स्वयं सहायता समूह (SHG) ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों, विशेषकर महिलाओं, को बिना किसी ऋणाधार के उचित ऋण उपलब्ध कराने का एक प्रभावी माध्यम है। यह पद्धति गरीबों के सामने ऋण प्राप्त करने की चुनौतियों—जैसे गिरवी रखने योग्य संपत्ति का अभाव, औपचारिक दस्तावेज़ों की कमी और बैंकों की अनिच्छा—को दूर करती है। SHG के माध्यम से सामूहिक बचत और साख का निर्माण होता है, जो सदस्यों को कम ब्याज पर ऋण प्राप्त करने में सहायता करता है।
राधा, गाँव की एक महिला, अपनी सिलाई का काम शुरू करना चाहती थी लेकिन उसके पास बैंक से ऋण लेने के लिए न तो ज़मीन थी और न ही कोई अन्य संपत्ति। औपचारिक साख के स्रोत उसकी मदद नहीं कर पा रहे थे। फिर उसे अपने गाँव के स्वयं सहायता समूह के बारे में पता चला। समूह की सदस्य बनने के बाद, उसने हर महीने 50 रुपए की बचत शुरू की और कुछ ही महीनों में समूह से 2000 रुपए का ऋण लेकर एक सिलाई मशीन खरीद ली। आज वह अच्छी कमाई कर रही है और समय पर ऋण भी चुका रही है। यह उदाहरण दर्शाता है कि SHG किस प्रकार गरीबों के जीवन में बदलाव ला सकता है।
गरीबों के सामने ऋण प्राप्त करने की चुनौतियाँ
गरीबों के लिए औपचारिक स्रोतों से ऋण प्राप्त करना बहुत कठिन होता है। इसके मुख्य कारण हैं: पहला, उनके पास ऋणाधार (गिरवी रखने योग्य संपत्ति) का अभाव होता है। दूसरा, उनके पास आय प्रमाण-पत्र, स्थायी निवास प्रमाण-पत्र जैसे औपचारिक दस्तावेज़ नहीं होते जो बैंक माँगते हैं। तीसरा, बैंक उनकी कम और अनियमित आय के कारण ऋण की वापसी को लेकर आश्वस्त नहीं होते। परिणामस्वरूप, गरीबों को अक्सर अनौपचारिक ऋणदाताओं, जैसे साहूकारों, की ओर रुख करना पड़ता है जो अत्यधिक ब्याज दरों पर ऋण देते हैं और शोषण करते हैं। हम पहले औपचारिक और अनौपचारिक साख के स्रोत और साख की शर्तें के बारे में पढ़ चुके हैं। स्वयं सहायता समूह इसी चुनौती का सामूहिक समाधान प्रस्तुत करते हैं।
स्वयं सहायता समूह: परिभाषा और संरचना
स्वयं सहायता समूह एक छोटा अनौपचारिक संगठन है जिसमें सामान्यतः 15 से 20 सदस्य होते हैं, और अधिकांश सदस्य ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ होती हैं। ये सदस्य नियमित रूप से, प्रायः सप्ताह या माह में एक बार, बैठक करते हैं। इन बैठकों में वे अपनी छोटी-छोटी बचतों को एकत्र कर एक सामूहिक कोष बनाते हैं। प्रत्येक सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार 25 रुपए से लेकर 100 रुपए तक प्रति माह बचत करता है। समूह के सभी निर्णय, जैसे ऋण देना, ब्याज दर तय करना, बचत की राशि निर्धारित करना, सदस्य स्वयं मिलकर लेते हैं; इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होता।
SHG की कार्यप्रणाली
SHG की कार्यप्रणाली का मूल आधार सदस्यों की नियमित बचत है। इन छोटी-छोटी बचत राशियों से एक संचित कोष तैयार होता है। इस कोष का उपयोग समूह अपने सदस्यों की तत्कालीन छोटी ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने में करता है। उदाहरण के लिए, कोई सदस्य बीज और खाद खरीदने, सिलाई मशीन लेने, मुर्गी पालन शुरू करने या पशु खरीदने के लिए ऋण ले सकता है। समूह इस ऋण पर बहुत कम और उचित ब्याज दर लगाता है, जो आमतौर पर अनौपचारिक स्रोतों की तुलना में काफी कम होती है।
जब समूह लगभग एक या दो वर्षों तक नियमित रूप से बचत करता है और अपने आंतरिक ऋणों का समय पर पुनर्भुगतान करता है, तो वह बैंक के लिए एक विश्वसनीय इकाई बन जाता है। इस स्थिति में, बैंक समूह के नाम पर एक बड़ा ऋण स्वीकार करता है। यह ऋण समूह की सामूहिक साख के आधार पर दिया जाता है, न कि किसी एक सदस्य की व्यक्तिगत संपत्ति या ऋणाधार पर।
SHG और बैंक का संबंध
बैंक और SHG के बीच एक विशेष संबंध होता है। बैंक समूह को एक संस्था के रूप में ऋण प्रदान करता है। इसके बाद, समूह यह राशि अपने सदस्यों को उनकी आवश्यकता, ऋण चुकाने की क्षमता और अपनी निर्धारित ब्याज दर पर वितरित करता है। ब्याज दर और ऋण की शर्तें समूह स्वयं तय करता है, लेकिन ये सदस्यों के लिए लाभकारी होती हैं। यदि कोई सदस्य ऋण चुकाने में विफल रहता है, तो उसकी जिम्मेदारी पूरे समूह की होती है। इससे एक मजबूत सामूहिक गारंटी प्रणाली बनती है, जो बैंक को सुरक्षा प्रदान करती है और सदस्यों को अनुशासित रहने के लिए प्रेरित करती है।
स्वयं सहायता समूहों के लाभ
SHG के अनेक लाभ हैं: (क) सबसे बड़ा लाभ यह है कि गरीबों को बिना किसी ऋणाधार के ऋण मिल जाता है। (ख) ये समूह विशेषकर महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में सहायक हैं। जब महिलाएँ आर्थिक रूप से सक्षम होती हैं, तो उनका परिवार और समाज में सम्मान बढ़ता है। (ग) SHG के नियमित बैठकों में केवल आर्थिक मुद्दे ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, घरेलू हिंसा आदि सामाजिक विषयों पर भी चर्चा होती है। इससे सामाजिक जागरूकता बढ़ती है। (घ) SHG स्वरोजगार के अवसरों को बढ़ावा देते हैं। सदस्य विभिन्न छोटे-मोटे उद्यम, जैसे मुर्गी पालन, सिलाई-कढ़ाई, अचार-पापड़ बनाना आदि, शुरू कर सकते हैं।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. मोहम्मद युनूस ने SHG की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा था, “छोटे लोग छोटी गतिविधियों से विकास का चमत्कार कर सकते हैं।” यह कथन SHG की सफलता का मूल मंत्र है।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: मुद्रा: विनिमय का माध्यम
- भाग 2: मुद्रा के आधुनिक रूप और बैंकों की भूमिका
- भाग 3: साख (ऋण) की अवधारणा और ऋण की शर्तें
- भाग 4: औपचारिक और अनौपचारिक साख के स्रोत
- You are Reading Here: स्वयं सहायता समूह और कर्जदारों की पहुँच

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