पिछले भाग में हमने जाना था कि मुद्रण क्रांति ने यूरोप में कैसे तहलका मचाया और दुनिया को कैसे बदल दिया।
अब हम यूरोप से निकलकर अपने प्यारे देश ‘भारत’ की ओर चलते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि जब भारत में छपाई की मशीनें नहीं थीं, तब हमारे प्राचीन ग्रंथ और किताबें कैसे सुरक्षित रखे जाते थे? और भारत में सबसे पहले प्रिंटिंग प्रेस कौन लेकर आया? आइए भारत में मुद्रण के इस शानदार सफर को समझते हैं!
मुद्रण युग से पहले भारत में क्या था?
भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हाथ से लिखी पांडुलिपियों की एक बहुत पुरानी और समृद्ध परंपरा थी। ये पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज़ पर नक़ल करके बनाई जाती थीं। कई बार पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाई जाती थीं और उनकी उम्र बढ़ाने के लिए उन्हें तख्तियों की जिल्द में सिलकर बाँध दिया जाता था।
लेकिन इन पांडुलिपियों के साथ बड़ी समस्याएँ थीं। एक तो ये बहुत नाजुक और महँगी होती थीं, दूसरे, इनकी लिपियों के अलग-अलग तरीके से लिखे जाने के कारण इन्हें पढ़ना आसान नहीं था। इसलिए आम लोग इन्हें नहीं पढ़ पाते थे और इनका इस्तेमाल बहुत सीमित था। उस समय गाँव के गुरु अपनी याददाश्त से किताबें सुनाते थे और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे।
भारत में छपाई की शुरुआत कैसे हुई?
भारत में प्रिंटिंग प्रेस (छापाखाना) सबसे पहले सोलहवीं सदी के मध्य में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों (मिशनरियों) के साथ गोवा में आया था। जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी भाषा सीखी और कई सारी पुस्तिकाएँ छापीं।
- 1674 ईस्वी तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं।
- कैथोलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब छापी और 1713 में पहली मलयालम किताब छापी।
- डच प्रोटेस्टेंट धर्म प्रचारकों ने भी 32 तमिल किताबें छापीं।
जेम्स ऑगस्टस हिक्की और बंगाल गजट
भारत में अंग्रेज़ी भाषा का प्रेस काफी देर से विकसित हुआ। 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘बंगाल गजट’ नामक एक साप्ताहिक अंग्रेज़ी पत्रिका का संपादन शुरू किया। हिक्की की यह पत्रिका किसी भी औपनिवेशिक प्रभाव से आज़ाद थी।
हिक्की अपने अखबार में विज्ञापन तो छापता ही था, साथ ही वह भारत में काम कर रहे वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छापने लगा। इससे नाराज़ होकर गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने हिक्की पर मुक़दमा कर दिया। बाद में कुछ हिंदुस्तानियों ने भी अपने अखबार निकाले, जिनमें राजा राममोहन राय के करीबी गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित ‘बंगाल गज़ट’ पहला था।
धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में समाज में बहुत सारे बदलाव हो रहे थे। हिंदू रूढ़िवादियों और समाज-सुधारकों के बीच विधवा-दाह (सती प्रथा), एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों को लेकर तेज़ बहस ठनी हुई थी। छपाई के आने से ये बहसें सरेआम पब्लिक में होने लगीं।
राजा राममोहन राय ने 1821 से ‘संवाद कौमुदी’ नामक अखबार प्रकाशित किया। उनके विचारों का विरोध करने के लिए हिंदू रूढ़िवादियों ने ‘समाचार चंद्रिका’ का सहारा लिया। 1822 में ‘जाम-ए-जहाँ नामा’ और ‘शम्सुल अख़बार’ नाम के दो फारसी अखबार भी प्रकाशित हुए।
मुस्लिम और हिंदू धर्म ग्रंथों की छपाई
उत्तर भारत में मुस्लिम विद्वान (उलमा) इस बात से डरे हुए थे कि कहीं अंग्रेज़ मुस्लिम कानून न बदल डालें। इससे बचने के लिए 1867 में स्थापित ‘देवबंद सेमिनरी’ ने मुसलमान पाठकों को इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हज़ारों फतवे जारी किए और सस्ते धर्मग्रंथ छापे।
हिंदुओं के बीच भी छपाई ने ज़ोर पकड़ा। 1810 में कलकत्ता से तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ का पहला मुद्रित संस्करण प्रकाशित हुआ। बाद में लखनऊ के ‘नवल किशोर प्रेस’ और बंबई के ‘श्री वेंकटेश्वर प्रेस’ ने अनगिनत धार्मिक किताबें छापीं, जिन्हें लोग कहीं भी आसानी से ले जा सकते थे और अनपढ़ लोगों की भीड़ में बोलकर सुना सकते थे। प्रिंट ने पूरे भारत के लोगों को एक-दूसरे के विचारों से जोड़ने का काम किया।
अब खेलें: भारत में मुद्रण क्विज़
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अध्याय 5 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: शुरुआती छपी किताबें: चीन, जापान और कोरिया की कहानी
- भाग 2: यूरोप में मुद्रण का आना और गुटेन्बर्ग प्रेस
- भाग 3: मुद्रण क्रांति और उसका असर: पाठक वर्ग और धार्मिक विवाद
- You are Reading Here: भारत में मुद्रण का संसार और शुरुआती छपाई
- भाग 5: भारत में प्रेस, महिलाएँ, गरीब जनता और सेंसरशिप