यूपी बोर्ड कक्षा 10 की राजनीति विज्ञान की पुस्तक के अध्याय 3 ‘जाति, धर्म और लैंगिक मसले’ (Jati, Dharm aur Laingik Masle) में सामाजिक विभाजनों और उनके राजनीतिक प्रभावों का विस्तार से अध्ययन किया जाता है। इस लेख में हम इस पाठ का सार, महत्वपूर्ण अवधारणाएं, और बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। चाहे आप यूपी बोर्ड के छात्र हों या शिक्षक, यह मार्गदर्शिका आपको लैंगिक असमानता, सांप्रदायिकता, और जातिवाद जैसे जटिल मुद्दों को सरलता से समझने में मदद करेगी।
कल्पना कीजिए, एक घर में माँ सुबह से शाम तक खाना बनाती है, साफ-सफाई करती है, बच्चों की देखभाल करती है, लेकिन जब बात कमाने की आती है तो पिता ही घर का मुखिया माना जाता है। यह एक आम भारतीय परिवार की कहानी है, जो लैंगिक विभाजन की जड़ों को दर्शाती है। ठीक इसी तरह, समाज में जाति और धर्म भी अक्सर हमें बाँटने का काम करते हैं। लेकिन क्या ये सब लोकतंत्र के लिए खतरा हैं या फिर सामाजिक विविधता का हिस्सा? आइए इस अध्याय में गहराई से समझते हैं।
लैंगिक विभाजन और राजनीति
लैंगिक असमानता को अक्सर प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय मान लिया जाता है, लेकिन इसका आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं, बल्कि सामाजिक रूढ़ियाँ और परंपरागत भूमिकाएँ हैं। परिवार और समाज लड़कियों को यही सिखाते हैं कि औरतों का मुख्य काम घर संभालना और बच्चों की देखभाल करना है। यह सोच श्रम के लैंगिक विभाजन को जन्म देती है, जिसमें घर के अंदर का सारा काम औरतें करती हैं और पुरुष बाहर कमाने जाते हैं।
श्रम का लैंगिक विभाजन एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ घर के कामों का मूल्य नहीं आँका जाता। आँकड़े बताते हैं कि भारत में एक महिला औसतन रोज़ाना साढ़े सात घंटे काम करती है, जबकि पुरुष साढ़े छह घंटे ही काम करता है, लेकिन पुरुष का काम दिखाई देता है क्योंकि उससे आमदनी होती है। यही कारण है कि महिलाओं के घरेलू श्रम को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
समाज को एक कारखाने के रूप में देखें: अगर एक कारखाने में कुछ श्रमिकों को सिर्फ सफाई का काम सौंप दिया जाए और दूसरों को प्रबंधक बना दिया जाए, भले ही दोनों की क्षमता समान हो, तो यह कितना अनुचित होगा। ठीक यही लैंगिक विभाजन में होता है, जहाँ जन्म के आधार पर भूमिकाएँ तय कर दी जाती हैं।
महिलाओं के साथ भेदभाव और उनकी स्थिति
भारत में महिलाएँ अभी भी कई मोर्चों पर पुरुषों से पीछे हैं। साक्षरता दर में अंतर (महिलाएँ 54%, पुरुष 76%), शिक्षा के अवसरों की कमी, और कार्यस्थल पर असमान वेतन जैसी समस्याएँ आज भी गंभीर हैं। समान काम के लिए समान मज़दूरी का कानून होने के बावजूद, खेल से लेकर सिनेमा और कारखानों तक, महिलाओं को पुरुषों से कम भुगतान किया जाता है।
बालिका भ्रूण हत्या और गिरता लिंग अनुपात (प्रति हजार लड़कों पर 919 लड़कियाँ, कई जगह 850 से भी कम) समाज की पुरुष-प्रधान मानसिकता को दर्शाता है। महिलाएँ घरेलू हिंसा और शोषण की भी शिकार होती हैं, और शहरी इलाकों में उनकी सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व
सत्ता में महिलाओं की भागीदारी के बिना लैंगिक असमानता का हल नहीं निकल सकता। यही सोच नारीवादी आंदोलनों के केंद्र में है। भारत में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 2019 में पहली बार 14.36% तक पहुँची, लेकिन विधानसभाओं में यह 5% से भी कम है। वैश्विक स्तर पर भारत का स्थान काफी नीचे है।
इस समस्या के समाधान के लिए पंचायती राज संस्थाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गईं, जिसके चलते आज ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में लाखों महिलाएँ चुनी हुई हैं। 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम) के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। यह कदम लैंगिक विभाजन को राजनीतिक रूप देने की ज़रूरत को रेखांकित करता है।
धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति
धर्म के आधार पर सामाजिक विभाजन लैंगिक विभाजन से अलग है। गांधीजी मानते थे कि धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन उनका धर्म से अभिप्राय नैतिक मूल्यों से था, किसी विशेष पंथ से नहीं। हमारे देश में कई धर्मों के लोग रहते हैं, और यह विविधता तभी तक हानिरहित है, जब तक धर्म को राष्ट्र का आधार न मान लिया जाए।
सांप्रदायिकता तब शुरू होती है जब धर्म को सामाजिक समुदाय का एकमात्र आधार मानकर राजनीति में उसका इस्तेमाल किया जाने लगता है। सांप्रदायिक सोच यह मानती है कि एक धर्म के लोगों के हित एक जैसे होते हैं और दूसरे धर्मों से उनका टकराव अनिवार्य है। यह सोच यहाँ तक जा सकती है कि अलग-अलग धर्मों के लोग एक राष्ट्र में समान नागरिक के रूप में नहीं रह सकते।
सांप्रदायिकता के रूप
सांप्रदायिकता रोज़मर्रा के जीवन में पूर्वाग्रहों, धार्मिक समुदायों के बारे में बनी-बनाई धारणाओं और एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति के रूप में मौजूद रहती है। राजनीति में यह बहुसंख्यकवाद या अल्पसंख्यक अलगाववाद का रूप ले सकती है। चुनावों के दौरान धार्मिक प्रतीकों, धर्मगुरुओं और डर की राजनीति का सहारा लिया जाता है। चरम रूप में यह दंगे और नरसंहार का कारण बनती है, जैसा कि भारत-पाकिस्तान विभाजन और बाद में कई बार हुआ।
धर्मनिरपेक्ष राज्य की भूमिका
भारतीय संविधान ने सांप्रदायिकता की चुनौती को समझते हुए धर्मनिरपेक्षता का मॉडल अपनाया। इसमें किसी भी धर्म को राजकीय धर्म नहीं बनाया गया, सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता दी गई, और धर्म के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को गैरकानूनी घोषित किया गया। साथ ही, राज्य को धार्मिक समुदायों में समानता सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करने का अधिकार भी है (जैसे, छुआछूत पर रोक)।
धर्मनिरपेक्षता सिर्फ एक विचारधारा नहीं, बल्कि संविधान की बुनियाद है। यह अकेला सांप्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त नहीं है; हमें रोज़मर्रा के जीवन में पूर्वाग्रहों से लड़ना होगा और राजनीतिक गोलबंदी के खिलाफ खड़ा होना होगा।
जाति और राजनीति
जाति-आधारित विभाजन विशेष रूप से भारतीय समाज की विशेषता है। अन्य समाजों में पेशे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन भारत में जाति व्यवस्था ने इसे धार्मिक-सामाजिक मान्यता दे दी। वर्ण-व्यवस्था में जातियों का पदानुक्रम बनाया गया, जिसमें ‘अंत्यज’ या ‘दलित’ जातियों के साथ छुआछूत का व्यवहार होता था।
आधुनिक भारत में आर्थिक विकास, शहरीकरण, शिक्षा के प्रसार और संवैधानिक प्रावधानों (जैसे जातिगत भेदभाव का निषेध) के चलते पुरानी वर्ण-व्यवस्था कमज़ोर पड़ी है। शहरों में बस या रेस्तराँ में अब जाति का उतना ध्यान नहीं रखा जाता। लेकिन जाति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आज भी अधिकतर शादियाँ अपनी जाति या कबीले में ही होती हैं, और छुआछूत की घटनाएँ सामने आती रहती हैं।
जाति और आर्थिक असमानता
जाति और आर्थिक स्थिति के बीच गहरा संबंध अभी भी देखा जा सकता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, उच्च जातियों की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी है, दलितों और आदिवासियों की सबसे खराब, और पिछड़ी जातियाँ बीच में हैं। हालाँकि, अब हर जाति में अमीर और गरीब दोनों मिलते हैं, जो पहले नहीं था।
राजनीति में जाति की भूमिका
राजनीति में जाति कई रूप ले सकती है। चुनावों में पार्टियाँ मतदाताओं की जातीय संरचना का ध्यान रखती हैं, सरकार में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती हैं, और जातिगत भावनाओं को उकसाकर वोट जुटाती हैं। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने छोटी और पिछड़ी जातियों में नई चेतना पैदा की है। हालाँकि, यह मान लेना गलत है कि चुनाव सिर्फ जाति का खेल हैं। किसी भी संसदीय क्षेत्र में एक जाति का बहुमत नहीं होता, इसलिए उम्मीदवारों को कई जातियों और समुदायों का विश्वास जीतना पड़ता है। मतदाता अक्सर अपनी पार्टी की वफादारी या सरकार के कामकाज के आधार पर भी वोट देते हैं।
जाति और राजनीति का रिश्ता दोतरफा है। जितना राजनीति जाति से प्रभावित होती है, उतना ही जाति भी राजनीति से बदलती है। पिछड़ी जातियाँ अब खुद को बड़ा बनाने के लिए उपजातियों को जोड़ने का प्रयास करती हैं, और ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’ जैसे नए समूह राजनीति में उभरे हैं। इस प्रकार, जातिगत राजनीति ने वंचित समूहों को सत्ता तक पहुँचने का मार्ग भी दिया है, लेकिन सिर्फ जाति पर जोर देने से गरीबी, विकास और भ्रष्टाचार जैसे बड़े मुद्दे पीछे छूट सकते हैं, और कई बार यह हिंसा को भी बढ़ावा देती है।
- भाग 1: लैंगिक असमानता और श्रम का लैंगिक विभाजन
- भाग 2: महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण
- भाग 3: धर्म, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता
- भाग 4: जाति व्यवस्था: असमानताएँ और आर्थिक पहलू
- भाग 5: जाति और भारतीय राजनीति
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