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क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना

क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना कक्षा 10 की सामाजिक विज्ञान की अर्थशास्त्र इकाई का एक मूलभूत उप-पाठ है। इस भाग में हम यह जानेंगे कि प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक एक-दूसरे पर किस प्रकार निर्भर हैं तथा किसी देश की राष्ट्रीय आय या कुल उत्पादन का माप कैसे किया जाता है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सकल मूल्य वर्धित (GVA) की अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए अंतिम वस्तुओं एवं मध्यवर्ती वस्तुओं के बीच अंतर को समझना बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रोज़मर्रा के जीवन का एक सामान्य उदाहरण लें—मान लीजिए आप बाज़ार से एक पैकेट बिस्कुट खरीदते हैं। यह बिस्कुट आप तक पहुँचने से पहले कई चरणों से गुज़रता है। सबसे पहले किसान खेत में गेहूँ उगाता है—यह प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधि है। किसान उस गेहूँ को एक आटा मिल को बेचता है, जो उसे पीसकर आटा तैयार करती है—यह द्वितीयक क्षेत्रक में विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) का कार्य है। अब आटा एक बिस्कुट निर्माता कंपनी के पास जाता है, जो उसमें अन्य सामग्री मिलाकर स्वादिष्ट बिस्कुट बनाती है—यह भी द्वितीयक क्षेत्रक ही है। इसके बाद बिस्कुट को देशभर की दुकानों तक पहुँचाने के लिए परिवहन, गोदाम, थोक विक्रेता, खुदरा व्यापारी और विज्ञापन एजेंसियों की आवश्यकता पड़ती है—ये सभी तृतीयक क्षेत्रक की सेवाएँ हैं। यहाँ तक कि किसान को खाद, बीज और ट्रैक्टर जैसे औजार भी द्वितीयक क्षेत्रक से मिलते हैं। अतः एक छोटे से बिस्कुट के पैकेट के पीछे तीनों क्षेत्रकों की आपसी निर्भरता का एक जटिल जाल है।

आर्थिक क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता

अर्थव्यवस्था को सुविधा के लिए तीन भागों में बाँटा गया है—प्राथमिक (कृषि एवं संबद्ध गतिविधियाँ), द्वितीयक (विनिर्माण एवं निर्माण), और तृतीयक (सेवाएँ)। ये तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं; कोई भी क्षेत्रक अकेला कार्य नहीं कर सकता। प्राथमिक क्षेत्रक प्रकृति से सीधे संसाधन प्राप्त करता है—जैसे फसलें, दूध, खनिज। यह कच्चा माल द्वितीयक क्षेत्रक को भेजा जाता है, जहाँ उसे उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है। बदले में, द्वितीयक क्षेत्रक प्राथमिक क्षेत्रक को ट्रैक्टर, उर्वरक, सिंचाई पंप आदि प्रदान करता है। तृतीयक क्षेत्रक इन दोनों को आवश्यक सेवाएँ—बैंकिंग, बीमा, परिवहन, संचार—देता है ताकि उत्पादन सुचारू रूप से चल सके। इस प्रकार, यह एक आर्थिक चक्र है जहाँ हर क्षेत्रक दूसरे को सहयोग करता है और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराता है।

प्राथमिक से द्वितीयक क्षेत्रक का संबंध

प्राथमिक क्षेत्रक के बिना द्वितीयक क्षेत्रक अधूरा है। कपड़ा मिलों को कपास चाहिए, इस्पात कारखानों को लौह अयस्क, चीनी मिलों को गन्ना। ये सभी कच्चे माल प्राथमिक गतिविधियों से प्राप्त होते हैं। इसीलिए प्राथमिक क्षेत्रक को द्वितीयक क्षेत्रक की नींव कहा जाता है। दूसरी ओर, द्वितीयक क्षेत्रक उन्नत तकनीक और मशीनें प्रदान कर प्राथमिक क्षेत्रक की उत्पादकता बढ़ाता है।

द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक की साझेदारी

द्वितीयक क्षेत्रक का उत्पादन तैयार माल है जिसे बाज़ार तक पहुँचाने के लिए तृतीयक सेवाओं—परिवहन, विज्ञापन, भंडारण—की ज़रूरत होती है। बिना इन सेवाओं के माल उपभोक्ताओं तक नहीं पहुँच सकता। वहीं, तृतीयक क्षेत्रक को कंप्यूटर, फर्नीचर, वाहन, दवाइयाँ जैसी भौतिक वस्तुएँ द्वितीयक क्षेत्रक ही देता है। अतः दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

उत्पादन की तुलना कैसे करें: GDP और GVA

देश की अर्थव्यवस्था के आकार और विकास को मापने के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) एक प्रमुख पैमाना है। GDP किसी देश की घरेलू सीमा के अंदर एक वित्त वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल बाज़ार मूल्य है। ‘अंतिम’ का अभिप्राय उन चीज़ों से है जो सीधे उपभोक्ता के पास जाती हैं और आगे किसी उत्पादन प्रक्रिया में नहीं जातीं। इसके विपरीत, मध्यवर्ती वस्तुएँ (जैसे गेहूँ, आटा, स्टील शीट) वे हैं जो अन्य वस्तुओं के निर्माण में काम आती हैं। यदि हम मध्यवर्ती वस्तुओं के मूल्य भी GDP में जोड़ दें तो मूल्य का दोहराव (डबल-काउंटिंग) हो जाता है, जिससे GDP का आकार वास्तविकता से बड़ा दिखाई देता है। इस समस्या से बचने के लिए केवल अंतिम उत्पादन को ही गिना जाता है।

सकल मूल्य वर्धित (GVA) का उपयोग

दोहरे मूल्यांकन की समस्या का एक विकल्प है—मूल्य वर्धित विधि। इसके अनुसार, हम हर क्षेत्रक द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में जोड़े गए मूल्य को अलग-अलग जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, उपर्युक्त बिस्कुट के मामले में किसान ने ₹20 का मूल्य वर्धित किया (गेहूँ का बाज़ार मूल्य), मिल ने ₹5 (आटे का मूल्य – गेहूँ का मूल्य), और बिस्कुट कंपनी ने ₹55 (बिस्कुट का मूल्य – आटे का मूल्य) जोड़े। इन सबका योग ₹20+₹5+₹55 = ₹80 हुआ, जो अंतिम उत्पाद के मूल्य के बराबर है। सरकारी आँकड़ों में GVA और GDP दोनों का प्रयोग किया जाता है; GVA में उत्पाद कर शामिल करने पर GDP प्राप्त होता है।

अंतिम और मध्यवर्ती वस्तुओं की पहचान

छात्र अक्सर भ्रमित हो जाते हैं कि कौन सी वस्तु कब अंतिम और कब मध्यवर्ती होती है। इसका निर्णय उपयोग पर निर्भर करता है। यदि कोई वस्तु उत्पादन प्रक्रिया में प्रयोग हो रही है, तब वह मध्यवर्ती है; यदि सीधे उपभोग के लिए है, तो अंतिम। मशीन का क्रय किसी कारखाने द्वारा किया जाए तो वह एक स्थायी पूँजीगत वस्तु है और अंतिम मानी जाएगी, परंतु गेहूँ का क्रय यदि कोई घरेलू उपभोक्ता करे तो वह अंतिम है। परंतु यदि वही गेहूँ एक मिल खरीदती है तो वह मध्यवर्ती हो जाता है। इसलिए किसी वस्तु का वर्गीकरण लेन-देन के संदर्भ पर निर्भर करता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत सरकार का केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) GDP और GVA दोनों के आँकड़े जारी करता है। GVA उत्पादन के आधार पर और GDP व्यय अथवा आय के आधार पर निकाला जाता है। दोनों लगभग समान होते हैं। हाल ही में GDP की गणना का आधार वर्ष बदल कर 2011-12 कर दिया गया है।

कुल मिलाकर, क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता को समझने से अर्थव्यवस्था के सुचारू संचालन का बोध होता है और GDP संबंधी अवधारणाएँ राष्ट्रीय आय लेखांकन की नींव हैं। यह उप-पाठ न केवल बोर्ड परीक्षा बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए भी उपयोगी है।

👨🏫 शिक्षक की सलाह: बच्चों, इस उप-पाठ में मुख्य रूप से तीन बातों पर ध्यान दो—तीनों क्षेत्रकों की एक-दूसरे पर निर्भरता, अंतिम और मध्यवर्ती वस्तुओं का अंतर, तथा GDP गणना में केवल अंतिम मूल्य लेने का कारण। बोर्ड परीक्षाओं में प्रायः ‘GDP की गणना करते समय केवल अंतिम वस्तुओं का मूल्य क्यों लिया जाता है?’ और ‘मूल्य वर्धित क्या है? उदाहरण द्वारा समझाइए।’ जैसे प्रश्न पूछे जाते हैं। गेहूँ-आटा-बिस्कुट के उदाहरण को विस्तार से समझ लो और गणना याद रखो।
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