भारत में संघवाद का क्रियान्वयन संविधान के कठोर अनुच्छेदों से परे जाकर भारतीय राजनीति और समाज को आकार देने वाली एक सतत विकसित प्रक्रिया है। यह उप-पाठ भाषाई आधार पर राज्य पुनर्गठन, भाषा नीति, केंद्र-राज्य संबंध और गठबंधन सरकार की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डालता है। इन सभी ने मिलकर संघवाद को एक जीवंत यथार्थ बनाया है, जो विविधता में एकता के लक्ष्य को साकार करता है।
विद्यार्थी अक्सर सोचते हैं कि आखिर किसी राज्य की अपनी अलग भाषा और संस्कृति को इतना महत्व क्यों दिया जाता है? इसका उत्तर संघवाद के क्रियान्वयन में छिपा है। जब कोई परिवार एक भाषाई राज्य से दूसरे में स्थानांतरित होता है, तो वहाँ की भाषा, शिक्षा का माध्यम और सरकारी नौकरियों में भाषा संबंधी नियम उनके जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि भाषाई पुनर्गठन और भाषा नीति का गहरा संबंध हमारे दैनिक जीवन से है।
भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन
स्वतंत्रता के तुरंत बाद, देश में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की माँग जोर पकड़ने लगी। इसके पीछे यह तर्क था कि प्रशासन को लोगों की भाषा में संचालित करने से न केवल प्रशासनिक सुगमता बढ़ती है, बल्कि जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित होती है। प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और केंद्र सरकार ने इस माँग का विरोध किया, क्योंकि उन्हें भय था कि इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ सकती है। परंतु, पोट्टी श्रीरामुलु के 1952 में आमरण अनशन और उसके बाद आंध्र राज्य के गठन ने सरकार को अपनी नीति बदलने पर विवश कर दिया। तत्पश्चात 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग (जिसे फज़ल अली आयोग भी कहा जाता है) का गठन किया गया। आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें मुख्य रूप से भाषा को राज्यों के पुनर्गठन का आधार बनाने की सिफारिश की गई। इसके परिणामस्वरूप 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित हुआ और भारत के राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन हुआ। इस अधिनियम के तहत पुराने राज्यों को समाप्त कर 14 राज्यों और 6 केंद्रशासित प्रदेशों का निर्माण किया गया। इससे प्रशासन अधिक सुचारु हुआ और विभिन्न भाषाई समूहों की आकांक्षाओं का सम्मान करने से राष्ट्रीय एकता को भी बल मिला।
बाद के वर्षों में, केवल भाषा ही नहीं, अपितु सांस्कृतिक-जातीय पहचान के आधार पर भी नए राज्यों की माँग उठी। 1960 में मुंबई राज्य से गुजरात और महाराष्ट्र अलग हुए। 1963 में नगालैंड को राज्य का दर्जा मिला, जो मुख्यतः नगा जनजातीय पहचान पर आधारित था। 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य बनाए गए, जिनके गठन में सांस्कृतिक और जातीय पहचान के साथ-साथ आर्थिक पिछड़ापन और प्रशासनिक सुगमता भी महत्वपूर्ण कारक बने। इन राज्यों के गठन ने यह सिद्ध किया कि संघीय ढाँचा जनता की भावनाओं के अनुरूप समायोजित होने में सक्षम है और यह प्रक्रिया सतत जारी रह सकती है।
भाषा नीति
भारतीय संविधा ने भाषा के मामले में बहुत सावधानीपूर्वक संतुलन स्थापित किया है। संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है (अनुच्छेद 343), जबकि अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। साथ ही, संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ सूचीबद्ध हैं, जिन्हें विशेष संरक्षण प्राप्त है।
1965 में एक बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ जब केंद्र सरकार ने अंग्रेज़ी के सरकारी प्रयोग को बंद कर हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा। गैर-हिंदी भाषी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु, ने इसका तीव्र विरोध किया। वहाँ यह आंदोलन भाषायी गौरव और अधिकारों से जुड़ा था, जिसमें हिंसा और आत्मदाह तक की घटनाएँ हुईं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने लचीली नीति अपनाते हुए 1963 के राजभाषा अधिनियम को 1967 में संशोधित किया, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया कि अंग्रेज़ी का प्रयोग तब तक जारी रहेगा जब तक सभी गैर-हिंदी भाषी राज्य इसके स्थान पर हिंदी को स्वीकार नहीं कर लेते। इसके अतिरिक्त, 1968 में त्रिभाषा सूत्र की सिफारिश की गई, जिसके अनुसार स्कूलों में हिंदी, अंग्रेज़ी और एक आधुनिक भारतीय भाषा का अध्ययन अनिवार्य बनाया गया। यह भाषा नीति संघीय संतुलन बनाए रखने में पूर्णतः सफल रही और इसने भाषाई आधार पर होने वाले संभावित संघर्ष को टाल दिया।
केंद्र-राज्य संबंध
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक एकदलीय वर्चस्व (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) के कारण राज्यों की स्वायत्तता की अवहेलना हुई। केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करते हुए अनेक विपक्षी शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया। 1947 से 1990 के दशक तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग सौ से अधिक बार किया गया, जिसमें से अधिकांश राजनीतिक दुरुपयोग के उदाहरण थे। इस प्रवृत्ति ने संघीय ढाँचे की भावना को गंभीर चोट पहुँचाई।
1990 के दशक में राजनीतिक परिदृश्य में आमूलचूल परिवर्तन आया। नए क्षेत्रीय दलों जैसे तेलुगु देशम पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम, समता पार्टी आदि के उदय और केंद्र में किसी एक दल के बहुमत न होने के कारण गठबंधन सरकारों का दौर प्रारंभ हुआ। गठबंधन सरकार का अर्थ है वह सरकार जो दो या दो से अधिक राजनीतिक दलों के गठजोड़ से बनती है। इस युग में सत्ता की वास्तविक साझेदारी बढ़ी, क्योंकि केंद्र सरकार को अपने अस्तित्व के लिए क्षेत्रीय दलों के समर्थन की आवश्यकता थी। इसके फलस्वरूप केंद्र सरकार राज्यों की माँगों, चाहे वह संसाधनों के बँटवारे से जुड़ी हो या नीतिगत निर्णयों से, के प्रति अधिक संवेदनशील बनी। गठबंधन सरकारों ने केंद्र-राज्य संबंधों को और अधिक समतापूर्ण बना दिया।
एक ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 के एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर निर्णायक अंकुश लगाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है, और इसे केवल अत्यंत गंभीर संवैधानिक विफलता की स्थिति में ही प्रयुक्त किया जा सकता है। साथ ही, न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि राष्ट्रपति शासन लगाए जाने से पहले राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। इस निर्णय ने राज्य सरकारों की स्वायत्तता को सशक्त संवैधानिक कवच प्रदान किया और संघीय ढाँचे को सुदृढ़ किया।
भाषायी विविधता: जनगणना 2011 के आँकड़े
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1300 से अधिक मातृभाषाएँ बोली जाती हैं, जिनमें से 121 प्रमुख भाषाएँ हैं जिन्हें 10,000 से अधिक लोग बोलते हैं। हिंदी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, परंतु इसे मातृभाषा के रूप में बोलने वालों का प्रतिशत केवल 43.63% है। कोई भी भाषा पूर्ण बहुमत में नहीं है, जो भारत की अद्वितीय भाषायी विविधता को दर्शाता है। ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत में संघवाद का क्रियान्वयन इसी विविधता के सम्मान और प्रबंधन पर आधारित है।
Total Slides: 8
Total Questions: 15 | Total Marks: 15
Leaderboard (Last 30 Days)
अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: संघवाद: अर्थ, परिभाषा और प्रमुख विशेषताएँ
- भाग 2: संघीय शासन व्यवस्था के प्रकार
- भाग 3: भारतीय संविधान में संघीय ढाँचा
- You are Reading Here: भारत में संघवाद का क्रियान्वयन
- भाग 5: विकेंद्रीकरण और स्थानीय शासन