पिछले भागों में हमने देखा कि कैसे क्रांतियों और युद्धों के जरिए जर्मनी और इटली जैसे नए राष्ट्रों का निर्माण हुआ।
लेकिन ज़रा सोचिए, किसी राजा का चित्र बनाना तो आसान है, पर एक ‘राष्ट्र’ (देश) का चेहरा कैसा होता है? लोगों के दिलों में अपने देश के प्रति एक चेहरा या छवि बसाने के लिए कलाकारों ने एक अनूठा तरीका निकाला। आज के इस अंतिम भाग में हम ‘राष्ट्र के रूपक’ और उस ‘बाल्कन संकट’ के बारे में जानेंगे जिसने पूरी दुनिया को प्रथम विश्व युद्ध की आग में धकेल दिया!
राष्ट्र की दृश्य-कल्पना (Visualising the Nation) कैसे की गई?
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में कलाकारों ने राष्ट्र का मानवीकरण (Personification) किया। इसका मतलब है कि उन्होंने देश को एक जीते-जागते इंसान के रूप में दर्शाया। राष्ट्रों को प्रायः नारी भेष (Female figure) में प्रस्तुत किया जाता था।
यह नारी कोई असल जीवन की महिला नहीं थी, बल्कि यह राष्ट्र के अमूर्त विचार को एक ठोस रूप देने का प्रयास था। इस प्रकार, नारी की छवि राष्ट्र का रूपक (Allegory) बन गई। जैसे फ्रांसीसी क्रांति के दौरान कलाकारों ने ‘स्वतंत्रता, न्याय और गणतंत्र’ जैसे विचारों को दर्शाने के लिए नारी रूपकों का इस्तेमाल किया था (जैसे- लाल टोपी या टूटी हुई जंजीर)।
फ्रांस और जर्मनी के नारी रूपक क्या थे?
- फ्रांस (मारीआन): फ्रांस में राष्ट्र के नारी रूपक को ‘मारीआन’ (Marianne) नाम दिया गया, जो एक लोकप्रिय ईसाई नाम है। इसके चिह्न भी स्वतंत्रता और गणतंत्र के थे—लाल टोपी, तिरंगा और कलगी। मारीआन की प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौराहों पर लगाई गईं ताकि लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना बनी रहे।
- जर्मनी (जर्मेनिया): जर्मन राष्ट्र की रूपक ‘जर्मेनिया’ (Germania) बनी। चित्रों में जर्मेनिया बलूत (Oak) के पत्तों का मुकुट पहनती है, क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है। उसके हाथ में तलवार होती है जो देश की रक्षा का प्रतीक है।
राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद में कैसे बदल गया?
उन्नीसवीं सदी की अंतिम चौथाई (1871 के बाद) तक आते-आते राष्ट्रवाद का वह आदर्शवादी और उदारवादी स्वरूप नहीं रहा जो सदी के पूर्वार्ध में था। अब राष्ट्रवाद संकीर्ण (छोटे) लक्ष्यों वाला बन गया।
यूरोप के प्रमुख देश एक-दूसरे के प्रति बहुत ईर्ष्यालु हो गए थे और हर देश अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। बड़ी शक्तियों ने यूरोप में अपनी साम्राज्यवादी (Imperialist) ताक़त बढ़ाने के लिए लोगों की राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
बाल्कन संकट क्या था?
1871 के बाद यूरोप में गंभीर राष्ट्रवादी तनाव का सबसे प्रमुख क्षेत्र ‘बाल्कन’ (Balkans) था। इस क्षेत्र में आज के रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्बानिया, यूनान, क्रोएशिया और सर्बिया आदि शामिल थे। यहाँ के निवासियों को आमतौर पर स्लाव (Slavs) पुकारा जाता था।
- बाल्कन का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) के नियंत्रण में था।
- जैसे-जैसे ऑटोमन साम्राज्य कमजोर होता गया, वैसे-वैसे बाल्कन के अलग-अलग स्लाव राष्ट्र अपनी आज़ादी की घोषणा करने लगे।
- स्थिति तब और भयंकर हो गई जब रूस, जर्मनी, इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया-हंगरी जैसी बड़ी यूरोपीय शक्तियाँ इस इलाके में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करने लगीं।
प्रथम विश्व युद्ध (1914) की शुरुआत
बड़ी शक्तियों के बीच बाल्कन क्षेत्र पर कब्ज़ा करने, व्यापार बढ़ाने और नौसैनिक ताकत बढ़ाने की जो ज़बरदस्त होड़ (प्रतिस्पर्धा) थी, उसने बाल्कन समस्या को बहुत उलझा दिया। इसके कारण इस इलाके में एक के बाद एक कई युद्ध हुए और अंततः इसी संकट के कारण 1914 में प्रथम विश्व युद्ध (First World War) शुरू हो गया। साम्राज्यवाद से जुड़ा यह राष्ट्रवाद यूरोप को महाविनाश की ओर ले गया।
अब खेलें: रूपक और साम्राज्यवाद क्विज़
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: फ्रेडरिक सॉरयू का कल्पनादर्श और फ्रांसीसी क्रांति
- भाग 2: यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण और नया मध्यवर्ग
- भाग 3: 1815 के बाद नया रूढ़िवाद और क्रांतिकारी
- भाग 4: क्रांतियों का युग (1830-1848) और रूमानी कल्पना
- भाग 5: जर्मनी और इटली का एकीकरण
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