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संघवाद (Federalism) — संपूर्ण अध्ययन | कक्षा 10 राजनीति विज्ञान | यूपी बोर्ड

संघवाद कक्षा 10 की राजनीति विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है जो भारतीय शासन व्यवस्था के संघीय ढाँचे को समझाता है। इस अध्याय में छात्र सीखते हैं कि सत्ता का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर विभाजन किस प्रकार एक लोकतांत्रिक देश में स्थिरता और सहभागिता सुनिश्चित करता है। संघीय व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंध, भाषा नीति और पंचायती राज जैसे विषय बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से बेहद उपयोगी हैं। यह अध्याय न केवल यूपी बोर्ड के पाठ्यक्रम का आधार है, बल्कि नागरिक शास्त्र की मूलभूत अवधारणाओं को भी स्पष्ट करता है।

कल्पना कीजिए कि आप अपने गाँव की समस्याओं — जैसे पानी की निकासी या सड़क की मरम्मत — के लिए सीधे दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से गुहार लगाएँ। यह कितना व्यावहारिक है? यही वह सोच है जिसने संघवाद को जन्म दिया। हर समस्या का समाधान केंद्र सरकार के पास नहीं होता, इसलिए शासन की शक्तियाँ विभिन्न स्तरों — राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय — में बाँट दी जाती हैं ताकि हर स्तर पर लोगों की भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित हो।

संघवाद क्या है? (What is Federalism)

संघवाद शासन की वह प्रणाली है जिसमें सत्ता का संवैधानिक विभाजन कम से कम दो स्तरों — केंद्र और राज्य सरकारों — के बीच होता है। एकात्मक शासन प्रणाली में सारी शक्तियाँ एक ही स्तर पर केंद्रित होती हैं, जबकि संघीय प्रणाली में प्रत्येक स्तर अपने अधिकार-क्षेत्र में स्वतंत्र होता है। यह व्यवस्था मुख्यतः बड़े एवं विविधतापूर्ण देशों के लिए उपयुक्त मानी जाती है क्योंकि इससे प्रशासनिक कुशलता बढ़ती है और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान होता है।

संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ

1. दोहरे स्तर की सरकार: इसमें एक राष्ट्रीय सरकार तथा अनेक राज्य सरकारें होती हैं।
2. संविधान में स्पष्ट शक्ति विभाजन: प्रत्येक स्तर के अधिकार-क्षेत्र को संविधान सुनिश्चित करता है।
3. संविधान की सर्वोच्चता: कोई भी सरकार अकेले संविधान में संशोधन नहीं कर सकती; इसके लिए दोनों स्तरों की सहमति आवश्यक है।
4. स्वतंत्र न्यायपालिका: विवादों का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय करता है।
5. वित्तीय स्वायत्तता: प्रत्येक स्तर के राजस्व के अलग-अलग स्रोत होते हैं।

भारत में संघवाद की यात्रा

भारत विविध भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों का देश है; अतः यहाँ संघीय व्यवस्था अपनाई गई। यद्यपि संविधान में ‘संघ’ शब्द का प्रयोग नहीं है, फिर भी इसकी सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं। सत्ता का विभाजन तीन सूचियों — संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची — के माध्यम से किया गया है।

संघ सूची

इसमें रक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, मुद्रा, संचार जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय आते हैं। इन पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

राज्य सूची

पुलिस, व्यापार, कृषि, सिंचाई आदि विषय राज्य सूची में हैं और इन पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को है।

समवर्ती सूची

इस सूची में शिक्षा, वन, मज़दूर संघ, विवाह, गोद लेना जैसे विषय हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। टकराव की स्थिति में केंद्र का कानून मान्य होता है।

इसके अतिरिक्त जो विषय किसी सूची में नहीं आते, वे ‘बचे हुए विषय’ के रूप में केंद्र सरकार के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं। इस प्रकार भारत में एक संतुलित संघीय ढाँचा बना।

भाषा नीति और क्षेत्रीय संतुलन

भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन भारतीय संघवाद की पहली बड़ी परीक्षा थी। 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफ़ारिशों पर भाषायी राज्य बनाए गए। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक राज्य में आ जाएँ। बाद में संस्कृति, भूगोल या जातीयता के आधार पर भी नए राज्यों का गठन हुआ, जैसे — नगालैंड, उत्तराखंड और झारखंड। इससे देश और मज़बूत हुआ।

भाषा नीति के अंतर्गत हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया, पर इसे लादा नहीं गया। 21 अन्य भाषाओं को अनुसूची में शामिल किया गया। केंद्र सरकार ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी के प्रयोग की अनुमति देकर भाषाई विवाद को शांत किया। इस लचीलेपन ने देश को श्रीलंका जैसी हिंसक स्थिति से बचाया।

केंद्र-राज्य संबंध और गठबंधन सरकार

1990 के दशक से पहले अक्सर एक ही दल केंद्र और अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ रहता था, जिससे राज्य सरकारें अपनी शक्तियों का पूरा उपयोग नहीं कर पाती थीं। कभी-कभी केंद्र सरकार संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके विपक्षी राज्य सरकारों को बर्खास्त कर देती थी। परंतु 1990 के बाद क्षेत्रीय दलों के उदय और गठबंधन सरकारों के दौर ने संघवाद को मजबूत किया। सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने राज्य सरकारों को मनमानी ढंग से भंग करने पर रोक लगा दी। अतः अब केंद्र-राज्य संबंधों में आपसी सम्मान और सहयोग की भावना प्रबल हुई है।

विकेंद्रीकरण और स्थानीय शासन

भारत जैसे विशाल देश में केवल दो स्तरीय सरकार से काम नहीं चल सकता; इसलिए संविधान संशोधन (1992) द्वारा तीसरे स्तर — स्थानीय शासन — को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज और शहरी क्षेत्रों में नगरपालिकाएँ स्थापित की गईं।

पंचायती राज व्यवस्था

यह त्रिस्तरीय है:

  • ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर): एक चुनी हुई संस्था, जिसका मुखिया सरपंच होता है। ग्राम सभा में गाँव के सभी मतदाता भाग ले सकते हैं।
  • पंचायत समिति (ब्लॉक स्तर): कई ग्राम पंचायतों का समूह।
  • जिला परिषद (जिला स्तर): जिले की शीर्ष पंचायत।

शहरी शासन में नगरपालिका (छोटे शहर) और नगर निगम (बड़े शहर) होते हैं। मेयर नगर निगम का प्रमुख होता है। स्थानीय निकायों के चुनाव नियमित होते हैं और इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं।

हालाँकि चुनाव तो नियमित होते हैं पर अनेक राज्य सरकारों ने अभी तक पर्याप्त अधिकार एवं संसाधन उपलब्ध नहीं कराए हैं, जिससे विकेंद्रीकरण का आदर्श पूरी तरह साकार नहीं हो पाया है। ब्राज़ील के ‘पोर्तो अलेग्रे’ का सहभागी बजट प्रयोग इस दिशा में एक प्रेरक उदाहरण है, जिसमें हज़ारों नागरिक सीधे बजट निर्माण में भाग लेते हैं। केरल के कुछ क्षेत्रों में भी ऐसे प्रयोग हुए हैं।

निष्कर्ष

संघवाद केवल संवैधानिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत अभ्यास है जो लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र पर निर्भर करता है। भारतीय संघवाद ने भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की विविधता को एक सूत्र में पिरोते हुए एकता और अखंडता बनाए रखी है। स्थानीय स्वशासन ने लोकतंत्र की जड़ों को और गहरा किया है।

👨🏫 शिक्षक की सलाह: प्रिय विद्यार्थियों, इस अध्याय से बोर्ड परीक्षा में प्रायः दो प्रश्न पूछे जाते हैं — “संघीय व्यवस्था के प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए” और “भारत में विकेंद्रीकरण की आवश्यकता एवं 1992 के संशोधन का महत्व”। ये दोनों प्रश्न अति महत्त्वपूर्ण हैं। संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर को अच्छी तरह समझ लें। भाषा नीति और केंद्र-राज्य संबंधों के प्रमुख मोड़ों को याद करें। पंचायती राज की संरचना पर लघु प्रश्न पूछे जाते हैं, अतः उसका त्रिस्तरीय स्वरूप रट लें। उत्तर लिखते समय उदाहरण अवश्य दें। शुभकामनाएँ!
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संघवाद: भारत की शासन प्रणाली

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