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ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण: शासन के विभिन्न स्तरों के बीच शक्ति का बंटवारा

ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण शासन के विभिन्न स्तरों—जैसे केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकायों—के बीच शक्तियों का बंटवारा है। यह सत्ता की साझेदारी का एक प्रमुख रूप है, जिसे संघीय व्यवस्था (federal system) के नाम से भी जाना जाता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण शासन को प्रभावी और उत्तरदायी बनाता है। यह अवधारणा कक्षा 10 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के ‘लोकतांत्रिक राजनीति’ भाग में विस्तार से पढ़ाई जाती है।

गाँव में रहने वाले श्याम के उदाहरण से इसे समझें। जब श्याम को अपनी गली में बिजली के खंभे की मरम्मत करवानी होती है, तो वह स्थानीय ग्राम पंचायत से संपर्क करता है। अगर उसे अपने बच्चे के लिए राजकीय विद्यालय में दाखिला चाहिए, तो वह राज्य सरकार के शिक्षा विभाग में जाता है। और जब वह सेना में भर्ती होना चाहता है या पासपोर्ट बनवाना चाहता है, तो उसे केंद्र सरकार की ओर रुख करना पड़ता है। यही ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण का व्यावहारिक स्वरूप है—अलग-अलग कार्यों के लिए सरकार के अलग-अलग स्तर जिम्मेदार होते हैं।

ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण क्या है?

ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण का अर्थ है किसी देश में शासन के विभिन्न स्तरों के बीच विधायी, कार्यपालिका और वित्तीय शक्तियों का विभाजन। सबसे ऊपर सम्पूर्ण देश के लिए एक केंद्रीय सरकार (केंद्र सरकार) होती है, जो राष्ट्रीय महत्व के विषयों जैसे रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा आदि का प्रबंधन करती है। इसके नीचे प्रांतीय या क्षेत्रीय सरकारें (राज्य सरकारें) होती हैं, जो राज्य से संबंधित विषयों जैसे पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई आदि का काम देखती हैं। कई देशों में इससे भी निचले स्तर पर स्थानीय सरकारें जैसे नगर निगम, नगर पालिकाएँ और पंचायतें स्थानीय समस्याओं को हल करने के लिए स्थापित की जाती हैं। यह बंटवारा संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से परिभाषित होता है ताकि किसी एक स्तर द्वारा दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप न हो।

यह व्यवस्था क्षैतिज सत्ता वितरण से भिन्न है, जहाँ एक ही स्तर पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का बंटवारा होता है। ऊर्ध्वाधर वितरण में सत्ता का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है।

भारत में ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण

संघीय व्यवस्था का संवैधानिक विभाजन

भारत में संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया है। इसके लिए तीन सूचियाँ बनाई गई हैं—संघ सूची (Union List), राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List)। संघ सूची में 97 विषय हैं जिन पर केवल केंद्र सरकार कानून बना सकती है, जैसे रक्षा, परमाणु ऊर्जा, विदेशी मामले। राज्य सूची में 61 विषय हैं जिन पर राज्य सरकारें कानून बनाती हैं, जैसे पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि। समवर्ती सूची में 52 विषय हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, परंतु टकराव की स्थिति में केंद्रीय कानून प्रभावी होता है। यह विभाजन भारतीय संघवाद की आधारशिला है।

स्थानीय शासन संस्थाएँ

1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद भारत में स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा मिला। पंचायती राज ग्रामीण क्षेत्रों में त्रिस्तरीय ढाँचा प्रदान करता है—ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद। शहरी क्षेत्रों में नगर पालिकाएँ, नगर परिषदें और नगर निगम स्थानीय प्रशासन चलाते हैं। इन संस्थाओं को संविधान की ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची में 29 विषयों पर अधिकार दिए गए हैं, जिनमें पेयजल, सफाई, स्ट्रीट लाइट, प्राथमिक शिक्षा आदि शामिल हैं। इस प्रकार भारत में त्रिस्तरीय शासन—केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय—के माध्यम से ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण पूर्ण होता है।

बेल्जियम में ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण का अनूठा उदाहरण

बेल्जियम की कहानी हमें बताती है कि ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण किस प्रकार सांस्कृतिक विविधता को समायोजित कर सकता है। बेल्जियम में भाषाई आधार पर तीन समुदाय- सरकारें हैं—फ्लेमिश, वालून और जर्मन। इसके अलावा तीन क्षेत्रीय सरकारें (फ्लैंडर्स, वालोनिया और ब्रुसेल्स-राजधानी क्षेत्र) भी हैं। ये क्षेत्रीय सरकारें पूरी तरह से केंद्र के अधीन नहीं हैं, बल्कि उन्हें सीधे संविधान से शक्तियाँ प्राप्त हैं। बेल्जियम का यह द्विसदनीय संघीय ढाँचा दर्शाता है कि ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण में सभी स्तरों को समान महत्व और स्वायत्तता दी जा सकती है। यह व्यवस्था सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।

ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण के लाभ

ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण अनेक कारणों से लाभदायक है:
1. प्रभावी प्रशासन: विभिन्न स्तरों पर शक्तियाँ बँट जाने से हर स्तर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
2. जनभागीदारी में वृद्धि: स्थानीय सरकारें नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया से जोड़ती हैं।
3. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ पूरी करना: राज्य और स्थानीय सरकारें अपने क्षेत्र विशेष की जरूरतों के अनुसार योजनाएँ बना सकती हैं।
4. संघर्ष कम करना: विभिन्न समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलता है, जिससे सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी भी सुनिश्चित होती है।
5. शक्ति के दुरुपयोग पर रोक: किसी एक स्तर पर शक्ति का संकेंद्रण नहीं हो पाता, जिससे तानाशाही की संभावना कम हो जाती है।

👨🏫 शिक्षक की सलाह: बच्चों, इस अध्याय में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज सत्ता वितरण के बीच अंतर को अच्छी तरह समझ लो। बोर्ड परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है—भारत में ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण के तीन स्तर कौन-कौन से हैं? तथा संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों पर आधारित प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। बेल्जियम के उदाहरण और 73वें-74वें संशोधन को ध्यान से पढ़ो।
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ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण: मुख्य बिंदु

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