पिछले भाग में हमने जाना था कि उन्नीसवीं सदी में हाथ का श्रम मशीनों से कैसे टकरा रहा था और मज़दूरों का जीवन कितना कठिन था।
अब हम यूरोप से निकलकर अपने देश ‘भारत’ की तरफ चलते हैं। कारखानों और मशीनों के आने से पहले पूरी दुनिया में भारत के सूती और रेशमी कपड़ों का डंका बजता था। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि भारत के बुनकर भुखमरी के कगार पर आ गए? आइए जानते हैं भारतीय कपड़े के सुनहरे युग और अंग्रेज़ों के क्रूर ‘गुमाश्तों’ की कहानी!
मशीनी युग से पहले भारतीय कपड़े का व्यापार
मशीन उद्योगों के युग से पहले, अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के सूती और रेशमी कपड़ों का ही दबदबा था। दुनिया के कई देशों में मोटा कपास पैदा होता था, लेकिन सबसे ‘महीन’ (बारीक और उच्च गुणवत्ता वाला) कपास केवल भारत में ही पैदा होता था।
आर्मेनियाई और फ़ारसी व्यापारी पंजाब से अफ़गानिस्तान और फ़ारस तक भारत का माल ले जाते थे। समुद्री रास्ते से भी बहुत बड़ा व्यापार चलता था। गुजरात के सूरत बंदरगाह से भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा था। कोरोमंडल तट पर मसूलीपट्टनम और बंगाल में हुगली के माध्यम से दक्षिण-पूर्वी एशियाई बंदरगाहों के साथ व्यापार होता था। इस व्यापार पर पूरी तरह से भारतीय व्यापारियों और बैंकरों का नियंत्रण था।
पुराने बंदरगाहों का पतन कैसे हुआ?
1750 के दशक तक भारतीय व्यापारियों के नियंत्रण वाला यह पुराना नेटवर्क टूटने लगा था। यूरोपीय कंपनियों (जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी) ने स्थानीय दरबारों से कई तरह की रियायतें और एकाधिकार (Monopoly) प्राप्त कर लिए थे।
इसके कारण सूरत और हुगली जैसे पुराने बंदरगाह कमज़ोर पड़ गए, जहाँ से स्थानीय व्यापारी काम करते थे। इन बंदरगाहों से होने वाला निर्यात तेज़ी से गिर गया। पुराने बंदरगाहों की जगह अब बंबई (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) के नए बंदरगाहों का विकास होने लगा, जिन पर पूरी तरह से यूरोपीय कंपनियों का कब्ज़ा था।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने बुनकरों पर नियंत्रण कैसे किया?
जब ईस्ट इंडिया कंपनी के पास राजनीतिक सत्ता आ गई, तो उसने कपड़े के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करने का फैसला किया। कंपनी चाहती थी कि भारत का सारा अच्छा कपड़ा केवल उसी को मिले। इसके लिए उसने दो बड़े कदम उठाए:
- कंपनी ने कपड़ा व्यापार में लगे पुराने व्यापारियों और दलालों को खत्म कर दिया।
- बुनकरों पर सीधा नियंत्रण रखने के लिए कंपनी ने वेतनभोगी (Salary पाने वाले) कर्मचारी तैनात कर दिए, जिन्हें ‘गुमाश्ता’ (Gomastha) कहा जाता था।
गुमाश्ता कौन थे और उनका काम क्या था?
गुमाश्ता कंपनी के नौकर थे। उनका मुख्य काम बुनकरों की निगरानी करना, उनसे माल इकट्ठा करना और कपड़े की गुणवत्ता (Quality) की जाँच करना था।
बुनकरों को किसी और व्यापारी को अपना माल बेचने से रोकने के लिए कंपनी ने ‘पेशगी की प्रणाली’ (System of Advances) शुरू की। इसमें बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए पहले ही कर्ज़ा (Loan) दे दिया जाता था। जो बुनकर यह कर्ज़ा ले लेता था, उसे अपना बनाया हुआ कपड़ा सिर्फ और सिर्फ गुमाश्ते को ही देना पड़ता था। वे अपना कपड़ा बाज़ार में किसी और को नहीं बेच सकते थे।
बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव क्यों हुआ?
पहले जो व्यापारी माल खरीदते थे, वे गाँवों में ही रहते थे और उनका बुनकरों के साथ बहुत अच्छा और करीबी रिश्ता होता था। वे संकट के समय बुनकरों की मदद भी करते थे।
लेकिन गुमाश्ते ‘बाहरी’ लोग थे। उनका गाँवों से कोई पुराना सामाजिक रिश्ता नहीं था। वे बहुत घमंडी थे और अकड़ कर चलते थे। वे अक्सर सिपाहियों और चपरासियों के साथ गाँवों में आते थे और अगर कपड़ा तैयार होने में देरी हो जाती, तो वे बुनकरों को बुरी तरह पीटते थे और कोड़े मारते थे। अब बुनकर मोल-भाव नहीं कर सकते थे और उन्हें कंपनी से बहुत कम पैसे मिलते थे।
इस अत्याचार से तंग आकर कर्नाटक और बंगाल में बहुत सारे बुनकर अपने गाँव छोड़कर भाग गए। कई बुनकरों ने कंपनी का कर्ज़ा लेने से साफ इनकार कर दिया, अपने करघे (Looms) बंद कर दिए और वापस खेती करने लगे। इस तरह भारतीय कपड़े का एक शानदार युग दर्दनाक तरीके से खत्म होने लगा।
अब खेलें: भारतीय कपड़ा और गुमाश्ते क्विज़
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अध्याय 4 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: पूर्व-औद्योगीकरण और कारखानों का उदय
- भाग 2: हाथ का श्रम, वाष्प शक्ति और मज़दूरों का जीवन
- You are Reading Here: भारतीय कपड़े का युग और गुमाश्तों की भूमिका
- भाग 4: भारत में शुरुआती कारखाने और उद्यमी
- भाग 5: औद्योगिक विकास की विशेषताएँ और वस्तुओं का विज्ञापन