भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने के लिए आर्थिक क्रियाओं का क्षेत्रकों में वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उप-पाठ प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों के बीच अंतर, उदाहरण तथा पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करता है। साथ ही, संगठित/असंगठित और सार्वजनिक/निजी क्षेत्रक जैसे अन्य वर्गीकरण भी समझाए गए हैं।
जब आप बाजार से सब्जियां खरीदते हैं, तो वे कृषि (प्राथमिक) से आती हैं; वे सब्जियां दुकान तक परिवहन (तृतीयक) से पहुंचती हैं; और यदि आप पैकेज्ड सब्जियां खरीदते हैं, तो वे प्रसंस्करण (द्वितीयक) से गुज़री होती हैं। यह सरल उदाहरण दर्शाता है कि किस प्रकार अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रक परस्पर जुड़े हुए हैं।
आर्थिक क्रियाओं का वर्गीकरण क्यों आवश्यक है?
किसी भी अर्थव्यवस्था में अनगिनत गतिविधियाँ होती हैं, जैसे खेती, कारखानों में उत्पादन, परिवहन, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि। इन सबको एक साथ समझना कठिन है। इसलिए हम इन्हें उनकी प्रकृति और कार्य के आधार पर अलग-अलग समूहों या क्षेत्रकों में बाँटते हैं। इस वर्गीकरण से हम यह जान पाते हैं कि कौन-सा क्षेत्र कितना उत्पादन कर रहा है, कितने लोगों को रोजगार दे रहा है और समग्र विकास में उसका क्या योगदान है। नीति-निर्माताओं के लिए यह जानकारी अत्यंत उपयोगी होती है ताकि वे सही योजनाएँ बना सकें।
क्षेत्रकों के प्रमुख प्रकार
आर्थिक क्रियाओं के वर्गीकरण का सबसे प्रचलित आधार उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति से जुड़ाव है। इस आधार पर तीन मुख्य क्षेत्रक होते हैं:
प्राथमिक क्षेत्रक
यह क्षेत्र सीधे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर निर्भर करता है। इसमें वे सभी गतिविधियाँ शामिल हैं जो प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग करती हैं। प्रमुख उदाहरण हैं: कृषि (फसलें उगाना), पशुपालन (दूध, अंडे, मांस के लिए), मत्स्यन (मछली पकड़ना), खनन (कोयला, खनिज निकालना) और वानिकी (जंगलों से लकड़ी, जड़ी-बूटी आदि प्राप्त करना)। इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहते हैं क्योंकि इसमें कृषि और उससे जुड़े कार्य प्रमुख होते हैं। प्राथमिक क्षेत्रक ही अन्य क्षेत्रकों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
द्वितीयक क्षेत्रक
प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त कच्चे माल को जब मशीनों और श्रम की सहायता से उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है, तब वह द्वितीयक क्षेत्रक की गतिविधि कहलाती है। इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, कपास से कपड़ा बनाना, गन्ने से चीनी बनाना, लकड़ी से फर्नीचर बनाना, लोहे से मशीनें बनाना आदि। इस क्षेत्र में विनिर्माण (manufacturing) प्रमुख प्रक्रिया है। द्वितीयक क्षेत्रक, प्राथमिक और तृतीयक क्षेत्रकों के बीच एक सेतु का काम करता है। उद्योगों का विकास किसी देश की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण सूचक होता है।
तृतीयक क्षेत्रक
यह क्षेत्र किसी वस्तु का उत्पादन नहीं करता, बल्कि ऐसी सेवाएं प्रदान करता है जो प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के सुचारू संचालन में मदद करती हैं। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं। प्रमुख उदाहरण: परिवहन (माल ढुलाई), बैंकिंग (पूंजी उपलब्ध कराना), शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, बीमा, मनोरंजन आदि। यह क्षेत्र आधुनिक अर्थव्यवस्था में सबसे तेजी से बढ़ रहा है और इसका तृतीयक क्षेत्रक का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। बिना इन सेवाओं के कृषि और उद्योग अपना कार्य नहीं कर सकते।
अन्य वर्गीकरण मानदंड
आर्थिक क्रियाओं को केवल प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक में ही नहीं बाँटा जाता; बल्कि रोजगार की प्रकृति, शर्तों और स्वामित्व के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है।
संगठित और असंगठित क्षेत्रक
संगठित क्षेत्रक में वे उद्यम आते हैं जहाँ सरकारी नियम-कानून लागू होते हैं। यहाँ कार्य करने वालों को नियमित वेतन, निश्चित कार्य-घंटे, सवैतनिक छुट्टियाँ, भविष्य निधि, चिकित्सा सुविधाएँ आदि मिलती हैं। इसमें सरकारी विभाग, बैंक, पंजीकृत कंपनियाँ आदि शामिल हैं। दूसरी ओर, असंगठित क्षेत्रक में छोटे-मोटे काम, खेतिहर मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू नौकर आदि आते हैं। यहाँ कोई सुनिश्चित वेतन या सुरक्षा नहीं होती और अक्सर शोषण की संभावना रहती है। संगठित-असंगठित क्षेत्रक के बारे में विस्तार से आगे पढ़ेंगे।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक
स्वामित्व के आधार पर भी आर्थिक गतिविधियों को दो वर्गों में रखा जाता है। सार्वजनिक क्षेत्रक वे उपक्रम हैं जिनका स्वामित्व और संचालन सरकार (केंद्र या राज्य) के पास होता है, जैसे भारतीय रेलवे, डाकघर, बिजली बोर्ड। इनका मुख्य उद्देश्य जन-कल्याण होता है, न कि केवल लाभ कमाना। निजी क्षेत्रक में स्वामित्व व्यक्तियों या कंपनियों के पास होता है, जैसे टाटा, रिलायंस, बिड़ला समूह। इनका मुख्य लक्ष्य लाभ अर्जित करना होता है। कभी-कभी संयुक्त क्षेत्रक भी देखने को मिलता है जहाँ सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की भागीदारी होती है। स्वामित्व के आधार पर विस्तृत विवरण के लिए यह उप-पाठ देखें।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- You are Reading Here: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- भाग 2: क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- भाग 3: भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान
- भाग 4: क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- भाग 5: बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
- भाग 6: संगठित, असंगठित और स्वामित्व आधारित क्षेत्रक