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सत्ता की साझेदारी का परिचय: बेल्जियम और श्रीलंका की कहानियाँ

सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र का एक अनिवार्य तत्व है, जो विभिन्न समूहों के बीच सत्ता के बंटवारे से संघर्ष को रोकती है। बेल्जियम और श्रीलंका की कहानियाँ इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि सत्ता की साझेदारी क्यों आवश्यक है और बहुसंख्यकवाद किस प्रकार विनाशकारी हो सकता है। इस उप-पाठ में हम इन दोनों देशों की जातीय संरचना, उनकी नीतियों तथा परिणामों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

कल्पना कीजिए कि आपकी कक्षा में दो अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले छात्र पढ़ते हैं। यदि संख्या में अधिक छात्र अपनी भाषा को ही एकमात्र मान्यता दें और शेष की उपेक्षा करें, तो कक्षा में कलह अवश्यंभावी है। ठीक इसी प्रकार, किसी देश में बहुसंख्यक समुदाय द्वारा बहुसंख्यकवाद अपनाने पर अल्पसंख्यकों में असंतोष फैलता है, जो विघटन तक पहुँच सकता है। बेल्जियम और श्रीलंका इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।

बेल्जियम की जातीय संरचना

बेल्जियम यूरोप का एक छोटा-सा देश है, जिसकी राजधानी ब्रुसेल्स है। इसकी जनसंख्या लगभग एक करोड़ है और इसमें मुख्यतः दो भाषायी समुदाय रहते हैं। 59% लोग डच भाषी हैं, जो फ्लेमिश क्षेत्र में रहते हैं। 40% लोग फ्रेंच भाषी हैं, जो वालोनिया क्षेत्र में निवास करते हैं। शेष 1% जर्मन भाषी हैं। राजधानी ब्रुसेल्स में स्थिति विशेष है—यहाँ 80% लोग फ्रेंच बोलते हैं, जबकि डच भाषी अल्पसंख्यक हैं। डच भाषी क्षेत्र को फ्लैंडर्स और फ्रेंच भाषी क्षेत्र को वालोनिया कहा जाता है। ब्रुसेल्स में फ्रेंच भाषियों का बहुमत था, जबकि पूरे देश में डच भाषी बहुमत में थे। यह एक जटिल स्थिति थी।

आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से भी इन समुदायों में अंतर था। डच भाषी समुदाय जनसंख्या में बहुमत में होते हुए भी आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत कम संपन्न था और राजनीतिक शक्ति भी कम थी। दूसरी ओर, फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यक होने के बावजूद अधिक समृद्ध और शक्तिशाली थे। 1950 और 1960 के दशक में यह असमानता तनाव का कारण बनी। डच भाषियों ने अपनी अलग पहचान और अधिकारों की माँग की। 1950 के दशक से ही डच भाषियों ने आंदोलन शुरू कर दिए। वे अपनी भाषा को फ्रेंच के बराबर दर्जा दिलाना चाहते थे और सरकारी सेवाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना चाहते थे। फ्रेंच भाषी, जो अल्पसंख्यक थे लेकिन आर्थिक रूप से शक्तिशाली थे, अपना वर्चस्व खोना नहीं चाहते थे। इससे तनाव और गहराया।

श्रीलंका की जातीय संरचना और बहुसंख्यकवाद

श्रीलंका दक्षिण एशिया में स्थित एक द्वीपीय राष्ट्र है। इसकी जनसंख्या में 74% सिंहली हैं, जो बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। 18% तमिल हैं, जो मुख्यतः हिंदू या मुस्लिम हैं। तमिल समुदाय दो भागों में बँटा है—श्रीलंकाई मूल के तमिल 13% और भारतीय मूल के तमिल 5%। शेष 7% ईसाई तथा अन्य हैं। सिंहली समुदाय अधिकतर दक्षिणी और पश्चिमी भागों में रहता है, जबकि तमिल उत्तरी-पूर्वी प्रांतों में केंद्रित हैं। स्वतंत्रता से पहले भी तमिलों का प्रभाव था, लेकिन बाद में सिंहली शासन ने उन्हें दरकिनार करना शुरू कर दिया।

1948 में स्वतंत्रता के बाद सिंहली नेतृत्व ने बहुसंख्यकवाद की नीति अपनाई। 1956 में एक कानून पारित कर सिंहली को एकमात्र राजभाषा बना दिया गया। सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालय प्रवेश में सिंहलियों को वरीयता दी गई। बौद्ध धर्म को विशेष संरक्षण देने के लिए सरकारी प्रयास हुए। इन कदमों ने तमिलों में गहरा असंतोष भर दिया। उन्हें लगा कि उनकी भाषा, संस्कृति और अवसर छीने जा रहे हैं। 1956 के कानून ने शिक्षा और नौकरियों में सिंहली भाषा को अनिवार्य कर दिया, जिससे तमिलों का सरकारी पदों से बाहर निकलना तय हो गया। विश्वविद्यालयों में भी सिंहलियों के लिए आरक्षण जैसी नीतियाँ बनाई गईं।

तमिलों ने राजनीतिक संगठन बनाए और क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग की। जब शांतिपूर्ण माँगें नहीं मानी गईं, तो संघर्ष ने उग्र रूप ले लिया और गृहयुद्ध छिड़ गया। यह संघर्ष लगभग तीन दशक चला और 2009 में समाप्त हुआ। इसमें हज़ारों लोग मारे गए और देश को भारी क्षति उठानी पड़ी। तमिल युवाओं में उग्रवाद बढ़ा और लिट्टे (LTTE) जैसे संगठनों ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया।

दो देशों की विरोधाभासी नीतियाँ और परिणाम

बेल्जियम और श्रीलंका ने अपनी जातीय विविधता के प्रबंधन के लिए अलग-अलग मार्ग चुने। श्रीलंका ने बहुसंख्यकवाद अपनाकर अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल दिया, जिसका परिणाम गृहयुद्ध हुआ। इसके विपरीत, बेल्जियम ने सत्ता की साझेदारी का रास्ता चुना। बेल्जियम की रणनीति इसलिए सफल हुई क्योंकि उसने सत्ता को केवल क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर नहीं, बल्कि सामाजिक समूहों में भी बाँटा। श्रीलंका ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया।

बेल्जियम के नेताओं ने समझा कि विभिन्न समुदायों को साथ लेकर चलना ही एकमात्र विकल्प है। इसके लिए उन्होंने संविधान में चार बार संशोधन किए (1970 से 1993 के बीच) ताकि सभी को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। केंद्रीय सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान रखी गई। विशेष कानूनों को दोनों समुदायों के अधिकांश सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता हो। राज्य सरकारों को अधिक शक्तियाँ हस्तांतरित की गईं, जो क्षेत्रीय मामलों पर स्वतंत्र निर्णय ले सकती थीं। ऊर्ध्वाधर सत्ता वितरण का यह मॉडल बेल्जियम में सफल रहा।

इसके अतिरिक्त, ब्रुसेल्स में अलग सरकार बनाई गई, जहाँ दोनों समुदायों को समान प्रतिनिधित्व मिला। सबसे महत्त्वपूर्ण कदम था सामुदायिक सरकार का गठन। यह सरकार भाषा, संस्कृति और शिक्षा जैसे विषयों पर निर्णय लेती है। इसका चुनाव एक समुदाय के लोग करते हैं, चाहे वे देश के किसी भी भाग में रहते हों। उदाहरण के लिए, डच भाषी समुदाय अपनी सरकार चुनता है। इस प्रकार, सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी ने बेल्जियम में शांति स्थापित की। बेल्जियम में सामुदायिक सरकार की अवधारणा बहुत सफल रही, जिसमें हर समुदाय को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े मामलों में स्वायत्तता मिली।

निष्कर्ष: सत्ता की साझेदारी का महत्व

बेल्जियम और श्रीलंका की कहानियाँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि सत्ता का बंटवारा देश को एकता के सूत्र में बाँध सकता है, जबकि बहुसंख्यकवाद संघर्ष और विघटन को जन्म देता है। बेल्जियम का उदाहरण बताता है कि यदि जातीय विविधता का सम्मान किया जाए और हर समुदाय को सत्ता में भागीदारी मिले, तो राष्ट्रीय एकता बढ़ती है। श्रीलंका की त्रासदी बहुसंख्यकवाद का परिणाम है। अतः लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी क्यों आवश्यक है यह समझना हर नागरिक के लिए ज़रूरी है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि सबका साथ और सबका विकास महत्त्वपूर्ण है। सत्ता की साझेदारी के बिना शांति संभव नहीं।

👨🏫 शिक्षक की सलाह: विद्यार्थियों, इस उप-पाठ में बेल्जियम और श्रीलंका की तुलना को ध्यान से समझें। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है—’बेल्जियम ने सत्ता की साझेदारी का कौन-सा मॉडल अपनाया?’ या ‘श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद के परिणाम क्या हुए?’ सामुदायिक सरकार और संविधान संशोधनों को याद करें। यह अध्याय लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी के व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है, इसलिए तथ्यों के साथ-साथ अवधारणात्मक समझ आवश्यक है।
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