लोकतंत्र में राजनीतिक दल सबसे अधिक दिखने वाली संस्था हैं। जब भी लोकतंत्र में कोई गड़बड़ी होती है, लोग उसके लिए राजनीतिक दलों को ही दोषी मानते हैं। जनता की नाराजगी दलों के कामकाज के चार पहलुओं पर केंद्रित है: आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, वंशवादी राजनीति, धन और अपराधी तत्वों की घुसपैठ, और विकल्पहीनता। इस उपपाठ में हम राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियाँ को विस्तार से समझेंगे।
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कल्पना कीजिए कि हमारे स्कूल के फुटबॉल क्लब में कप्तान ही सारे निर्णय लेता है। वह तय करता है कि कौन खेलेगा, कब अभ्यास होगा, और कौन सी रणनीति अपनाई जाएगी। बाकी खिलाड़ियों की राय पूछना तो दूर, उन्हें जानकारी तक नहीं दी जाती। तो खिलाड़ियों का मनोबल गिरेगा ही। ठीक यही स्थिति राजनीतिक दलों में देखने को मिलती है, जब कुछ ही नेता सारी शक्ति अपने हाथ में ले लेते हैं।
राजनीतिक दल लोकतंत्र की रीढ़ हैं। ये समाज के विभिन्न वर्गों के हितों को एकजुट करते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इन दलों में कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं, जिनसे लोकतंत्र के मूल्य कमजोर पड़े हैं। इन्हीं प्रवृत्तियों को हम चुनौतियों के रूप में समझेंगे।
चुनौती 1: आंतरिक लोकतंत्र का अभाव
लोकतंत्र का अर्थ ही है जनता की राय से सरकार बनाना। लेकिन यदि दलों के भीतर ही लोकतंत्र नहीं है, तो वे बाहर लोकतंत्र की उम्मीद कैसे जगा सकते हैं? अधिकांश राजनीतिक दलों में सारी शक्ति एक या कुछ नेताओं के हाथ में केंद्रित होती है। दलों के पास सदस्यों की खुली सूची नहीं होती। नियमित संगठनात्मक बैठकें और आंतरिक चुनाव नहीं होते।
कार्यकर्ताओं को पार्टी के आंतरिक कामकाज की जानकारी तक नहीं होती। वे नेताओं के फैसलों को प्रभावित नहीं कर पाते। पार्टी के नाम पर सारे फैसले नेता ही लेते हैं। यदि कोई सदस्य नेता से असहमत होता है, तो उसका पार्टी में टिकना मुश्किल हो जाता है। धीरे-धीरे नीति के प्रति निष्ठा की जगह नेता के प्रति निष्ठा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसका सबसे अच्छा उदाहरण इटली के पूर्व प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी हैं। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और स्वयं को ही उसका नेता घोषित कर दिया। उनके पास कई कंपनियाँ हैं। ऐसे में पार्टी का संचालन लोकतांत्रिक संस्था की तरह नहीं, बल्कि एक निजी व्यवसाय की तरह होता है। भारत के कई राजनीतिक दलों में भी यही स्थिति देखने को मिलती है।
चुनौती 2: वंशवादी राजनीति
जब दलों में पारदर्शिता नहीं होती, तो आम कार्यकर्ता के लिए नेता बनना बहुत कठिन हो जाता है। नेता अपने परिवार और निकट संबंधियों को आगे बढ़ाना पसंद करते हैं। कई दलों में शीर्ष पद पर हमेशा एक ही परिवार के लोग बने रहते हैं। इसे ही वंशवादी राजनीति कहते हैं।
वंशवादी राजनीति दल के अन्य सदस्यों के साथ अन्याय है, क्योंकि वे चाहकर भी नेतृत्व नहीं पा सकते। यह लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं, क्योंकि अनुभवहीन और जनाधार विहीन लोग सत्ता के पदों पर पहुँच जाते हैं। ऐसे लोग शासन में अपनी दिलचस्पी से ज्यादा अपने परिवार के हितों को देखते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में कुछ क्षेत्रीय दलों में पिता के बाद उसका पुत्र या पुत्री ही उत्तराधिकारी बनते हैं।
यह प्रवृत्ति केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कुछ पुराने लोकतांत्रिक देशों सहित लगभग पूरी दुनिया में देखी जाती है।
चुनौती 3: धन और अपराधी तत्वों की घुसपैठ
राजनीतिक दलों का मुख्य लक्ष्य चुनाव जीतना होता है। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे कोई भी जायज़ या नाजायज़ तरीका अपना सकते हैं। वे ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देते हैं जिनके पास पैसा हो या जो पैसा जुटा सकें। इसका परिणाम यह होता है कि धनी लोग और कंपनियाँ दल की नीतियों को प्रभावित करने लगते हैं।
चुनाव में धन की भूमिका इतनी बढ़ गई है कि बिना पैसे के कोई भी ईमानदार उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकता। यह समस्या राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों दोनों में पाई जाती है। कई बार चुनाव आयोग उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी देता है, लेकिन दल फिर भी ऐसे लोगों को टिकट देते हैं।
कई बार दलों को अपराधियों का भी सहारा लेना पड़ता है। वे उनका समर्थन लेते हैं या उन्हें उम्मीदवार बना देते हैं। ऐसे अपराधी जब सत्ता में पहुँचते हैं, तो कानून का राज कमजोर होता है। दुनिया भर के लोकतंत्र समर्थक इस प्रवृत्ति को गंभीरता से देखते हैं।
चुनौती 4: विकल्पहीनता
लोकतंत्र में मतदाता को विभिन्न दलों में से चुनने का अवसर होता है। लेकिन यदि सभी दलों की नीतियाँ और कार्यक्रम एक जैसे हों, तो मतदाता के लिए कोई वास्तविक विकल्प नहीं बचता। ब्रिटेन में लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बीच बुनियादी मसलों पर सहमति है। भारत में भी सभी बड़ी पार्टियों की आर्थिक नीतियों में कोई खास अंतर नहीं है।
इसका नुकसान सबसे ज्यादा उन नागरिकों को होता है जो अलग नीतियाँ चाहते हैं। उनके सामने कोई विकल्प नहीं होता। इसके अलावा, लोगों के पास नया नेता चुनने का भी विकल्प नहीं होता, क्योंकि कुछ ही नेता विभिन्न दलों में घूमते रहते हैं। दरअसल, पार्टियाँ चुनाव जीतने के लिए एक-दूसरे की नीतियों की नकल करने लगती हैं।
वैचारिक अंतर का कम होना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे मतदाता उदासीन हो जाते हैं और कई बार वे मतदान ही नहीं करते।
उपर्युक्त चुनौतियों के बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक दल लोकतंत्र का अनिवार्य अंग हैं। इनके बिना सरकार बनाना संभव नहीं। इसलिए जरूरी है कि इन चुनौतियों का समाधान खोजा जाए। राजनीतिक दलों में सुधार की दिशा में कदम उठाना आवश्यक है। साथ ही, विभिन्न दलीय व्यवस्थाओं की बारीकियों को समझना भी मददगार होगा।
अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: राजनीतिक दल: अर्थ, आवश्यकता और कार्य
- भाग 2: दलीय व्यवस्थाएँ: एकदलीय, द्विदलीय, बहुदलीय और गठबंधन
- भाग 3: भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल
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- भाग 5: राजनीतिक दलों में सुधार के उपाय
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