पिछले भाग में हमने जाना था कि सिल्क मार्ग और भोजन की यात्रा ने प्राचीन दुनिया को कैसे जोड़ा था और कोलंबस की खोज ने दुनिया कैसे बदल दी।
आज हम बात करेंगे उन्नीसवीं सदी (1815-1914) की। इस सदी में दुनिया बहुत तेज़ी से बदली। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में मुख्य रूप से तीन तरह के ‘प्रवाह’ (Flows) हुए: पहला व्यापार का प्रवाह, दूसरा श्रम का प्रवाह (काम की तलाश में लोगों का जाना) और तीसरा पूँजी का प्रवाह (दूर के इलाकों में निवेश)। आइए जानते हैं कि इन तीनों प्रवाहों ने विश्व अर्थव्यवस्था को कैसे आकार दिया!
विश्व अर्थव्यवस्था का निर्माण कैसे हुआ?
इस बदलाव को समझने के लिए हमें ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को देखना होगा। अठारहवीं सदी के अंत में ब्रिटेन की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी, जिससे वहाँ भोजन की माँग बढ़ गई। ज़मींदारों के दबाव में सरकार ने मक्का (Corn) के आयात पर पाबंदी लगा दी थी। जिन कानूनों के तहत यह पाबंदी लगाई गई, उन्हें ‘कॉर्न लॉ’ (Corn Laws) कहा जाता था।
लेकिन खाने-पीने की चीज़ों की आसमान छूती कीमतों से परेशान होकर उद्योगपतियों और शहर के लोगों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह ‘कॉर्न लॉ’ को फौरन समाप्त कर दे। कॉर्न लॉ हटने के बाद ब्रिटेन में आयातित भोजन बहुत सस्ता हो गया। ब्रिटेन का पेट भरने के लिए पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में लाखों हेक्टेयर ज़मीनें साफ़ की गईं और खेती की जाने लगी। इस तरह एक ‘विश्व अर्थव्यवस्था’ का निर्माण हुआ।
तकनीक ने दुनिया को कैसे बदला?
रेलवे, भाप के जहाज़ और टेलीग्राफ—ये कुछ ऐसी महत्वपूर्ण तकनीकी खोजें थीं जिनके बिना उन्नीसवीं सदी के बदलावों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। तकनीक का सबसे अच्छा उदाहरण मांस (Meat) का व्यापार है।
1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप को ज़िंदा जानवर भेजे जाते थे, जो जगह बहुत घेरते थे और रास्ते में मर जाते थे या बीमार हो जाते थे। इसलिए यूरोप के गरीबों के लिए मांस एक बहुत महँगी चीज़ थी। लेकिन जब पानी के जहाज़ों में रेफ्रिजरेशन (Refrigeration) की तकनीक आई, तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूज़ीलैंड से जानवरों की बजाय उनका मांस (काटकर) भेजा जाने लगा। इससे सफर का खर्च कम हुआ और यूरोप के गरीबों को सस्ता मांस खाने को मिलने लगा।
उन्नीसवीं सदी के अंत में साम्राज्यवाद क्या था?
उन्नीसवीं सदी में व्यापार बढ़ने से यूरोप के देश तो अमीर हो रहे थे, लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा। यूरोप की ताकतों ने अपनी ताकत का इस्तेमाल दूसरे देशों को गुलाम बनाने (साम्राज्यवाद) के लिए किया।
इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण अफ्रीका है। अगर आप अफ्रीका का नक्शा देखें, तो कई देशों की सीमाएँ बिल्कुल सीधी लाइन जैसी दिखती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि 1885 में यूरोप के ताकतवर देश बर्लिन (Berlin) में इकट्ठा हुए और उन्होंने अफ्रीका के नक्शे पर लकीरें खींचकर उसे आपस में बाँट लिया!
रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग) ने अफ्रीका को कैसे बर्बाद किया?
उन्नीसवीं सदी के अंत में अफ्रीका में ज़मीन और जानवरों की कोई कमी नहीं थी, और वहाँ के लोग पैसों के लिए मज़दूरी नहीं करते थे। यूरोपीय लोग अफ्रीका में खदानों और बागानों में काम करने आए, लेकिन उन्हें मज़दूर नहीं मिल रहे थे।
तभी 1880 के दशक के अंत में अफ्रीका में रिंडरपेस्ट (Rinderpest) नाम की जानवरों की एक भयंकर बीमारी फैल गई। यह बीमारी ब्रिटिश आधिपत्य वाले एशियाई देशों से आए जानवरों के जरिए आई थी। इस बीमारी ने अफ्रीका के 90 प्रतिशत मवेशियों (जानवरों) को मार डाला।
जानवरों के खत्म होने से अफ्रीकियों की आजीविका तबाह हो गई। जो बचे-खुचे जानवर थे, उन पर यूरोपीय बागान मालिकों और खदान मालिकों ने कब्ज़ा कर लिया। मजबूर होकर अफ्रीकी लोगों को खदानों और बागानों में मज़दूरी करने के लिए विवश होना पड़ा। इस तरह केवल एक बीमारी ने यूरोपियों को पूरा अफ्रीका जीतने में मदद कर दी!
अब खेलें: उन्नीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था क्विज़
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अध्याय 3 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: आधुनिक युग से पहले: सिल्क मार्ग, भोजन की यात्रा और बीमारियाँ
- You are Reading Here: उन्नीसवीं शताब्दी: विश्व अर्थव्यवस्था, तकनीक और रिंडरपेस्ट
- भाग 3: भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना और वैश्विक व्यापार
- भाग 4: महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था: महामंदी और उसका प्रभाव
- भाग 5: विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: ब्रेटन वुड्स और वैश्वीकरण