आज हम जानेंगे कि 18वीं सदी का यूरोप कैसा था। क्या वहाँ आज की तरह जर्मनी या इटली जैसे देश थे? बिल्कुल नहीं! पूरा यूरोप राजाओं की जागीरों और छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। तो फिर लोगों के मन में ‘हम एक राष्ट्र हैं’ यह विचार कैसे आया? आइए, कुलीन वर्ग, नए मध्यवर्ग और उदारवादी राष्ट्रवाद की इस कहानी को गहराई से समझते हैं!
18वीं सदी के मध्य में यूरोप का समाज कैसा था?
अगर आप मध्य अठारहवीं सदी के यूरोप के नक्शे को देखें, तो उसमें वैसे ‘राष्ट्र-राज्य’ नहीं मिलेंगे जैसे कि आज हैं। जिन्हें आज हम जर्मनी, इटली और स्विट्ज़रलैंड के रूप में जानते हैं, वे तब राजशाहियों, डचियों और कैंटनों में बँटे हुए थे, जिनके शासकों के अपने स्वायत्त क्षेत्र थे।
पूर्वी और मध्य यूरोप निरंकुश राजतंत्रों के अधीन थे और इन इलाकों में तरह-तरह के लोग रहते थे। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रिया-हंगरी पर शासन करने वाला हैब्सबर्ग साम्राज्य कई अलग-अलग क्षेत्रों और जनसमूहों को जोड़कर बना था। इन अलग-अलग समूहों को आपस में बाँधने वाला तत्व केवल सम्राट के प्रति सबकी निष्ठा थी!
कुलीन वर्ग और कृषक वर्ग क्या थे?
- कुलीन वर्ग (अमीर ज़मींदार): सामाजिक और राजनीतिक रूप से ज़मीन का मालिक कुलीन वर्ग यूरोपीय महाद्वीप का सबसे शक्तिशाली वर्ग था। वे ग्रामीण इलाकों में जायदाद के मालिक थे और राजनीतिक कार्यों के लिए फ्रेंच भाषा का प्रयोग करते थे। हालाँकि, यह शक्तिशाली वर्ग संख्या के लिहाज़ से एक छोटा समूह था।
- कृषक वर्ग (किसान): यूरोप की अधिकांश जनसंख्या कृषक थी। पश्चिम में ज़्यादातर ज़मीन पर किराएदार और छोटे काश्तकार खेती करते थे, जबकि पूर्वी और मध्य यूरोप में भूमि विशाल जागीरों में बँटी थी जिस पर ‘भूदास’ खेती करते थे।
नया मध्यवर्ग कैसे उभरा?
औद्योगीकरण (Industrialization) की शुरुआत इंग्लैंड में 18वीं सदी के दूसरे भाग में हुई, लेकिन फ्रांस और जर्मनी के राज्यों में यह 19वीं शताब्दी के दौरान हुआ। औद्योगिक उत्पादन और व्यापार में वृद्धि से शहरों का विकास हुआ और वाणिज्यिक वर्गों का उदय हुआ।
श्रमिक वर्ग के साथ-साथ एक नया मध्यवर्ग अस्तित्व में आया, जो उद्योगपतियों, व्यापारियों और सेवा क्षेत्र के लोगों से बना था। कुलीन विशेषाधिकारों की समाप्ति के बाद, इसी शिक्षित और उदारवादी मध्यवर्ग के बीच राष्ट्रीय एकता के विचार लोकप्रिय हुए!
उदारवादी राष्ट्रवाद के क्या मायने थे?
यूरोप में उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में राष्ट्रीय एकता के विचार ‘उदारवाद’ से करीब से जुड़े थे। उदारवाद (Liberalism) शब्द लातिन भाषा के मूल ‘liber’ पर आधारित है, जिसका अर्थ है ‘आज़ाद’。
- राजनीतिक रूप से: नए मध्य वर्गों के लिए उदारवाद का मतलब था व्यक्ति के लिए आज़ादी और कानून के समक्ष सबकी बराबरी। यह एक ऐसी सरकार पर ज़ोर देता था जो सहमति से बनी हो।
- आर्थिक रूप से: उदारवाद बाजारों की मुक्ति और चीज़ों तथा पूँजी के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को खत्म करने के पक्ष में था।
जॉलवेराइन शुल्क संघ क्या था?
नेपोलियन के प्रशासनिक कदमों से 39 जर्मन राज्यों का एक महासंघ बना था, जिनमें से प्रत्येक की अपनी मुद्रा और नाप-तौल प्रणाली थी। इससे व्यापारियों को बहुत परेशानी होती थी और आर्थिक विनिमय में बाधा आती थी।
इस समस्या को दूर करने के लिए, 1834 में प्रशा (Prussia) की पहल पर ‘जॉलवेराइन’ (Zollverein) नामक एक शुल्क संघ स्थापित किया गया।
- इस संघ ने अधिकांश जर्मन राज्यों के बीच शुल्क अवरोधों (टैक्स) को समाप्त कर दिया।
- मुद्राओं की संख्या दो कर दी गई जो उससे पहले तीस से ऊपर थी।
- रेलवे के जाल ने गतिशीलता बढ़ाई और आर्थिक हितों को राष्ट्रीय एकीकरण का सहायक बनाया। इस आर्थिक राष्ट्रवाद की लहर ने राष्ट्रवादी भावनाओं को मज़बूत बनाया।
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: फ्रेडरिक सॉरयू का कल्पनादर्श और फ्रांसीसी क्रांति
- You are Reading Here: यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण और नया मध्यवर्ग
- भाग 3: 1815 के बाद नया रूढ़िवाद और क्रांतिकारी
- भाग 4: क्रांतियों का युग (1830-1848) और रूमानी कल्पना
- भाग 5: जर्मनी और इटली का एकीकरण
- भाग 6: राष्ट्र की दृश्य-कल्पना और साम्राज्यवाद