दलीय व्यवस्था किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। यह तय करती है कि देश में कितने राजनीतिक दल चुनाव लड़ सकते हैं और सत्ता तक कैसे पहुँच सकते हैं। एकदलीय, द्विदलीय, बहुदलीय और गठबंधन – इन चार प्रकारों को समझना बेहद जरूरी है। भारत में चुनाव आयोग में 750 से अधिक दल पंजीकृत हैं, लेकिन सभी गंभीर दावेदार नहीं होते।
चलिए, सबसे पहले इस पूरे उपपाठ पर एक क्विज़ खेलते हैं। क्विज़ शुरू होने से पहले एक ज्ञान स्लाइड दिखाई जाएगी – उसे ध्यान से पढ़ लें, फिर सवालों के जवाब दें। इससे अंदाज़ा लग जाएगा कि कौन से पॉइंट ज़्यादा पूछे जाते हैं।
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आप किसी स्कूल के चुनाव की कल्पना कीजिए। अगर केवल एक ही पार्टी खड़ी हो, तो वोट देने का कोई मतलब नहीं बचता। ठीक उसी तरह, राजनीति में दलों की संख्या तय करती है कि जनता के पास असली विकल्प है या नहीं। जैसे एक गाँव में एक ही दुकान हो, तो आपको वही सामान खरीदना पड़ता है। एकदलीय व्यवस्था में भी जनता के पास कोई विकल्प नहीं होता।
एकदलीय व्यवस्था और उसकी सीमाएँ
ऐसी व्यवस्था में केवल एक ही दल को सरकार बनाने और चलाने की अनुमति होती है। चीन में केवल कम्युनिस्ट पार्टी शासन करती है। वहाँ कानूनी रूप से दल बनाने की आज़ादी है, लेकिन चुनाव प्रणाली स्वतंत्र प्रतिद्वंद्विता नहीं देती। इसलिए यह लोकतांत्रिक विकल्प नहीं मानी जाती, क्योंकि प्रतिद्वंद्विता का अभाव होता है।
द्विदलीय और बहुदलीय व्यवस्था
द्विदलीय व्यवस्था में सत्ता आमतौर पर दो मुख्य दलों के बीच बदलती रहती है। अन्य छोटे दल भी हो सकते हैं, पर सरकार बनाने के प्रबल दावेदार सिर्फ दो होते हैं। अमरीका और ब्रिटेन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
भारत में बहुदलीय व्यवस्था है। यहाँ अनेक दल सत्ता की होड़ में भाग लेते हैं। दो से अधिक दलों के पास अपने दम पर या गठबंधन से सत्ता में आने का अवसर होता है। राज्य स्तर पर कभी दो-दलीय, कभी दो गठबंधनों वाली बहुदलीय, तो कभी शुद्ध बहुदलीय व्यवस्था देखने को मिलती है। भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल मिलकर चुनावी मैदान में उतरते हैं।
गठबंधन: कई दल, एक मोर्चा
जब बहुदलीय व्यवस्था में कई दल चुनाव लड़ने और सत्ता पाने के लिए हाथ मिलाते हैं, तो उसे गठबंधन या मोर्चा कहते हैं। 2004 के संसदीय चुनाव में तीन प्रमुख गठबंधन थे – राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) और वाम मोर्चा। गठबंधन कभी-कभी घालमेल और अस्थिरता लाता है, लेकिन विभिन्न हितों और विचारों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देता है।
कौन सी व्यवस्था सबसे अच्छी?
यह सवाल आसान नहीं है। दलीय व्यवस्था का चुनाव किसी देश के हाथ में नहीं होता। यह समाज की प्रकृति, राजनीतिक विभाजन, इतिहास और चुनाव प्रणाली से विकसित होती है। भारत में बहुदलीय व्यवस्था इसलिए है, क्योंकि दो-तीन दल इतने बड़े देश की सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं को समेट नहीं सकते।
कई लोग मानते हैं कि बहुदलीय व्यवस्था से अस्थिरता आती है। लेकिन यही व्यवस्था राजनीतिक दलों की चुनौतियों के बावजूद विभिन्न वर्गों को आवाज़ देती है।
- भाग 1: राजनीतिक दल: अर्थ, आवश्यकता और कार्य
- You are Reading Here: दलीय व्यवस्थाएँ: एकदलीय, द्विदलीय, बहुदलीय और गठबंधन
- भाग 3: भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल
- भाग 4: राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियाँ
- भाग 5: राजनीतिक दलों में सुधार के उपाय
दलों पर जनता का भरोसा और भागीदारी
दक्षिण एशिया की जनता दलों पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करती। दुनिया में राजनीतिक दल सबसे कम भरोसे वाली संस्था हैं। फिर भी भारत में दलों की सदस्यता और निकटता का अनुपात कनाडा, जापान, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों से अधिक है। पिछले तीन दशकों में भारत में दलों के सदस्य बनने और खुद को दल का करीबी बताने वालों का अनुपात बढ़ा है। इसका मतलब है कि भरोसा कम होने के बावजूद लोग राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
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