साख (ऋण) की अवधारणा एक आर्थिक समझौता है जिसमें एक पक्ष दूसरे को धन या वस्तुएँ इस विश्वास पर देता है कि भविष्य में भुगतान कर दिया जाएगा। यह अर्थव्यवस्था में उत्पादन, उपभोग और विनिमय को सुचारू बनाती है। साख का सकारात्मक पक्ष व्यवसायों को बढ़ाने और आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है, जबकि नकारात्मक पक्ष कर्ज-जाल में फँसा सकता है। इस पाठ में हम साख के मूलभूत विचार, इसकी भूमिका (सकारात्मक एवं नकारात्मक) तथा ऋण को नियंत्रित करने वाली शर्तों का अध्ययन करेंगे।
जूता निर्माता सलीम को त्यौहारी सीज़न में बड़ा ऑर्डर मिलता है। उसे कच्चे माल और मज़दूरों के लिए तुरंत पैसे की आवश्यकता है। वह स्थानीय व्यापारी से उधार सामान लेता है और बाद में भुगतान करता है। इस अनौपचारिक साख ने सलीम को अपना व्यवसाय बढ़ाने में मदद की। दूसरी ओर, किसान स्वप्ना फसल खराब होने पर कर्ज नहीं चुका पाती और उसे अपनी ज़मीन बेचनी पड़ती है। यह ऋण का दोहरा चेहरा है।
ऋण का अर्थ और सकारात्मक भूमिका
ऋण का अर्थ एक समझौता है जिसमें साहकार (उधारदाता) कर्जदार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ इस वादे पर उपलब्ध कराता है कि भविष्य में भुगतान किया जाएगा। इसे साख भी कहते हैं। ऋण के दो पक्ष होते हैं – उधारदाता और उधार लेने वाला। उधारदाता अपने पास उपलब्ध संसाधनों को उधार देता है और ब्याज के रूप में प्रतिफल प्राप्त करता है। उधारकर्ता को तत्काल आवश्यकता पूरी होती है और भविष्य में चुकाने की सुविधा मिलती है। सलीम का उदाहरण: एक जूता कंपनी में काम करता है, त्योहारों पर मांग बढ़ जाती है। उसे 50,000 रुपये की जरूरत है। वह एक स्थानीय व्यापारी से चमड़ा उधार लेता है और 15 दिन बाद भुगतान का वादा करता है। इससे वह उत्पादन बढ़ा पाता है और मुनाफा कमाता है। यहाँ ऋण ने उसकी मदद की। इस प्रकार ऋण की सकारात्मक भूमिका कार्यशील पूँजी की पूर्ति, उत्पादन और लाभ में वृद्धि करना है।
ऋण की नकारात्मक भूमिका (कर्ज-जाल)
ऋण का नकारात्मक पक्ष तब सामने आता है जब कर्जदार कर्ज नहीं चुका पाता। फसल खराब होने पर किसान कर्ज नहीं चुका पाते, ब्याज के कारण कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है, और अंततः उन्हें अपनी संपत्ति (ज़मीन) बेचने की मजबूरी होती है। इसे कर्ज-जाल कहते हैं। स्वप्ना आंध्र प्रदेश की एक छोटी किसान है। वह फसल के लिए साहूकार से 20,000 रुपये 36% वार्षिक ब्याज पर लेती है। अगर फसल खराब हो जाए तो वह मूलधन भी नहीं चुका पाएगी। अगले साल कर्ज ब्याज सहित 27,000 हो जाता है। वह दूसरा कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाती है, लेकिन ब्याज का बोझ बढ़ता जाता है। चक्रवृद्धि ब्याज उसे फँसा देता है। अंततः उसे अपनी 2 एकड़ जमीन बेचनी पड़ती है। यह कर्ज-जाल है। अनौपचारिक स्रोतों से ऊँची ब्याज दरें कर्ज-जाल का मुख्य कारण हैं। सरकार और बैंक सस्ती दरों पर ऋण देकर इस जाल को तोड़ने का प्रयास करते हैं।
ऋण की आवश्यकता वाले क्षेत्र
ऋण की आवश्यकता ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को फसल लगाने के लिए बीज, खाद, कीटनाशक, श्रम आदि पर खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा कुटीर उद्योग, जैसे बुनाई, बर्तन बनाना, आदि को कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण चाहिए। शहरी क्षेत्रों में व्यवसाय, शिक्षा, आवास, चिकित्सा आदि के लिए ऋण लिया जाता है। औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्रोत ऋण प्रदान करते हैं। मध्यम वर्ग के लिए गृह ऋण बहुत आम है। आधुनिक बैंकिंग प्रणाली ने ऋण तक पहुँच आसान बनाई है।
ऋण की शर्तें और उनका महत्त्व
प्रत्येक ऋण चार मुख्य शर्तों पर निर्भर करता है:
1. ब्याज दर: यह मूलधन का वह प्रतिशत है जो उधारकर्ता को उधारदाता को समय-समय पर देना होता है। ब्याज दर ऋण की लागत निर्धारित करती है। बैंकों की ब्याज दर आरबीआई द्वारा नियंत्रित होती है, जबकि अनौपचारिक क्षेत्र की दरें बहुत ऊँची हो सकती हैं।
2. समर्थक ऋणाधार (Collateral): यह वह संपत्ति है जिसे उधारकर्ता ऋण की गारंटी के रूप में गिरवी रखता है। यदि ऋण नहीं चुकाया जाता तो उधारदाता इस संपत्ति को बेचकर अपनी रकम वसूल सकता है। भूमि, भवन, वाहन, बैंक जमा, आभूषण आम कोलैटरल हैं।
3. आवश्यक दस्तावेज़: उधारकर्ता की पहचान और आय का प्रमाण आवश्यक है ताकि उसकी चुकाने की क्षमता का आकलन किया जा सके। नियोक्ता प्रमाण पत्र, वेतन पर्ची, बैंक स्टेटमेंट, आयकर रिटर्न आदि जमा करने होते हैं।
4. भुगतान की विधि और अवधि: यह तय होता है कि ऋण कितने समय में और किस रूप में चुकाना है। एकमुश्त या मासिक/त्रैमासिक किस्तों (EMI) में भुगतान हो सकता है। अवधि जितनी लंबी, किस्त उतनी छोटी, लेकिन कुल ब्याज अधिक चुकाना पड़ता है।
मेघा का उदाहरण: मेघा एक स्कूल टीचर है, उसने बैंक से 15 लाख रुपये का गृह ऋण 8.5% वार्षिक ब्याज दर पर लिया। उसने अपने नए घर को ही कोलैटरल के रूप में रखा। बैंक ने उसके वेतन प्रमाण पत्र और नौकरी के दस्तावेज़ माँगे। ऋण 20 साल में मासिक किस्तों (EMI) में चुकाना तय हुआ। इस प्रकार मेघा को अपना घर खरीदने में आसानी हुई।
ऋण की शर्तों का महत्त्व: यदि शर्तें आसान हैं (कम ब्याज, कम कागज़ात, लचीली अदायगी) तो गरीब भी लाभ उठा सकते हैं, विकास होता है। यदि शर्तें कठोर हैं तो यह कर्ज-जाल का कारण बनता है। इसलिए सरकारें बैंकों को नियंत्रित करती हैं और प्राथमिकता क्षेत्रों को सस्ता ऋण देने के निर्देश देती हैं। स्वयं सहायता समूह ने ग्रामीण क्षेत्रों में बिना कोलैटरल के ऋण उपलब्ध कराकर लाखों परिवारों को मदद की है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: मुद्रा: विनिमय का माध्यम
- भाग 2: मुद्रा के आधुनिक रूप और बैंकों की भूमिका
- You are Reading Here: साख (ऋण) की अवधारणा और ऋण की शर्तें
- भाग 4: औपचारिक और अनौपचारिक साख के स्रोत
- भाग 5: स्वयं सहायता समूह और कर्जदारों की पहुँच

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