कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने उन्नीसवीं सदी की विश्व अर्थव्यवस्था और रिंडरपेस्ट जैसी बीमारी के बारे में जाना था।
उन्नीसवीं सदी में दुनिया बदल रही थी। जहाँ एक तरफ अमीर देशों का व्यापार बढ़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ गरीब देशों के लोगों का शोषण भी हो रहा था। आज के इस भाग में हम भारत से गए उन लाखों मज़दूरों की कहानी पढ़ेंगे जिन्हें झूठे वादे करके विदेशों में काम करने के लिए ले जाया गया। इसके साथ ही हम जानेंगे कि ब्रिटेन ने भारतीय व्यापार का कैसे फायदा उठाया!
अनुबंधित श्रमिक कौन थे और वे क्यों गए?
उन्नीसवीं सदी में भारत और चीन से लाखों मज़दूरों को खदानों, बागानों और सड़क निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए दूर-दराज के देशों में ले जाया गया। भारत में इन मज़दूरों को एक ‘अनुबंध’ (समझौते) के तहत ले जाया जाता था, इसलिए इन्हें अनुबंधित श्रमिक कहा गया। मज़दूर इस अनुबंध (Agreement) को अपनी भाषा में ‘गिरमिट’ कहने लगे थे, इसलिए इन मज़दूरों को ‘गिरमिटिया मज़दूर’ के नाम से जाना जाने लगा।
ज़्यादातर गिरमिटिया मज़दूर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाकों से आते थे। कुटीर उद्योगों के पतन, ज़मीन का किराया बढ़ने और खदानों के लिए ज़मीन छिन जाने के कारण ये लोग भारी गरीबी में थे। इन मज़दूरों को मुख्य रूप से कैरेबियाई द्वीपों (त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम), मॉरीशस और फीजी ले जाया जाता था। बहुत से मज़दूर असम के चाय बागानों में भी काम करने गए थे।
नयी दास प्रथा और उनका जीवन कैसा था?
एजेंट मज़दूरों को झूठी जानकारी देते थे कि उन्हें कहाँ जाना है और क्या काम करना है। जब मज़दूर अपने गंतव्य (मालिक के बागान) पर पहुँचते, तो उन्हें पता चलता था कि रहने और काम करने की स्थितियाँ बहुत कठोर और भयानक हैं। उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं थे। अगर कोई मज़दूर भागने की कोशिश करता और पकड़ा जाता, तो उसे कड़ी सजा मिलती थी। इस व्यवस्था के कारण ही उन्नीसवीं सदी की इस अनुबंध व्यवस्था को ‘नयी दास-प्रथा’ कहा गया।
संस्कृति का मिलन कैसे हुआ?
कठोर परिस्थितियों के बावजूद, मज़दूरों ने ज़िंदा रहने और अपनी पहचान बचाने के नए तरीके ढूँढ निकाले। अलग-अलग जगहों से आए मज़दूरों ने अपनी पुरानी संस्कृति को नई जगह की संस्कृति में मिला दिया:
- होसे: त्रिनिदाद में ‘मुहर्रम’ के वार्षिक जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले का रूप दे दिया गया, जिसे ‘होसे’ (इमाम हुसैन के नाम पर) कहा जाने लगा। इसमें सभी धर्मों के मज़दूर हिस्सा लेते थे।
- रास्ताफ़ारियानवाद: कैरेबियाई द्वीपों का विद्रोही धर्म ‘रास्ताफ़ारियानवाद’ भी भारतीय प्रवासियों और कैरेबियाई संस्कृति के मिलन का ही एक रूप था।
- चटनी म्यूज़िक: त्रिनिदाद और गुयाना में बहुत मशहूर हुआ ‘चटनी म्यूज़िक’ भारतीय प्रवासियों द्वारा पैदा की गई एक नई सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थी।
विदेश में भारतीय उद्यमी कौन थे?
केवल मज़दूर ही विदेश नहीं गए, बल्कि कुछ भारतीय बैंकर और व्यापारी भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुँचे। शिकारपुरी श्रॉफ और नट्टुकोट्टई चेट्टियार ऐसे ही बैंकर थे जो मध्य और दक्षिण-पूर्वी एशिया में निर्यात खेती के लिए कर्ज़ा देते थे। वे यूरोपीय उपनिवेशों के पीछे-पीछे अफ्रीका तक जा पहुँचे। हैदराबादी सिंधी व्यापारियों ने तो दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े एम्पोरियम (दुकानें) खोल लिए थे।
भारतीय व्यापार और उपनिवेशवाद का क्या प्रभाव पड़ा?
ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद, वहाँ के कारखानों में बना सूती कपड़ा भारी मात्रा में भारत आने लगा। इसके कारण भारत के बारीक सूती कपड़े का निर्यात तेज़ी से गिरने लगा। 1800 में भारत के निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 30% था, जो 1870 के दशक तक घटकर मात्र 3% रह गया।
इसके विपरीत, भारत से कच्ची कपास और अफ़ीम (जिसे चीन भेजा जाता था) का निर्यात बहुत तेज़ी से बढ़ा।
ब्रिटेन, भारत को बहुत सारा सामान बेचता था, लेकिन भारत से बहुत कम सामान खरीदता था। इससे ब्रिटेन को भारत के साथ हमेशा ‘व्यापार अधिशेष’ (मुनाफा) प्राप्त होता था। इस मुनाफे का इस्तेमाल ब्रिटेन अपने ‘देसी खर्चों’ (होम चार्जेज) को चुकाने के लिए करता था, जिसमें ब्रितानी अधिकारियों की पेंशन, सेना का खर्च और भारत पर लिए गए कर्ज़े का ब्याज शामिल था।
अब खेलें: अनुबंधित श्रमिक और व्यापार क्विज़
अब नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और गिरमिटिया मज़दूर, होसे, चटनी म्यूज़िक और भारतीय व्यापार पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण इतिहास प्रश्नों का अभ्यास करें!
Total Slides: 7
Total Questions: 19 | Total Marks: 27
Leaderboard (Last 30 Days)
अध्याय 3 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: आधुनिक युग से पहले: सिल्क मार्ग, भोजन की यात्रा और बीमारियाँ
- भाग 2: उन्नीसवीं शताब्दी: विश्व अर्थव्यवस्था, तकनीक और रिंडरपेस्ट
- You are Reading Here: भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना और वैश्विक व्यापार
- भाग 4: महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था: महामंदी और उसका प्रभाव
- भाग 5: विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: ब्रेटन वुड्स और वैश्वीकरण