कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने जाना था कि चौरी-चौरा की हिंसक घटना के कारण गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को अचानक रोक दिया था।
आंदोलन रुकने के बाद देश में थोड़ी निराशा छा गई थी। कुछ नेता चुनाव लड़कर अंग्रेजी परिषदों में जाना चाहते थे, तो कुछ युवा नेता पूर्ण स्वतंत्रता के लिए उग्र जन-आंदोलन चाहते थे। आज के इस भाग में हम जानेंगे कि कैसे ‘साइमन कमीशन’ के विरोध और ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग ने गांधीजी को एक नया और बहुत बड़ा आंदोलन—सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience) शुरू करने के लिए प्रेरित किया!
स्वराज पार्टी का गठन क्यों हुआ?
असहयोग आंदोलन खत्म होने के बाद कांग्रेस के कुछ नेता जन-आंदोलनों से थक चुके थे। वे प्रांतीय परिषदों के चुनावों में हिस्सा लेना चाहते थे ताकि सिस्टम के अंदर रहकर अंग्रेजी नीतियों का विरोध कर सकें। सी.आर. दास (चित्तरंजन दास) और मोतीलाल नेहरू ने परिषद की राजनीति में वापस लौटने के लिए कांग्रेस के भीतर ही ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया। लेकिन जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता ज़्यादा उग्र जन-आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में थे।
साइमन कमीशन का विरोध क्यों किया गया?
भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन के जवाब में, ब्रिटेन की नई टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया। इस आयोग का काम भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना और बदलाव के सुझाव देना था।
इस आयोग में सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सभी के सभी अंग्रेज़ थे। इसलिए, जब 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो उसका स्वागत ‘साइमन वापस जाओ’ (Go back Simon) के नारों से किया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सभी पार्टियों ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया।
पूर्ण स्वराज की माँग कैसे उठी?
अक्टूबर 1929 में वायसराय लॉर्ड इरविन ने भारत के लिए ‘डोमिनियन स्टेट्स’ (Dominion status) का गोलमोल सा ऐलान कर दिया, जिससे कांग्रेसी नेता संतुष्ट नहीं थे।
दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया। यह भी तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा और लोग पूर्ण स्वाधीनता के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे।
नमक यात्रा (दांडी मार्च) क्या थी?
देश को एकजुट करने के लिए महात्मा गांधी को ‘नमक’ एक बहुत ही शक्तिशाली प्रतीक दिखाई दिया, क्योंकि नमक का इस्तेमाल अमीर और गरीब सभी करते थे। अंग्रेज़ों ने नमक के उत्पादन पर एकाधिकार (Monopoly) कर रखा था और उस पर टैक्स लगा रखा था।
गांधीजी ने वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें 11 माँगें थीं, जिनमें सबसे प्रमुख माँग नमक कर (Salt Tax) को खत्म करना था। जब इरविन झुकने को तैयार नहीं हुआ, तो गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को अपनी ऐतिहासिक नमक यात्रा शुरू कर दी।
- यह यात्रा साबरमती में उनके आश्रम से शुरू होकर 240 मील दूर गुजरात के तटीय कस्बे दांडी तक जानी थी।
- वे अपने 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों के साथ 24 दिन तक रोज़ाना 10 मील चले।
- 6 अप्रैल को वे दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह अंग्रेजी कानून का खुला उल्लंघन था!
सविनय अवज्ञा आंदोलन कैसे शुरू हुआ?
दांडी में नमक कानून तोड़ने के साथ ही देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। यह असहयोग आंदोलन से अलग था। इसमें लोगों से केवल अंग्रेजों का ‘सहयोग’ न करने के लिए नहीं, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को ‘तोड़ने’ के लिए कहा गया था।
देश भर में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया, किसानों ने लगान चुकाने से मना कर दिया और आदिवासियों ने जंगल के कानूनों का उल्लंघन किया। इस भयंकर विद्रोह को देखकर अंग्रेज़ी सरकार बौखला गई और उसने कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) हुआ।
अब खेलें: सविनय अवज्ञा और नमक यात्रा क्विज़
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अध्याय 2 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: प्रथम विश्व युद्ध, सत्याग्रह का विचार और रॉलट एक्ट
- भाग 2: असहयोग आंदोलन: शहरों से लेकर गाँवों तक विद्रोह
- You are Reading Here: सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर और नमक यात्रा
- भाग 4: सविनय अवज्ञा की सीमाएँ और पूना पैक्ट
- भाग 5: सामूहिक अपनेपन का भाव और भारत माता की छवि