पिछले भाग में हमने जाना था कि 1815 के बाद यूरोप के राजाओं ने रूढ़िवाद की वापसी की और क्रांतिकारियों पर जुल्म ढाए।
लेकिन आज़ादी की वह आग बुझी नहीं थी! जैसे-जैसे रूढ़िवादी व्यवस्थाओं ने अपनी ताकत मज़बूत करने की कोशिश की, वैसे-वैसे उदारवाद और राष्ट्रवाद ने भी ज़ोर पकड़ा। 1830 से 1848 के बीच यूरोप में क्रांतियों का एक ऐसा दौर आया जिसने कई साम्राज्यों की जड़ें हिला दीं। आइए जानते हैं जुलाई क्रांति, यूनान की आज़ादी और रूमानीवाद (Romanticism) के इस रोमांचक इतिहास के बारे में!
1830 की जुलाई क्रांति क्या थी और इसका क्या प्रभाव पड़ा?
क्रांति की पहली उथल-पुथल फ्रांस में जुलाई 1830 में हुई। जिन बूर्बो राजाओं को 1815 के बाद सत्ता में बहाल किया गया था, उन्हें उदारवादी क्रांतिकारियों ने उखाड़ फेंका। उनकी जगह एक संवैधानिक राजतंत्र (Constitutional Monarchy) स्थापित किया गया, जिसका मुखिया लुई फिलिप था।
फ्रांस की इस घटना का असर पूरे यूरोप पर पड़ा। ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटरनिख ने इसी घटना पर एक बहुत प्रसिद्ध बात कही थी: “जब फ्रांस छींकता है, तो बाकी यूरोप को सर्दी-जुकाम हो जाता है!” जुलाई क्रांति से प्रेरित होकर ब्रुसेल्स में भी विद्रोह भड़क गया, जिसके कारण बेल्जियम ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ द नीदरलैंड्स’ से अलग हो गया।
यूनान का स्वतंत्रता संग्राम कैसे सफल हुआ?
एक और घटना जिसने पूरे यूरोप के शिक्षित वर्ग में राष्ट्रीय भावनाएं जगाईं, वह थी—यूनान (Greece) का स्वतंत्रता संग्राम। पंद्रहवीं सदी से यूनान ‘ऑटोमन साम्राज्य’ (Ottoman Empire) का हिस्सा था।
- यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों के मन में भी आज़ादी की चाह जगी और 1821 में उन्होंने संघर्ष शुरू कर दिया।
- कवियों और कलाकारों ने यूनान को ‘यूरोपीय सभ्यता का पालना’ बताकर उसकी प्रशंसा की और एक मुस्लिम साम्राज्य के खिलाफ उसके संघर्ष के लिए लोगों का समर्थन जुटाया।
- अंततः 1832 की ‘कुस्तुनतुनिया की संधि’ (Treaty of Constantinople) ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी।
रूमानीवाद (Romanticism) क्या था और इसने राष्ट्रवाद को कैसे बढ़ाया?
राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और क्षेत्रीय विस्तार से नहीं हुआ। इसमें कला, काव्य, कहानियों और संगीत ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। रूमानीवाद एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन था जो एक खास तरह की राष्ट्रीय भावना का विकास करना चाहता था।
रूमानी कलाकारों ने तर्क-वितर्क और विज्ञान के महिमामंडन की आलोचना की। इसके बजाय उन्होंने भावनाओं (Emotions), अंतर्दृष्टि और रहस्यवादी भावनाओं पर ज़ोर दिया। जर्मन दार्शनिक योहान गॉटफ्रीड जैसे रूमानी चिंतकों का दावा था कि सच्ची जर्मन संस्कृति आम लोगों (दास फोल्क – Das volk) में निहित है। लोकगीत, जन-काव्य और लोक नृत्यों के माध्यम से ही राष्ट्र की सच्ची आत्मा प्रकट होती है।
भाषा ने राष्ट्रवाद के विकास में क्या भूमिका निभाई?
राष्ट्रीय भावना को जीवित रखने में भाषा ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पोलैंड (Poland) है। पोलैंड पर रूस ने कब्ज़ा कर लिया था और वहाँ रूसी भाषा थोप दी गई थी।
इसके विरोध में पोलिश लोगों ने अपनी ‘पोलिश’ भाषा को हथियार बनाया। चर्च के आयोजनों और धार्मिक शिक्षा में पोलिश भाषा का इस्तेमाल किया गया। नतीजतन, कई पादरियों को जेल में डाल दिया गया या साइबेरिया भेज दिया गया। लेकिन पोलिश भाषा का इस्तेमाल रूसी प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष का एक महान प्रतीक बन गया।
1848: भूख, कठिनाइयाँ और जन-विद्रोह क्यों हुए?
1830 का दशक यूरोप में भारी आर्थिक कठिनाइयाँ लेकर आया। जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी और नौकरियाँ कम हो गईं। लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर गए। खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें बढ़ने से शहरों और गाँवों में व्यापक गरीबी फैल गई।
- सिलेसिया के बुनकर (1845): सिलेसिया में सूती कपड़ा बुनने वाले बुनकरों ने उन ठेकेदारों के खिलाफ विद्रोह कर दिया जो उन्हें बहुत कम पैसे देते थे।
- फ्रांस का विद्रोह (1848): 1848 में पेरिस के लोग भूख और बेरोजगारी से तंग आकर सड़कों पर उतर आए। बैरिकेड लगाए गए और राजा लुई फिलिप को भागने पर मजबूर किया गया! इसके बाद फ्रांस में एक गणतंत्र की घोषणा की गई, जिसने 21 वर्ष से ऊपर के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार (Right to vote) प्रदान किया।
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: फ्रेडरिक सॉरयू का कल्पनादर्श और फ्रांसीसी क्रांति
- भाग 2: यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण और नया मध्यवर्ग
- भाग 3: 1815 के बाद नया रूढ़िवाद और क्रांतिकारी
- You are Reading Here: क्रांतियों का युग (1830-1848) और रूमानी कल्पना
- भाग 5: जर्मनी और इटली का एकीकरण
- भाग 6: राष्ट्र की दृश्य-कल्पना और साम्राज्यवाद