नमस्कार विद्यार्थियों! कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने जाना था कि योहान गुटेन्बर्ग ने कैसे आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया और बाइबल छापी।
छापेखाने का आविष्कार केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं था। इसने लोगों की ज़िंदगी को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। किताबों के आने से लोगों के सोचने का नज़रिया बदला और सत्ता व धर्मगुरुओं से उनके रिश्ते भी बदल गए। आइए इस भाग में हम पढ़ते हैं कि ‘मुद्रण क्रांति’ ने दुनिया पर क्या असर डाला!
मुद्रण क्रांति क्या थी?
छापेखाने के आने से किताब की हर प्रति के उत्पादन में लगने वाला वक्त और श्रम बहुत कम हो गया। इससे किताबों की कीमत काफी गिर गई और बाज़ार किताबों से पट गया। हाथ की छपाई की जगह मशीनों द्वारा बहुत बड़ी मात्रा में किताबों का छपना और विचारों का तेज़ी से फैलना ही इतिहास में ‘मुद्रण क्रांति’ कहलाता है।
नया पाठक वर्ग कैसे तैयार हुआ?
किताबें सस्ती होने के कारण समाज के व्यापक तबकों (आम लोगों) तक पहुँचने लगीं, जिससे एक नया ‘पाठक वर्ग’ पैदा हुआ। लेकिन यूरोप में उस समय साक्षरता दर बहुत कम थी और ज़्यादातर लोग पढ़ नहीं सकते थे।
ऐसे में प्रकाशकों ने एक नई तरकीब निकाली। उन्होंने लोकगीत और लोककथाएँ (गाथा-गीत) छापनी शुरू कर दीं, जिनमें बहुत सारी तसवीरें होती थीं। इन किताबों को सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में बोलकर पढ़ा जाता था, और अनपढ़ लोग इन्हें सुनकर आनंद लेते थे। इस तरह छपाई के आने से ‘मौखिक संस्कृति’ और ‘मुद्रित संस्कृति’ एक-दूसरे में घुल-मिल गईं। श्रोता और पाठक वर्ग एक हो गए।
मुद्रण का डर और धार्मिक विवाद
हर कोई मुद्रित किताबों से खुश नहीं था। धर्मगुरुओं, सम्राटों और कई लेखकों को इस बात का डर था कि अगर छपे हुए विचारों पर कोई नियंत्रण नहीं रखा गया, तो लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। उन्हें लगता था कि इससे सत्ता और धर्म दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।
मार्टिन लूथर और धर्म सुधार
1517 ईस्वी में धर्म-सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी ‘पिच्चानवे स्थापनाएँ’ (95 Theses) लिखीं। इसकी एक छपी हुई प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँग दी गई।
छापेखाने की मदद से लूथर के विचार बहुत तेज़ी से पूरे यूरोप में फैल गए। इसके नतीजे में चर्च में विभाजन हो गया और ‘प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार’ आंदोलन की शुरुआत हुई। प्रिंट की ताकत को देखकर मार्टिन लूथर ने कहा था—“मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।”
मुद्रण और प्रतिरोध की कहानी
छपे हुए साहित्य के बल पर कम पढ़े-लिखे लोग भी धर्म की अपनी अलग व्याख्या करने लगे थे। सोलहवीं सदी की इटली में मेनोकियो नाम का एक साधारण किसान था। उसने अपने इलाके में उपलब्ध किताबों को पढ़कर बाइबल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए और ईश्वर के बारे में ऐसे विचार बनाए जिससे रोमन कैथोलिक चर्च क्रुद्ध हो गया।
ऐसे धर्म-विरोधी विचारों को कुचलने के लिए रोमन चर्च ने ‘इन्क्वीज़ीशन’ (धर्म-अदालत) का सहारा लिया। मेनोकियो को दो बार पकड़ा गया और अंततः उसे मौत की सज़ा दे दी गई। इससे परेशान होकर चर्च ने 1558 ईस्वी से प्रकाशकों पर पाबंदियाँ लगा दीं और ‘प्रतिबंधित किताबों की सूची’ रखनी शुरू कर दी।
अब खेलें: मुद्रण क्रांति और उसका असर क्विज़
अब नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और पाठक वर्ग, मार्टिन लूथर, प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार और मेनोकियो की कहानी पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण इतिहास प्रश्नों का अभ्यास करें!
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अध्याय 5 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: शुरुआती छपी किताबें: चीन, जापान और कोरिया की कहानी
- भाग 2: यूरोप में मुद्रण का आना और गुटेन्बर्ग प्रेस
- You are Reading Here: मुद्रण क्रांति और उसका असर: पाठक वर्ग और धार्मिक विवाद
- भाग 4: भारत में मुद्रण का संसार और शुरुआती छपाई
- भाग 5: भारत में प्रेस, महिलाएँ, गरीब जनता और सेंसरशिप