आवश्यक वस्तुओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए खर्च करते हैं। इससे तृतीयक क्षेत्रक में अनेक नई नौकरियाँ पैदा होती हैं।
(घ) सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का विस्मयकारी विकास
पिछले दो दशकों में कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट के प्रसार ने नए प्रकार की सेवाएँ जन्म दी हैं। कॉल सेंटर, सॉफ्टवेयर विकास, आईटी कंसल्टेंसी, ई-कॉमर्स, बैंकिंग सेवाएँ तेज़ी से बढ़ी हैं। भारत इस क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनकर उभरा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम जैसे शहर आईटी हब बन गए हैं। इसने सेवा क्षेत्रक को एक नई पहचान दी है और युवाओं के लिए उच्च-कौशल रोज़गार के अवसर पैदा किए हैं।
सेवा क्षेत्रक में विषमताएँ और चुनौतियाँ
हालाँकि तृतीयक क्षेत्रक का योगदान बहुत अधिक है, किंतु इसमें कई विषमताएँ हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रोज़गार का एक बड़ा भाग असंगठित क्षेत्रक में है। बहुत कम लोग उच्च कौशल वाले, स्थायी और उच्च वेतन वाले रोज़गार (जैसे आईटी पेशेवर, प्रबंधक, डॉक्टर, इंजीनियर) में हैं। ज़्यादातर लोग छोटी दुकानों, रेहड़ी-पटरी, ऑटो-टैक्सी चलाने, स्थानीय परिवहन, छोटे होटल-ढाबों जैसे कम आय वाले कामों में लगे हुए हैं। इन श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा, नियमित वेतन, भविष्य निधि, चिकित्सा सुविधा जैसी सुविधाएँ नहीं मिलतीं। इसलिए, तृतीयक क्षेत्रक के विकास का लाभ सभी को समान रूप से नहीं मिल पाता। इस विषमता को दूर करने के लिए रोज़गार सृजन की नीतियों और कौशल विकास पर ज़ोर दिया जा रहा है। सरकार कौशल भारत जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को बेहतर रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराना चाहती है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- भाग 2: क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- भाग 3: भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान
- You are Reading Here: क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- भाग 5: बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
- भाग 6: संगठित, असंगठित और स्वामित्व आधारित क्षेत्रक