कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने जाना था कि महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के जरिए कैसे सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की थी।
लेकिन क्या भारत के सभी सामाजिक समूहों ने इस आंदोलन में पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया? सच्चाई यह है कि ‘स्वराज’ (स्वतंत्रता) का मतलब सबके लिए एक जैसा नहीं था। कुछ वर्गों ने इस आंदोलन से दूरी बनाए रखी। आज के इस भाग में हम सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाओं, डॉ. बी.आर. आंबेडकर के संघर्ष और हिंदू-मुस्लिम तनाव के बारे में विस्तार से जानेंगे!
सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ क्या थीं?
सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारणा से प्रभावित नहीं थे। ऐसा ही एक समूह राष्ट्र के ‘अछूतों’ का था, जो 1930 के दशक के बाद खुद को ‘दलित’ या ‘उत्पीड़ित’ कहने लगे थे। कांग्रेस ने लंबे समय तक दलितों की अनदेखी की थी, क्योंकि कांग्रेस रूढ़िवादी सवर्ण हिंदुओं (सनातनियों) को नाराज़ नहीं करना चाहती थी।
दलितों की भागीदारी और महात्मा गांधी के प्रयास
महात्मा गांधी ने घोषणा की कि अस्पृश्यता (छुआछूत) को खत्म किए बिना सौ साल तक भी स्वराज की स्थापना नहीं की जा सकती। उन्होंने अछूतों को ‘हरिजन’ (ईश्वर की संतान) बताया।
गांधीजी ने मंदिरों, सार्वजनिक तालाबों, सड़कों और कुओं तक उनकी समान पहुँच सुनिश्चित करने के लिए सत्याग्रह किया। मैला ढोने वालों के काम को सम्मान दिलाने के लिए वे खुद शौचालय साफ़ करने लगे। लेकिन कई दलित नेता अपने समुदाय की समस्याओं का एक ‘राजनीतिक समाधान’ चाहते थे। वे शिक्षण संस्थानों में आरक्षण और अलग चुनाव क्षेत्रों (पृथक निर्वाचिका) की माँग कर रहे थे।
डॉ बी आर आंबेडकर और पूना पैक्ट क्या था?
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 1930 में दलितों को ‘दमित वर्ग एसोसिएशन’ (Depressed Classes Association) में संगठित किया। दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने दलितों के लिए ‘पृथक निर्वाचिका’ (अलग चुनाव क्षेत्र) की माँग की, जिस पर गांधीजी से उनका भारी टकराव हुआ।
जब ब्रिटिश सरकार ने आंबेडकर की माँग मान ली, तो गांधीजी यह सोचकर आमरण अनशन (Fast unto death) पर बैठ गए कि इससे समाज बँट जाएगा। अंततः डॉ. आंबेडकर को गांधीजी की बात माननी पड़ी और सितंबर 1932 में ‘पूना पैक्ट’ (Poona Pact) पर हस्ताक्षर हुए।
- इस समझौते के तहत दलित वर्गों को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गईं।
- हालांकि, उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों (General Electorate) द्वारा ही किया जाना तय हुआ।
मुस्लिम राजनीतिक संगठन आंदोलन से दूर क्यों रहे?
असहयोग-खिलाफ़त आंदोलन के धीमा पड़ने के बाद, मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा था। 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस स्पष्ट रूप से ‘हिंदू महासभा’ जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के करीब दिखने लगी थी। इससे हिंदू-मुस्लिम संबंध खराब हुए और कई शहरों में सांप्रदायिक दंगे (दंगे-फ़साद) भड़क उठे।
मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की माँग क्या थी?
मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता मोहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि यदि मुसलमानों को केंद्रीय सभा (Central Assembly) में आरक्षित सीटें दी जाएं और मुस्लिम-बहुल प्रांतों (बंगाल और पंजाब) में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए, तो वे ‘पृथक निर्वाचिका’ की माँग छोड़ने को तैयार हैं।
लेकिन 1928 में आयोजित ‘सर्वदलीय सम्मेलन’ (All Parties Conference) में हिंदू महासभा के नेता एम.आर. जयकर ने इस समझौते का कड़ा विरोध किया, जिससे एकता की सारी उम्मीदें टूट गईं। जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ, तो दोनों समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का गहरा माहौल था, इसलिए मुसलमानों के एक बड़े तबके ने इसमें कोई खास हिस्सा नहीं लिया।
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अध्याय 2 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: प्रथम विश्व युद्ध, सत्याग्रह का विचार और रॉलट एक्ट
- भाग 2: असहयोग आंदोलन: शहरों से लेकर गाँवों तक विद्रोह
- भाग 3: सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर और नमक यात्रा
- You are Reading Here: सविनय अवज्ञा की सीमाएँ और पूना पैक्ट
- भाग 5: सामूहिक अपनेपन का भाव और भारत माता की छवि