औद्योगीकरण का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियाँ, चिमनियाँ और मशीनें आने लगती हैं। हमें लगता है कि दुनिया में कपड़े और अन्य सामान मशीनों के आने के बाद ही बनने शुरू हुए। लेकिन क्या कारखानों के खुलने से पहले दुनिया में कोई सामान नहीं बनता था? बिल्कुल बनता था! आइए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं कि मशीनों के आने से पहले का युग कैसा था और कारखानों की शुरुआत कैसे हुई।
नयी सदी का उदय और दो जादूगर
सन् 1900 में ‘ई.टी. पॉल’ नामक एक म्यूज़िक कंपनी ने संगीत की एक किताब छापी थी। इसकी जिल्द पर एक तस्वीर थी जिसका नाम था—‘नयी सदी का उदय’ (Dawn of the Century)। इस तस्वीर में एक देवी (प्रगति का फ़रिश्ता) है जिसके पीछे रेलवे, कैमरा, मशीनें और कारखाने तैर रहे हैं। यह मशीन और तकनीक का महिमामंडन था।
इसी तरह एक और व्यापारिक पत्रिका में ‘दो जादूगरों’ की तस्वीर छपी थी। ऊपर वाले हिस्से में प्राच्य (एशियाई) इलाके का ‘अलादीन’ है जो अपने चिराग से एक भव्य महल बना रहा है। नीचे एक आधुनिक मैकेनिक है जो अपने नए औज़ारों से पुल, पानी के जहाज़, टॉवर और गगनचुंबी इमारतें बना रहा है। अलादीन अतीत का प्रतीक था और मैकेनिक आधुनिकता का!
पूर्व औद्योगीकरण क्या था?
फैक्ट्रियों (कारखानों) के खुलने से बहुत पहले ही इंग्लैंड और यूरोप में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा था। इतिहासकार औद्योगीकरण के इस शुरुआती चरण को ‘पूर्व-औद्योगीकरण’ कहते हैं।
इस व्यवस्था में शहर के व्यापारी गाँवों में जाते थे। वे किसानों और कारीगरों को पैसा (पेशगी) देकर उनसे माल (जैसे कपड़े) बनवाते थे। दरअसल, शहरों में ‘गिल्ड्स’ (व्यापारिक संघ) बहुत ताकतवर थे और वे नए व्यापारियों को शहर में काम नहीं करने देते थे। इसलिए व्यापारियों को गाँवों का रुख करना पड़ा। गाँवों में गरीब किसान अपनी छोटी ज़मीनों से गुज़ारा नहीं कर पा रहे थे, इसलिए वे खुशी-खुशी व्यापारियों के लिए अपने घरों में ही काम करने लगे। इस तरह शहर और गाँव के बीच एक गहरा रिश्ता बन गया।
कारखानों का उदय कैसे हुआ?
इंग्लैंड में सबसे पहले कारखाने 1730 के दशक में खुले, लेकिन उनकी संख्या अठारहवीं सदी के आखिर में जाकर तेज़ी से बढ़ी। औद्योगिक क्रांति का सबसे पहला प्रतीक ‘कपास’ (सूती कपड़ा) था।
रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा तैयार की। अब तक कपड़ा गाँवों के घरों में बनता था, लेकिन अब महँगी नई मशीनें खरीदकर कारखानों में लगाई जाने लगीं। कारखाने में सारी प्रक्रियाएँ (कताई, बुनाई, लपेटना) एक ही छत के नीचे और एक ही मालिक के हाथों में आ गईं। इससे उत्पादन तेज़ हुआ और गुणवत्ता भी सुधरी।
औद्योगिक परिवर्तन की रफ़्तार कैसी थी?
औद्योगीकरण बहुत तेज़ी से तो हुआ, लेकिन इसने पारंपरिक उद्योगों को रातों-रात खत्म नहीं किया। इसके प्रमुख कारण इस प्रकार थे:
- सूती उद्योग और धातु (लोहा और स्टील) उद्योग ही सबसे तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे। रेलवे के प्रसार के कारण 1840 के दशक से लोहे और स्टील की माँग तेज़ी से बढ़ी।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी केवल 20 प्रतिशत मज़दूर ही तकनीकी रूप से विकसित कारखानों में काम करते थे। बाकी लोग अब भी पारंपरिक काम कर रहे थे।
- मशीनों को लेकर डर: नई तकनीक बहुत महँगी थी और उद्योगपति इनका इस्तेमाल करने से डरते थे। मशीनें अक्सर खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर भारी खर्च आता था।
वाष्प इंजन का उदाहरण: जेम्स वाट ने ‘न्यूकॉमेन’ द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किया और 1781 में उसे पेटेंट करा लिया। उनके उद्योगपति मित्र मैथ्यू बोल्टन ने नए इंजन बनाए। लेकिन सालों तक इन इंजनों को खरीदने वाला कोई नहीं मिला! इससे पता चलता है कि नई तकनीक को अपनाने में समाज बहुत संकोच कर रहा था।
अब खेलें: पूर्व-औद्योगीकरण और कारखाने क्विज़
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अध्याय 4 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- You are Reading Here: पूर्व-औद्योगीकरण और कारखानों का उदय
- भाग 2: हाथ का श्रम, वाष्प शक्ति और मज़दूरों का जीवन
- भाग 3: भारतीय कपड़े का युग और गुमाश्तों की भूमिका
- भाग 4: भारत में शुरुआती कारखाने और उद्यमी
- भाग 5: औद्योगिक विकास की विशेषताएँ और वस्तुओं का विज्ञापन