वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारकों में प्रौद्योगिकी का विकास और उदारीकरण की नीति सबसे महत्वपूर्ण हैं। इन कारकों ने पिछले कुछ दशकों में दुनिया को एक वैश्विक गाँव में बदल दिया है। प्रौद्योगिकी ने परिवहन और संचार की गति को बढ़ाकर दूरियाँ कम कर दी हैं, जबकि उदारीकरण ने व्यापार और निवेश की बाधाओं को हटाकर आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा दिया है।
एक सामान्य उदाहरण लें: कल्पना कीजिए, दिल्ली में बैठा एक डिज़ाइनर लंदन से प्रकाशित होने वाली पत्रिका के लिए डिज़ाइन तैयार करता है। वह अपना काम ई-मेल के माध्यम से तुरंत लंदन भेज देता है। वहाँ से मुद्रण का आदेश मिलने पर, दिल्ली में ही पत्रिका की छपाई होती है। भुगतान ई-बैंकिंग द्वारा सेकंडों में हो जाता है। यह सब सूचना प्रौद्योगिकी और संचार क्रांति के कारण ही संभव हुआ है।
प्रौद्योगिकी का विकास: परिवहन और सूचना प्रौद्योगिकी
प्रौद्योगिकी ने वैश्वीकरण को तीव्र गति प्रदान की है। दो प्रमुख क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई है: परिवहन और सूचना प्रौद्योगिकी। इन दोनों ने मिलकर समय और लागत को काफी कम कर दिया है।
परिवहन में प्रगति
पिछले पचास वर्षों में परिवहन के साधनों में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। कंटेनरों के आविष्कार ने माल ढुलाई को बेहद सस्ता और तेज कर दिया है। पहले सामानों को एक-एक कर जहाजों और ट्रकों में लादा-उतारा जाता था, जिसमें कई दिन लग जाते थे और बहुत मेहनत लगती थी। अब बड़े-बड़े कंटेनर एक साथ भरे जाते हैं और क्रेन की मदद से उन्हें सीधे जहाज, रेल या ट्रक पर रखकर ले जाया जाता है। इससे लोडिंग-अनलोडिंग का समय बचता है और नुकसान की संभावना भी कम होती है। अनुमान है कि कंटेनरीकरण ने माल ढुलाई की लागत को लगभग 90 प्रतिशत तक घटा दिया है।
वायु यातायात की लागत में भी भारी कमी आई है। पहले हवाई यात्रा केवल विशिष्ट वर्ग के लिए थी, लेकिन प्रतिस्पर्धा और तकनीकी सुधारों से विमान किराए किफायती हो गए हैं। इससे न केवल व्यापारी तेजी से एक देश से दूसरे देश जा पाते हैं, बल्कि शीघ्र खराब होने वाले सामान जैसे फूलों और सब्जियों का व्यापार भी दूर-दूर तक होने लगा है। कुल मिलाकर, परिवहन में प्रगति ने वस्तुओं और लोगों की आवाजाही को तीव्रतर बना दिया, जो वैश्वीकरण के लिए आवश्यक था।
सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति
दूरसंचार, कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फोन और संचार उपग्रहों ने विश्व को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान ने व्यापारिक निर्णयों की गति को बढ़ाया है। आज एक कंपनी का मुख्यालय अमेरिका में हो सकता है, जबकि उत्पादन चीन या भारत में और ग्राहक दुनिया भर में। सूचना प्रौद्योगिकी के कारण ही ऐसा संभव हुआ है।
इंटरनेट और मोबाइल फोन ने संचार को सस्ता और सुलभ बनाया। ई-मेल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, और इंस्टेंट मैसेजिंग ने लोगों के बीच दूरियाँ खत्म कर दीं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इन सुविधाओं का उपयोग करके अपने विभिन्न देशों में संचालन को आसानी से नियंत्रित करती हैं। उपग्रहों ने संपूर्ण विश्व में संचार का जाल बिछा दिया है। किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति दुनिया के किसी अन्य भाग से कॉल कर सकता है या इंटरनेट का उपयोग कर सकता है। पहले सूचना भेजने में दिन-हफ्ते लग जाते थे, अब सेकंडों में ई-मेल पहुँच जाता है।
उदारीकरण: व्यापार बाधाओं को हटाना
वैश्वीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण कारक सरकारों द्वारा अपनाई गई उदारीकरण की नीति है। उदारीकरण का अर्थ है व्यापार और निवेश पर लगाए गए प्रतिबंधों या बाधाओं को हटाना। इन बाधाओं को व्यापार अवरोधक कहा जाता है, जो मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: कर (टैरिफ) और कोटा। कर से आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ जाती है, जबकि कोटा से उनकी मात्रा सीमित हो जाती है।
स्वतंत्रता के बाद भारत की संरक्षणवादी नीति
1947 में स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए आयात पर भारी कर और कोटा लगाए। इस नीति का उद्देश्य नए उद्योगों को पनपने का अवसर देना था। उस समय भारतीय उद्योग विदेशी कंपनियों की तुलना में कमजोर थे, इसलिए सरकार ने सोचा कि अगर आयात ऊँचे शुल्कों या मात्रा सीमाओं के कारण महंगा होगा, तो लोग स्वदेशी वस्तुओं को खरीदेंगे। कई दशकों तक यह नीति चली, लेकिन धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि प्रतिस्पर्धा के अभाव में उद्योग न तो नवाचार कर रहे थे और न ही गुणवत्ता में सुधार।
1991 के आर्थिक सुधार और उदारीकरण
1991 तक आते-आते, भारत सरकार ने यह महसूस किया कि दीर्घकालिक रूप से संरक्षणवाद उद्योगों को अदक्ष बना सकता है। प्रतिस्पर्धा के अभाव में गुणवत्ता और नवाचार पर ध्यान नहीं जाता, और उपभोक्ताओं को सीमित विकल्प चुनने पड़ते थे। उदारीकरण का मुख्य विचार यह था कि विदेशी प्रतिस्पर्धा आने से उद्योग स्वयं को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित होंगे। इसलिए, भारत ने अपनी विदेश व्यापार और निवेश नीतियों का उदारीकरण करना शुरू किया।
सरकार ने आयात शुल्कों को कम किया और कोटा प्रणाली को धीरे-धीरे समाप्त किया। विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश करने की अनुमति मिली। इससे विदेशी पूंजी और तकनीक का प्रवाह बढ़ा। उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद और सेवाएँ प्रतिस्पर्धी कीमतों पर मिलने लगे। उदाहरण के लिए, पहले दूरसंचार क्षेत्र में केवल सरकारी कंपनी होती थी, लेकिन उदारीकरण के बाद कई निजी और विदेशी कंपनियाँ आने से मोबाइल फोन सस्ते और सुविधाएँ बढ़ गईं। इसी प्रकार, वाहन उद्योग में भी कई मॉडल और ब्रांड उपलब्ध हुए।
उदारीकरण के कारण ही आज हम मोबाइल फोन से लेकर कारों तक में विविधता और नवाचार देखते हैं। विदेशी कंपनियों ने भारत में उत्पादन केंद्र स्थापित किए, जिससे रोजगार बढ़ा और आर्थिक विकास को गति मिली। वैश्वीकरण का यह पूरा तंत्र प्रौद्योगिकी और उदारीकरण के पहियों पर ही सवार है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: वैश्वीकरण का परिचय और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
- भाग 2: विदेशी व्यापार और बाजारों का एकीकरण
- You are Reading Here: वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक
- भाग 4: विश्व व्यापार संगठन और उदारीकरण
- भाग 5: भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव
- भाग 6: न्यायसंगत वैश्वीकरण और अभ्यास
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