पिछले भाग में हमने जाना था कि कैसे जलियाँवाला बाग हत्याकांड और रॉलट एक्ट ने पूरे देश में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ गुस्सा भर दिया था।
गांधीजी को लगने लगा था कि अब भारत में एक बहुत बड़ा और व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है। लेकिन कोई भी बड़ा आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक हिंदू और मुसलमान एक साथ न आएं। आइए इस भाग में हम पढ़ते हैं कि कैसे खिलाफत का मुद्दा उठाकर गांधीजी ने पूरे देश में ‘असहयोग आंदोलन’ की शुरुआत की और इसका शहरों, गाँवों और जंगलों में क्या असर हुआ!
असहयोग ही क्यों और खिलाफत का मुद्दा क्या था?
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ (1909) में महात्मा गांधी ने लिखा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के ‘सहयोग’ से ही स्थापित हुआ था और चल रहा है। अगर भारतीय अपना सहयोग वापस ले लें, तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और ‘स्वराज’ की स्थापना हो जाएगी।
इसी बीच प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी। पूरी दुनिया के मुसलमान तुर्की के सम्राट (खलीफा) को अपना आध्यात्मिक नेता मानते थे। खलीफा की शक्तियों को बचाने के लिए भारत में मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधुओं) ने ‘खिलाफत समिति’ का गठन किया। गांधीजी ने इस मौके को हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए सही माना और सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ‘असहयोग-खिलाफत आंदोलन’ शुरू करने का प्रस्ताव पारित करा लिया।
शहरों में आंदोलन ने कैसा रूप लिया?
असहयोग आंदोलन की शुरुआत शहरी मध्यवर्ग के साथ हुई:
- हज़ारों विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए।
- हेडमास्टरों और शिक्षकों ने इस्तीफे दे दिए और वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद कर दिया।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। इससे विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया।
आंदोलन धीमा क्यों पड़ा? कुछ समय बाद शहरों में आंदोलन धीमा पड़ने लगा क्योंकि ‘खादी’ का कपड़ा मिलों में बनने वाले कपड़े से बहुत महँगा होता था जिसे गरीब नहीं खरीद सकते थे। इसके अलावा, अंग्रेजी स्कूलों के स्थान पर भारतीय संस्थान नहीं थे, इसलिए छात्र और शिक्षक वापस सरकारी स्कूलों में लौटने लगे।
गाँवों में किसानों का विद्रोह कैसे हुआ?
शहरों से बढ़कर यह आंदोलन गाँवों तक फैल गया, लेकिन वहाँ के लोगों के लिए स्वराज का मतलब कुछ और था। अवध में संन्यासी बाबा रामचंद्र किसानों का नेतृत्व कर रहे थे। वे फीजी में ‘गिरमिटिया मज़दूर’ के रूप में काम कर चुके थे।
उनका आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ कम, बल्कि उन तालुकदारों और ज़मींदारों के खिलाफ ज्यादा था जो किसानों से भारी लगान माँगते थे और ‘बेगार’ (बिना पैसे के काम) करवाते थे। किसानों की माँग थी कि लगान कम हो, बेगार खत्म हो और दमनकारी ज़मींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए। इसी के तहत अवध में ‘नाई-धोबी बंद’ का फैसला लिया गया। अक्टूबर 1920 में जवाहरलाल नेहरू और बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में ‘अवध किसान सभा’ का गठन भी किया गया।
आदिवासी क्षेत्रों और बागानों में क्या हुआ?
- आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियाँ: यहाँ के आदिवासी किसानों को अंग्रेजों ने जंगलों में जाने से रोक दिया था। उनका नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू कर रहे थे, जिनका दावा था कि उनके पास विशेष चमत्कारी शक्तियाँ हैं। वे गांधीजी के प्रशंसक थे, लेकिन उनका मानना था कि भारत को अहिंसा से नहीं, बल्कि केवल बल-प्रयोग से आज़ाद कराया जा सकता है। उन्होंने छापामार (Guerrilla) युद्ध चलाया।
- असम के बागान मज़दूर: ‘अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम’ (Inland Emigration Act 1859) के तहत चाय बागान मज़दूरों को बिना इजाज़त बागान से बाहर जाने की छूट नहीं थी। जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना, तो उन्हें लगा कि अब ‘गांधी राज’ आ रहा है और सबको अपने गाँव में ज़मीन मिल जाएगी। हज़ारों मज़दूरों ने अधिकारियों की बात मानने से इनकार कर दिया और बागान छोड़ दिए।
चौरी-चौरा की घटना और आंदोलन की वापसी
असहयोग आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से चलना चाहिए था, लेकिन कई जगह यह हिंसक होने लगा था। फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित ‘चौरी-चौरा’ में एक शांतिपूर्ण जुलूस का पुलिस के साथ हिंसक टकराव हो गया। गुस्साई भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसवाले मारे गए।
इस हिंसा को देखकर महात्मा गांधी को बहुत दुख हुआ और उन्होंने महसूस किया कि अभी भारतीयों को सत्याग्रह के लिए और प्रशिक्षण की ज़रूरत है। इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन को तुरंत वापस लेने (स्थगित करने) का फैसला कर लिया।
अब खेलें: असहयोग आंदोलन क्विज़
अब नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और खिलाफत आंदोलन, बाबा रामचंद्र, अल्लूरी सीताराम राजू और चौरी-चौरा की घटना पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण इतिहास प्रश्नों का अभ्यास करें!
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अध्याय 2 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: प्रथम विश्व युद्ध, सत्याग्रह का विचार और रॉलट एक्ट
- You are Reading Here: असहयोग आंदोलन: शहरों से लेकर गाँवों तक विद्रोह
- भाग 3: सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर और नमक यात्रा
- भाग 4: सविनय अवज्ञा की सीमाएँ और पूना पैक्ट
- भाग 5: सामूहिक अपनेपन का भाव और भारत माता की छवि