इस अध्याय में हम राजनीतिक दलों की ज़रूरत, कार्य, दलीय व्यवस्था के प्रकार, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की पहचान, उनसे जुड़ी चुनौतियाँ और सुधार के उपायों को आसान भाषा में समझेंगे। यूपी बोर्ड कक्षा 10 की राजनीति विज्ञान की किताब ‘लोकतांत्रिक राजनीति’ का यह टॉपिक परीक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है। यहाँ से अक्सर सवाल पूछे जाते हैं, इसलिए इसे पढ़ना और समझना बहुत ज़रूरी है।
चलिए, सबसे पहले इस पूरे चैप्टर पर एक क्विज़ खेलकर देखते हैं। क्विज़ शुरू होने से पहले एक ज्ञान स्लाइड दिखाई जाएगी — उसे ध्यान से पढ़ लेना, फिर सवालों के जवाब देना। इससे आपको पूरा आइडिया लग जाएगा कि कौन-से पॉइंट ज़्यादा पूछे जाते हैं।
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जैसे गाँव के पंचायत चुनाव में पूरा गाँव दो-तीन गुटों में बँट जाता है और हर गुट अपने उम्मीदवारों का पैनल खड़ा करता है, ठीक वैसे ही बड़े पैमाने पर राजनीतिक दल काम करते हैं। बिना दलों के चुनाव लड़ना और सरकार बनाना लगभग नामुमकिन है। लेकिन सोचिए, आखिर ये दल होते क्या हैं? और क्या सच में लोकतंत्र को इनकी ज़रूरत है?
राजनीतिक दल क्या है?
राजनीतिक दल, लोगों का एक संगठित समूह है जो चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करना चाहता है। यह समूह समाज के सामूहिक हित के लिए कुछ नीतियाँ और कार्यक्रम तय करता है। हर दल की अपनी एक अलग पहचान होती है जो उसकी नीतियों और सामाजिक आधार से बनती है।
एक राजनीतिक दल के तीन मुख्य हिस्से होते हैं — नेता, सक्रिय सदस्य और समर्थक। नेता दल की दिशा तय करते हैं, सक्रिय सदस्य संगठन को चलाते हैं और समर्थक चुनाव में मदद करते हैं। दल का मतलब सिर्फ एक पार्टी से नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था है जिसके ज़रिए लोग चुनावी मैदान में उतरते हैं और सत्ता पाने की कोशिश करते हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्यों?
पिछली कक्षाओं में आपने पढ़ा था कि बड़े समाज के लिए प्रतिनिधित्व वाला लोकतंत्र ज़रूरी है। जब समाज बड़ा और जटिल हो जाता है, तब अलग-अलग विचारों को एक जगह समेटकर सरकार तक पहुँचाने के लिए किसी माध्यम की ज़रूरत होती है। यही काम राजनीतिक दल करते हैं। दल, लोगों की राय को कुछ मुद्दों पर इकट्ठा करते हैं और उन नीतियों को लागू करने के लिए सत्ता पाने का प्रयास करते हैं।
अगर दल न हों, तो सब उम्मीदवार निर्दलीय होंगे। ऐसे में कोई बड़ा नीतिगत बदलाव का वादा नहीं कर पाएगा। सरकार तो बनेगी, लेकिन उसकी उपयोगिता पर सवाल उठेगा। प्रतिनिधि अपने इलाके के लिए थोड़ा-बहुत काम करेंगे, लेकिन देश कैसे चलेगा, इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। इसलिए राजनीतिक दल लोकतंत्र की अहम ज़रूरत हैं। जैसे क्रिकेट में टीम के बिना मैच अधूरा है, वैसे ही लोकतंत्र में दलों के बिना शासन संभव नहीं।
राजनीतिक दल के मुख्य कार्य
राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि उनके कई ज़रूरी काम होते हैं जो लोकतंत्र की रीढ़ माने जाते हैं।
चुनाव लड़ना और नीतियाँ बनाना
दल अपने उम्मीदवार उतारते हैं। भारत में आमतौर पर दल के नेता ही उम्मीदवार चुनते हैं। दल मतदाताओं के सामने अलग-अलग नीतियाँ और कार्यक्रम रखते हैं। लोग अपनी पसंद की नीतियों के हिसाब से वोट देते हैं और सरकार, शासक दल की राय के अनुसार नीतियाँ तय करती है।
कानून बनाना और सरकार गठन
देश के कानून बनाने में दलों की अहम भूमिका होती है। विधायिका के अधिकतर सदस्य किसी न किसी दल से जुड़े होते हैं और वे अपने दल के नेता के निर्देश पर फैसला करते हैं। चुनाव जीतने के बाद दल सरकार बनाते हैं। जो दल सरकार नहीं बनाते, वे विपक्ष की भूमिका निभाते हैं और सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते हैं।
जनमत बनाना और लोगों से जुड़ना
दल मुद्दे उठाते हैं, बहस कराते हैं और कई बार आंदोलन भी करते हैं। रायों के टकराव से ही सही जनमत बनता है। इतना ही नहीं, दल सरकारी योजनाओं को आम लोगों तक पहुँचाने में भी मदद करते हैं। लोगों को किसी अधिकारी से बात करने की अपेक्षा दल के कार्यकर्ता से बात करना आसान लगता है, इसलिए दलों पर भरोसा न होते हुए भी लोग उन्हें अपना मानते हैं।
दलीय व्यवस्था के प्रकार
दुनिया में अलग-अलग तरह की दलीय व्यवस्थाएँ हैं। भारत में बहुदलीय व्यवस्था है। लेकिन सभी देशों में ऐसा नहीं है। चीन में सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ही शासन कर सकती है, इसे एकदलीय व्यवस्था कहते हैं, जो लोकतांत्रिक नहीं मानी जाती। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में दो बड़े दल होते हैं जो बारी-बारी से सत्ता में आते हैं, इसे द्विदलीय व्यवस्था कहते हैं।
भारत में कई दल हैं, इसलिए यहाँ अक्सर गठबंधन की सरकारें बनती हैं। उदाहरण के लिए, 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और वाम मोर्चा जैसे गठबंधन थे। बहुदलीय व्यवस्था से सरकार में थोड़ी अस्थिरता आ सकती है, लेकिन इसका फ़ायदा यह है कि विभिन्न वर्गों और विचारों का प्रतिनिधित्व मिल जाता है। भारत जैसे विविधता वाले देश में दो-तीन पार्टियाँ सारी सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं को नहीं समेट सकतीं, इसलिए यहाँ बहुदलीय व्यवस्था कारगर है।
राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल
चुनाव आयोग दलों को पंजीकृत करके मान्यता देता है। जो दल राज्य विधानसभा चुनाव में कुल मतों का 6 प्रतिशत प्राप्त करते हैं और कम से कम दो सीटें जीतते हैं, उन्हें राज्यीय दल कहते हैं। वहीं, लोकसभा चुनाव में 6 प्रतिशत वोट या चार राज्यों की विधानसभा में 6 प्रतिशत वोट और लोकसभा की कम से कम चार सीटें जीतने पर राष्ट्रीय दल की मान्यता मिलती है। 2023 की सूची के अनुसार भारत में छह राष्ट्रीय दल हैं — आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और नेशनल पीपुल्स पार्टी।
आम आदमी पार्टी (आप) 2012 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद बनी और आज पंजाब व दिल्ली में सरकार चला रही है। बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कांशीराम ने 1984 में की थी। भारतीय जनता पार्टी 1980 में बनी और अभी केंद्र में शासन कर रही है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में मजबूत है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दुनिया के सबसे पुराने दलों में से एक है। नेशनल पीपुल्स पार्टी पूर्वोत्तर की पहली राष्ट्रीय पार्टी है। इनके अलावा समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बीजू जनता दल, तेलुगु देशम जैसे कई क्षेत्रीय दल भी हैं जो अपने-अपने राज्यों में मजबूत पकड़ रखते हैं।
राजनीतिक दलों के सामने चुनौतियाँ
लोकतंत्र में दलों का बहुत बड़ा रोल है, लेकिन इनके कामकाज में कई गंभीर समस्याएँ भी हैं। इन्हें चुनौतियों के रूप में देखा जाता है।
आंतरिक लोकतंत्र का अभाव
ज़्यादातर दलों में सारी ताकत एक या कुछ नेताओं के हाथ में होती है। न सदस्यों की खुली सूची होती है, न नियमित संगठनात्मक बैठकें, और न ही आंतरिक चुनाव। कार्यकर्ता को पता तक नहीं चलता कि पार्टी के अंदर क्या हो रहा है। अगर कोई नेता से सहमत न हो, तो उसके लिए पार्टी में टिके रहना मुश्किल हो जाता है।
वंशवाद
कई दलों में शीर्ष पद पर हमेशा एक ही परिवार के लोग आते हैं। यानी नेता अपने परिवार के लोगों को आगे बढ़ाते हैं। इससे अनुभवहीन लोग सत्ता के पदों पर पहुँच जाते हैं और बाकी कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफ़ी होती है। यह समस्या सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में देखी जाती है।
पैसा और अपराधी तत्व
चुनाव जीतने के लिए पार्टियाँ हर तरीका अपनाने से नहीं हिचकतीं। वे ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देती हैं जिनके पास खूब पैसा हो या जो चंदा जुटा सकें। बड़ी कंपनियाँ और अमीर लोग पार्टी की नीतियों को अपने हिसाब से प्रभावित करते हैं। कई बार तो पार्टियाँ अपराधी छवि वाले लोगों को भी समर्थन दे देती हैं।
विचारधारा का संकट
अब दलों के बीच नीतियों में कोई खास अंतर नहीं रहा। आर्थिक मुद्दों पर सबकी राय लगभग एक जैसी हो गई है। अलग सोच रखने वालों के लिए कोई विकल्प नहीं बचता। लोग नया नेता भी नहीं चुन पाते, क्योंकि वही कुछ चेहरे हर दल में घूमते रहते हैं।
सुधार के उपाय
दलों में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए हैं। संविधान में संशोधन करके दल-बदल रोकने का प्रयास किया गया है। अगर कोई सांसद या विधायक दल बदलता है, तो उसकी सीट चली जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हर उम्मीदवार के लिए अपनी संपत्ति और आपराधिक मामलों की जानकारी शपथपत्र में देना अनिवार्य कर दिया है। चुनाव आयोग ने दलों को संगठनात्मक चुनाव कराने और आयकर रिटर्न भरने के आदेश दिए हैं, फिर भी सुधार अभी अधूरा है।
कुछ और सुझाव भी दिए जाते हैं — दलों का आंतरिक कामकाज कानून से तय हो, महिलाओं को एक-तिहाई टिकट मिले, सरकार चुनाव का खर्च उठाए। लेकिन कानून से ही सब ठीक नहीं होगा। आम नागरिकों को भी दबाव बनाना होगा, पत्र लिखने होंगे, प्रचार करना होगा। सबसे असरदार उपाय है — खुद राजनीति में हिस्सा लेना। इस पाठ की आखिरी लाइन कहती है — खराब राजनीति का समाधान ज़्यादा और बेहतर राजनीति है।
- भाग 1: राजनीतिक दल: अर्थ, आवश्यकता और कार्य
- भाग 2: दलीय व्यवस्थाएँ: एकदलीय, द्विदलीय, बहुदलीय और गठबंधन
- भाग 3: भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल
- भाग 4: राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियाँ
- भाग 5: राजनीतिक दलों में सुधार के उपाय
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