भारत में कोई भी राजनीतिक दल बिना चुनाव आयोग में पंजीकरण के चुनाव नहीं लड़ सकता। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की मान्यता के लिए चुनाव आयोग कड़े नियम बनाता है। इस उपपाठ में हम जानेंगे कि राज्य दल और राष्ट्रीय दल की मान्यता कैसे मिलती है, 2023 तक कौन-कौन से छह राष्ट्रीय दल हैं, तथा क्षेत्रीय दल गठबंधन की राजनीति में क्या भूमिका निभाते हैं।
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मान लीजिए क्रिकेट टीम में कुछ खिलाड़ी रणजी ट्रॉफी जैसे घरेलू टूर्नामेंट तक सीमित होते हैं, तो कुछ अंतरराष्ट्रीय मैच खेलते हैं। चुनाव आयोग ने भी राजनीतिक दलों को उनकी राष्ट्रीय उपस्थिति के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटा है। जिस दल का प्रभाव पूरे देश में होता है, वह राष्ट्रीय दल कहलाता है। जिसका प्रभाव सिर्फ एक या कुछ राज्यों तक सीमित रहता है, उसे राज्यीय या क्षेत्रीय दल का दर्जा मिलता है।
पंजीकरण और मान्यता
चुनाव आयोग सभी दलों को बराबर मानता है, परंतु बड़े और स्थापित दलों को विशेष सुविधाएँ देता है। हर दल को आयोग में पंजीकरण कराना अनिवार्य है। मान्यता प्राप्त दलों को एक पक्का चुनाव चिह्न दिया जाता है, जिसका उपयोग केवल उस दल के अधिकृत उम्मीदवार कर सकते हैं।
राज्य दल की शर्त
राज्य स्तर पर मान्यता पाने के लिए दल को राज्य विधानसभा चुनाव में कुल मतों का 6% या उससे अधिक प्राप्त करना होता है और कम से कम दो सीटों पर जीत हासिल करनी होती है।
राष्ट्रीय दल की शर्त
राष्ट्रीय दल बनने के लिए लोकसभा या चार राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में 6% मत मिलने चाहिए और साथ में लोकसभा में कम से कम चार सीटें भी जीतनी पड़ती हैं। 2023 की अधिसूचना के अनुसार देश में छह ही मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल हैं।
छह राष्ट्रीय दल
इन छह दलों की सूची में आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और नेशनल पीपुल्स पार्टी शामिल हैं।
आम आदमी पार्टी (आप)
2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद 26 नवंबर 2012 को इस पार्टी का गठन हुआ। आप जवाबदेही, स्वच्छ शासन, पारदर्शिता और सुशासन के विचारों पर चलती है। दिल्ली विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद कांग्रेस के समर्थन से उसने सरकार बनाई। 2022 के गुजरात चुनाव में यह तीसरे मोर्चे के रूप में उभरी। वर्तमान में पंजाब और दिल्ली में इसकी सरकार है। 2019 में इसके पास एक लोकसभा सीट थी।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा)
कांशीराम के नेतृत्व में 1984 में बनी। यह दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के लिए राजनीतिक सत्ता पाने का प्रयास करती है। साहू महाराज, महात्मा फुले, पेरियार रामास्वामी और आंबेडकर से इसकी प्रेरणा मिली। उत्तर प्रदेश में इसका मुख्य आधार है और वहाँ चार बार सरकार बन चुकी है। 2019 में उसे 3.63% वोट और 10 सीटें मिलीं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)
1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ बनाया था। 1980 में इसी जनसंघ को पुनर्गठित करके भाजपा बनी। पार्टी दीनदयाल उपाध्याय के समग्र मानवतावाद और अंत्योदय से प्रेरित है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद यानी हिंदुत्व इसकी प्रमुख विचारधारा है। वह जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के खिलाफ है और समान नागरिक संहिता की पक्षधर है। 1990 के दशक में दक्षिण, पूर्व, पूर्वोत्तर और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका विस्तार हुआ। 1998 में इसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व किया। 2019 में 303 सीटें जीतकर केंद्र की सत्ता में पहुँची।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) (सीपीआई-एम)
1964 में स्थापित यह पार्टी मार्क्सवाद-लेनिनवाद में आस्था रखती है। यह समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के पक्ष में है। सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने के लिए चुनावों को उपयोगी मानती है। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में इसका मजबूत आधार रहा है। पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों तक शासन किया। 2019 में 1.75% वोट और 3 सीटें मिलीं।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस)
1885 में गठित कांग्रेस दुनिया के सबसे पुराने राजनीतिक दलों में से एक है। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में इसने आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का प्रयास किया। 1971 तक यह लगातार और 1980-1989 तक केंद्र में सत्ता में रही। वैचारिक रूप से केंद्र-वाम मानी जाती है। धर्मनिरपेक्षता, कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों के हितों पर जोर देती है। 2004-2014 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया। 2019 में 19.5% वोट और 52 सीटें जीतीं।
नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी)
पी.ए. संगमा ने जुलाई 2013 में इसका गठन किया। यह पूर्वोत्तर भारत की पहली राष्ट्रीय पार्टी है। पार्टी देश की विविधता में विश्वास करती है और सभी को शिक्षा, रोजगार तथा समाज के सभी वर्गों का सशक्तिकरण देना चाहती है। मेघालय में इसने सरकार बनाई। 2019 में एक लोकसभा सीट जीती।
क्षेत्रीय दल
राष्ट्रीय दलों के अलावा अन्य प्रमुख दलों को चुनाव आयोग ने राज्यीय दल के रूप में मान्यता दी है। इन्हें क्षेत्रीय दल भी कहा जाता है। जरूरी नहीं कि क्षेत्रीय दल की विचारधारा क्षेत्रीय ही हो। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हैं, फिर भी वे राज्य दल ही हैं। बीजू जनता दल, शिवसेना, डीएमके और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसे दल क्षेत्रीय पहचान को लेकर सचेत हैं।
पिछले तीन दशकों में क्षेत्रीय दलों की संख्या और ताकत बढ़ी है। 2014 तक किसी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, इसलिए राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करना पड़ा। 1996 के बाद लगभग हर क्षेत्रीय दल को किसी न किसी राष्ट्रीय गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने का अवसर मिला। इससे संघवाद और लोकतंत्र मजबूत हुए। साथ ही राजनीतिक दलों के समक्ष कई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: राजनीतिक दल: अर्थ, आवश्यकता और कार्य
- भाग 2: दलीय व्यवस्थाएँ: एकदलीय, द्विदलीय, बहुदलीय और गठबंधन
- You are Reading Here: भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल
- भाग 4: राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियाँ
- भाग 5: राजनीतिक दलों में सुधार के उपाय
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