आज के दौर में, वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया को एक करीबी गाँव में बदल दिया है। हम सभी अपने बाज़ारों में विभिन्न देशों में बनी वस्तुएँ देखते हैं, जैसे जापान की कारें, अमेरिका के इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद और इटली के डिज़ाइनर कपड़े। यह सब वैश्वीकरण की देन है, जिसने सीमाओं को पार कर अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ दिया है।
कल्पना कीजिए, कुछ दशक पहले तक भारत में बहुत सीमित विकल्प थे। आपके माता-पिता या दादा-दादी बताते होंगे कि उनके समय में गाड़ियाँ केवल अंबेसडर और फिएट हुआ करती थीं, और टीवी-फ्रिज जैसे सामान मिलना मुश्किल था। लेकिन आज, आपके सामने दुनिया भर के उत्पाद हैं – चाहे सैमसंग का फोन हो या नाइकी के जूते। यह बदलाव वैश्वीकरण की प्रक्रिया का परिणाम है।
वैश्वीकरण का अर्थ
वैश्वीकरण का अर्थ है विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं का आपस में जुड़ना। इसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और सूचना का अंतर्राष्ट्रीय प्रवाह शामिल है। पहले उत्पादन मुख्यतः राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर होता था, लेकिन अब कंपनियाँ दुनिया भर में फैल गई हैं। इससे उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलते हैं और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। वैश्वीकरण के कारण भारत में विदेशी कंपनियों का आगमन हुआ और भारतीय कंपनियाँ भी विदेशों में गईं। यह जुड़ाव विदेशी व्यापार और बाजारों के एकीकरण विदेशी व्यापार और बाजारों का एकीकरण द्वारा संभव हुआ।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (एमएनसी)
बीसवीं शताब्दी के मध्य तक उत्पादन मुख्यतः देशों के भीतर होता था और केवल कच्चे माल व तैयार उत्पादों का ही व्यापार होता था। लेकिन अब बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (एमएनसी) वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ये वे कंपनियाँ हैं जो एक से अधिक देशों में उत्पादन और सेवाओं पर नियंत्रण रखती हैं। एमएनसी सस्ते श्रम, कच्चे माल और बड़े बाजारों की तलाश में विभिन्न देशों में अपने कार्यालय और कारखाने स्थापित करती हैं।
एमएनसी का कार्य करने का ढंग
एमएनसी अपनी उत्पादन प्रक्रिया को अलग-अलग देशों में बाँटकर लागत बचाती हैं। एक उदाहरण देखें: एक अमेरिकी कंपनी जो औद्योगिक उपकरण बनाती है, वह डिज़ाइन का काम अमेरिका में रखती है, क्योंकि वहाँ कुशल डिज़ाइनर हैं। फिर आवश्यक पुर्जे चीन में बनवाती है, जहाँ उत्पादन लागत कम है। इन पुर्जों को जोड़ने का काम मेक्सिको या पूर्वी यूरोप में होता है, जहाँ मज़दूरी सस्ती है। अंत में, ग्राहक सेवा के लिए भारत के कॉल सेंटरों का उपयोग करती है, क्योंकि यहाँ अंग्रेज़ी बोलने वाले कुशल लोग कम वेतन में मिल जाते हैं। इस प्रकार, उत्पादन की कुल लागत में लगभग 50-60% की बचत हो जाती है।
उत्पादन का प्रसार
एमएनसी अपने उत्पादन को कई देशों में फैलाकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनती हैं। वे कई बार स्थानीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम (ज्वाइंट वेंचर) बनाती हैं, जिससे उन्हें स्थानीय बाजार की जानकारी और वितरण नेटवर्क मिल जाता है। दूसरा तरीका है स्थानीय कंपनियों का अधिग्रहण, जैसे कारगिल फूड्स ने परख फूड्स को खरीदकर सीधे भारत के खाद्य तेल बाजार में पैठ बनाई। इसके अलावा, एमएनसी आपूर्ति शृंखला के माध्यम से भी उत्पादन को नियंत्रित करती हैं – वे स्थानीय उत्पादकों को अपने ब्रांड के लिए सामान बनाने का ऑर्डर देती हैं और फिर उसे अपने नाम से बेचती हैं।
विदेशी निवेश
विदेशी निवेश वह निवेश है जो किसी कंपनी या व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे देश में भूमि, भवन, मशीनरी आदि खरीदने के लिए किया जाता है। यह लाभ की आशा से किया जाता है। भारत में इसका एक बड़ा उदाहरण है फोर्ड मोटर्स, जिसने 1995 में चेन्नई के पास एक बड़ा संयंत्र स्थापित करने के लिए 1700 करोड़ रुपए का निवेश किया। इस निवेश से न केवल फोर्ड को भारत के विशाल बाजार तक पहुँच मिली, बल्कि भारत में रोजगार और तकनीक का स्थानांतरण भी हुआ। वैश्वीकरण के इस दौर में भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव व्यापक रहा है।
एमएनसी का स्थानीय कंपनियों पर प्रभुत्व
बड़ी एमएनसी अपनी विशाल पूंजी, उन्नत तकनीक और बेहतर विपणन रणनीतियों के दम पर स्थानीय छोटे और मध्यम उद्योगों को चुनौती देती हैं। अक्सर स्थानीय कंपनियाँ या तो एमएनसी के साथ साझेदारी कर लेती हैं या बाज़ार से बाहर हो जाती हैं। यह एकतरफा दबाव विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता का विषय हो सकता है। इसी संदर्भ में न्यायसंगत वैश्वीकरण की आवश्यकता पड़ती है, ताकि सभी को समान अवसर मिल सकें।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- You are Reading Here: वैश्वीकरण का परिचय और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
- भाग 2: विदेशी व्यापार और बाजारों का एकीकरण
- भाग 3: वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक
- भाग 4: विश्व व्यापार संगठन और उदारीकरण
- भाग 5: भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव
- भाग 6: न्यायसंगत वैश्वीकरण और अभ्यास
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