भारत में बेरोज़गारी एक जटिल समस्या है और इसे समझने के लिए हमें इसके प्रकारों की जानकारी होना आवश्यक है। मुख्यतः दो प्रकार की बेरोज़गारी पाई जाती है: खुली बेरोज़गारी और प्रच्छन्न बेरोज़गारी। खुली बेरोज़गारी में व्यक्ति के पास कोई काम नहीं होता और वह बेकार बैठा रहता है, जबकि प्रच्छन्न बेरोज़गारी में व्यक्ति काम करता हुआ दिखाई देता है लेकिन उसकी श्रम-क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त, अल्प बेरोज़गारी भी एक गंभीर समस्या है जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में देखी जाती है। सरकार ने इन समस्याओं से निपटने के लिए रोज़गार सृजन नीतियाँ बनाई हैं, जिनमें मनरेगा 2005 और विकसित भारत – जी राम जी 2025 प्रमुख हैं।
कल्पना कीजिए लक्ष्मी के परिवार की, जो उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहते हैं। उनके पास दो हेक्टेयर असिंचित भूमि है, जिस पर वे गेहूँ और धान की खेती करते हैं। इस छोटे से खेत में परिवार के पाँच सदस्य काम करते हैं, लेकिन यदि ध्यान से देखें तो वास्तव में केवल दो-तीन लोगों की ही आवश्यकता है। शेष सदस्य यूँ ही काम में लगे रहते हैं, उनकी उपस्थिति से उत्पादन में कोई विशेष वृद्धि नहीं होती। यह स्थिति प्रच्छन्न बेरोज़गारी का एक आदर्श उदाहरण है, जो भारतीय कृषि में बहुतायत से पाई जाती है। दूसरी ओर, शहर में रहने वाला रमेश, एक कुशल प्लम्बर है, लेकिन उसे पूरे दिन में केवल दो-तीन घंटे का ही काम मिलता है। वह अपने हुनर का पूरा उपयोग नहीं कर पाता और अक्सर बाकी समय बेरोज़गार रहता है। यह अल्प बेरोज़गारी का उदाहरण है, जो शहरी क्षेत्रों में आम है।
बेरोज़गारी के प्रकार
बेरोज़गारी को मुख्यत: तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है: खुली, प्रच्छन्न और अल्प। हालाँकि मौसमी बेरोज़गारी भी एक प्रकार है, लेकिन यहाँ हम प्रमुख दो और अल्प बेरोज़गारी पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
खुली बेरोज़गारी
खुली बेरोज़गारी वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति काम करने की इच्छा और योग्यता रखने के बावजूद उसे कोई रोज़गार प्राप्त नहीं होता। ऐसे लोग प्रायः शिक्षित होते हैं और रोज़गार कार्यालयों में अपना नाम दर्ज कराते हैं। शहरी क्षेत्रों में, विशेषकर शिक्षित युवाओं में खुली बेरोज़गारी अधिक देखी जाती है। उदाहरण के लिए, एक बी.ए. पास युवक जो सरकारी नौकरी की तलाश में वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा है, खुली बेरोज़गारी का शिकार है। इस प्रकार की बेरोज़गारी में व्यक्ति की आय शून्य होती है और वह समाज पर बोझ बनता है।
प्रच्छन्न बेरोज़गारी
प्रच्छन्न या छिपी हुई बेरोज़गारी वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति काम में लगा हुआ प्रतीत होता है, लेकिन उसकी उत्पादकता नगण्य होती है। इसका अर्थ है कि यदि उस व्यक्ति को कार्य से हटा भी लिया जाए तो कुल उत्पादन में कोई कमी नहीं आएगी। इसे श्रम की सीमांत उत्पादकता शून्य होना कहते हैं। भारत के कृषि क्षेत्र में यह समस्या व्यापक रूप से फैली हुई है। जैसा कि लक्ष्मी के परिवार में देखा, पाँच लोगों के स्थान पर दो लोग भी वही काम कर सकते हैं। इसका मुख्य कारण भूमि का सीमित आकार और संयुक्त परिवार प्रणाली है, जहाँ सभी सदस्य एक ही खेत पर काम करने लगते हैं चाहे आवश्यकता न भी हो। प्रच्छन्न बेरोज़गारी को दूर करने के लिए कृषि में सुधार और गैर-कृषि रोज़गार के अवसर बढ़ाने की आवश्यकता है।
अल्प बेरोज़गारी
अल्प बेरोज़गारी तब होती है जब कोई व्यक्ति अपनी योग्यता से कम स्तर का काम करता है, या उसे पूर्णकालिक रोज़गार प्राप्त नहीं होता। शहरों में रिक्शा चालक, फेरी वाले, प्लम्बर, बिजली मिस्त्री, मोची, दर्जी आदि अक्सर अल्प बेरोज़गारी के शिकार होते हैं। ये लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहाँ काम की अनियमितता और कम आय एक स्थायी समस्या है। उदाहरण के लिए, एक रिक्शा चालक को सुबह से शाम तक कभी-कभी ही सवारी मिलती है, शेष समय वह बेकार बैठा रहता है। ऐसे में उसकी आय अनिश्चित होती है और वह गरीबी के चक्र में फँसा रहता है।
रोज़गार सृजन के उपाय
बेरोज़गारी की समस्या से निपटने के लिए रोज़गार के अवसरों का सृजन अति आवश्यक है। निम्नलिखित उपायों पर ध्यान देने से भारत में रोज़गार की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है:
1. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार: देश में अभी भी बड़ी मात्रा में कृषि योग्य भूमि वर्षा पर निर्भर है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने से किसान वर्ष में दो या तीन फसलें ले सकता है, जिससे खेती में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होगी। इससे प्रच्छन्न बेरोज़गारी कम होगी और कृषकों की आय भी बढ़ेगी।
2. सुगम कृषि साख: किसानों को बैंकों से आसान शर्तों पर ऋण मिलने से वे आधुनिक कृषि यंत्र, उत्तम बीज और खाद का उपयोग कर सकते हैं। इससे उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक रोज़गार के अवसर पैदा होंगे।
3. भंडारण और परिवहन का विकास: फसलों के उचित भंडारण और त्वरित परिवहन की सुविधा न होने के कारण किसानों को अपनी उपज कम दामों पर बेचनी पड़ती है। शीत भंडारण और कोल्ड चेन की व्यवस्था होने से कृषि-उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे कृषि-आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और रोज़गार बढ़ेगा।
4. कृषि-आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन: ग्रामीण क्षेत्रों में दाल मिल, तेल मिल, फल-सब्जी प्रसंस्करण इकाइयाँ, शीत भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग स्थापित करने से स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में रोज़गार पैदा होंगे। इससे कृषि पर अत्यधिक दबाव भी कम होगा।
5. पर्यटन उद्योग का विकास: भारत में ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों की भरमार है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढाँचे, होटल, रेस्तरां और यातायात की सुविधाएँ विकसित करने से गाइड, ड्राइवर, होटल स्टाफ आदि के रूप में अनेक रोज़गार उत्पन्न होंगे।
6. सूचना प्रौद्योगिकी (आई.टी.) क्षेत्र में निवेश: सॉफ्टवेयर विकास, बीपीओ और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए बड़ी संख्या में रोज़गार के अवसर हैं। सरकार को आईटी अवसंरचना और कौशल विकास पर ध्यान देना चाहिए।
7. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए अधिक शिक्षकों, डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों की आवश्यकता होगी। इससे तृतीयक क्षेत्र में रोज़गार के नए द्वार खुलेंगे।
8. लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा: हथकरघा, खादी, मिट्टी के बर्तन, बाँस की वस्तुएँ आदि जैसे पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहन देने से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोज़गार को बढ़ावा मिलेगा।
सरकारी पहल: मनरेगा और विकसित भारत – जी राम जी
ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी और अल्प रोज़गार की समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने कई योजनाएँ चलाई हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जो 2005 में लागू किया गया था। इस अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को प्रति वित्तीय वर्ष 100 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम के बदले रोज़गार उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी दी गई है। यदि सरकार निर्धारित समय में रोज़गार प्रदान करने में असमर्थ रहती है, तो आवेदक को बेरोज़गारी भत्ता दिया जाता है। यह योजना माँग आधारित है, अर्थात जब भी ग्रामीण श्रमिक काम माँगेगा, उसे काम दिया जाएगा। मनरेगा के माध्यम से गाँवों में तालाब, सड़क, कुआँ आदि जैसी सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण भी हुआ है, जिससे दीर्घकालिक विकास को बल मिला है।
हाल के वर्षों में, मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत – जी राम जी 2025 नामक नई योजना शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्य न केवल रोज़गार उपलब्ध कराना है, बल्कि ग्रामीण श्रमिकों के कौशल विकास और उद्यमिता को भी बढ़ावा देना है। इसके तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम, स्वरोज़गार के लिए वित्तीय सहायता और बाजार से जुड़ने की सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। इसका मुख्य ध्येय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना और प्रच्छन्न बेरोज़गारी को समाप्त करना है। कहा जा सकता है कि विकसित भारत – जी राम जी योजना, मनरेगा का एक उन्नत और समग्र रूप है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: परिचय एवं वर्गीकरण
- भाग 2: क्षेत्रकों की पारस्परिक निर्भरता और उत्पादन की तुलना
- भाग 3: भारत में क्षेत्रकों का उत्पादन एवं रोज़गार में योगदान
- भाग 4: क्षेत्रकों का ऐतिहासिक विकास एवं तृतीयक क्षेत्रक का महत्व
- You are Reading Here: बेरोज़गारी के प्रकार और रोज़गार सृजन की नीतियां
- भाग 6: संगठित, असंगठित और स्वामित्व आधारित क्षेत्रक

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