पिछले भाग में हमने जाना था कि कैसे यूरोप में एक नए मध्यवर्ग का उदय हुआ और ‘उदारवादी राष्ट्रवाद’ ने लोगों के दिलों में आज़ादी की भावना जगाई।
लेकिन क्या फ्रांस और यूरोप के राजा इतनी आसानी से अपनी सत्ता छोड़ने वाले थे? बिल्कुल नहीं! जब 1815 में नेपोलियन की हार हुई, तो यूरोप के पुराने राजाओं ने फिर से अपनी ताकत वापस पाने की कोशिश की। आज के इस भाग में हम जानेंगे कि ‘रूढ़िवाद’ क्या था, वियना की संधि क्यों हुई और ज्युसेपे मेत्सिनी जैसे महान क्रांतिकारियों ने कैसे आज़ादी की लौ को जलाए रखा!
1815 के बाद यूरोप में नया रूढ़िवाद क्या था?
1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियों ने मिलकर नेपोलियन को हरा दिया। नेपोलियन की हार के बाद, यूरोपीय सरकारें रूढ़िवाद की भावना से प्रेरित थीं।
रूढ़िवादी लोग मानते थे कि राज्य और समाज की स्थापित पारंपरिक संस्थाएँ; जैसे—राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार को हर हाल में बनाए रखना चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि जनता को क्रांति वाले अधिकार मिलें। हालाँकि, वे यह भी समझ चुके थे कि एक आधुनिक सेना और कुशल नौकरशाही उनके राजतंत्र को और मज़बूत बना सकती है।
वियना की संधि क्यों हुई थी?
यूरोप के लिए एक नया समझौता तैयार करने के लिए 1815 में विजेता देशों के प्रतिनिधि ‘वियना’ में मिले। इस सम्मेलन की मेज़बानी ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की थी।
इस सम्मेलन में 1815 की वियना संधि तैयार की गई, जिसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:
- नेपोलियाई युद्धों के दौरान हुए बदलावों को खत्म करना।
- फ्रांसीसी क्रांति के दौरान हटाए गए बूर्बो वंश को फ्रांस की सत्ता में फिर से बहाल करना।
- फ्रांस की सीमाओं पर कई नए राज्य कायम करना, ताकि भविष्य में फ्रांस अपना विस्तार न कर सके।
रूढ़िवादी शासकों ने सेंसरशिप क्यों लगाई?
1815 में स्थापित ये नई रूढ़िवादी सरकारें पूरी तरह से निरंकुश थीं। वे आलोचना और असहमति बिल्कुल बरदाश्त नहीं करती थीं। फ्रांसीसी क्रांति से जुड़े ‘स्वतंत्रता और मुक्ति’ के विचारों को रोकने के लिए इन सरकारों ने सेंसरशिप के कड़े नियम बनाए। अखबारों, किताबों, नाटकों और गीतों पर कड़ा नियंत्रण लगा दिया गया।
क्रांतिकारी कौन थे और उनका उद्देश्य क्या था?
1815 के बाद दमन और गिरफ्तारी के डर से अनेक उदारवादी राष्ट्रवादी भूमिगत हो गए। बहुत सारे यूरोपीय राज्यों में क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने और विचारों का प्रसार करने के लिए ‘गुप्त संगठन’ उभर आए।
उस समय ‘क्रांतिकारी’ होने का मतलब था—वियना कांग्रेस के बाद स्थापित राजतंत्रीय व्यवस्थाओं का विरोध करना और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना। ज़्यादातर क्रांतिकारी राष्ट्र-राज्यों की स्थापना को आज़ादी के इस संघर्ष का अनिवार्य हिस्सा मानते थे।
ज्युसेपे मेत्सिनी कौन था और उसका क्या योगदान था?
इटली का महान क्रांतिकारी ज्युसेपे मेत्सिनी ऐसा ही एक व्यक्ति था। उसका जन्म 1805 में जेनोआ में हुआ था।
- उसने दो महत्वपूर्ण भूमिगत संगठनों की स्थापना की: पहला मार्सेई में ‘यंग इटली’ और दूसरा बर्न में ‘यंग यूरोप’।
- मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की मर्जी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई है। इसलिए इटली को जोड़कर एक एकीकृत गणतंत्र बनाना ही होगा।
मेत्सिनी के प्रजातांत्रिक गणतंत्रों के स्वप्न से रूढ़िवादी राजा बहुत डरते थे। इसलिए ड्यूक मैटरनिख ने मेत्सिनी को “हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन” बताया था!
अब खेलें: रूढ़िवाद और क्रांतिकारी क्विज़
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: फ्रेडरिक सॉरयू का कल्पनादर्श और फ्रांसीसी क्रांति
- भाग 2: यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण और नया मध्यवर्ग
- You are Reading Here: 1815 के बाद नया रूढ़िवाद और क्रांतिकारी
- भाग 4: क्रांतियों का युग (1830-1848) और रूमानी कल्पना
- भाग 5: जर्मनी और इटली का एकीकरण
- भाग 6: राष्ट्र की दृश्य-कल्पना और साम्राज्यवाद

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