कक्षा 10 इतिहास के अध्याय ‘भारत में राष्ट्रवाद’ के इस अंतिम भाग में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। अब तक हमने देखा कि महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ कैसे बड़े-बड़े आंदोलन चलाए।
लेकिन किसी भी देश की आज़ादी केवल राजनीतिक आंदोलनों से नहीं मिलती। जब तक अलग-अलग धर्मों, जातियों और भाषाओं के लोगों के मन में यह भाव न आए कि ‘हम सब एक ही राष्ट्र के अंग हैं’, तब तक सच्चा राष्ट्रवाद नहीं पनप सकता। आज हम जानेंगे कि भारत में यह ‘सामूहिक अपनेपन का भाव’ कैसे विकसित हुआ और ‘भारत माता’ की छवि ने इसमें क्या कमाल किया!
सामूहिक अपनेपन का भाव कैसे विकसित हुआ?
सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से तो लोगों के साझा संघर्षों (जैसे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन) के चलते पैदा हुई थी। लेकिन इसके अलावा बहुत सी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ भी थीं जिनके जरिए राष्ट्रवाद लोगों के दिलों में बस गया। इतिहास व साहित्य, लोक-कथाएँ व गीत, चित्र व प्रतीक—इन सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत माता की छवि का निर्माण किसने किया?
बीसवीं सदी में जैसे-जैसे राष्ट्रवाद का विकास हुआ, भारत की पहचान एक तस्वीर यानी ‘भारत माता’ के रूप में की जाने लगी।
- यह छवि सबसे पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने बनाई थी। 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में प्रसिद्ध गीत ‘वंदे मातरम्’ लिखा था। बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल कर लिया गया और बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में इसे खूब गाया गया।
- इसी स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अवनिंद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि (पेंटिंग) बनाई। इस पेंटिंग में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है—वह शांत, गंभीर, दैवीय और आध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती हैं। भारत माता की इस छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा सबूत माना जाने लगा।
लोक-कथाओं और गीतों ने राष्ट्रवाद को कैसे बढ़ाया?
उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत के राष्ट्रवादियों ने लोक-कथाओं, लोक-गीतों और जनश्रुतियों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। उनका मानना था कि विदेशी शासन ने हमारी जिस असली संस्कृति को नष्ट कर दिया है, वह इन लोक-कथाओं में ही बची हुई है।
बंगाल में रवींद्रनाथ टैगोर खुद लोकगीत और बाल-गीत इकट्ठा करने निकल पड़े। वहीं मद्रास (चेन्नई) में नटेसा शास्त्री ने तमिल लोक-कथाओं का एक विशाल संकलन ‘द फोकलोर्स ऑफ सदर्न इंडिया’ के नाम से चार खंडों में प्रकाशित किया। उनका मानना था कि लोक-कथाएँ राष्ट्र का असली साहित्य होती हैं।
राष्ट्रवाद के प्रतीक: झंडे का विकास कैसे हुआ?
राष्ट्रवादी नेताओं ने लोगों को एकजुट करने के लिए नए-नए चिह्नों और प्रतीकों का इस्तेमाल किया, जिनमें ‘झंडा’ सबसे प्रमुख था:
- स्वदेशी आंदोलन का झंडा: बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा झंडा (लाल, हरा और पीला) तैयार किया गया। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल थे, और हिंदुओं व मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक आधा चाँद (अर्धचंद्र) दर्शाया गया था।
- स्वराज झंडा (1921): 1921 तक आते-आते महात्मा गांधी ने भी ‘स्वराज झंडा’ तैयार कर लिया था। यह भी एक तिरंगा (लाल, हरा और सफेद) था और इसके बीच में गांधीवादी आदर्शों का प्रतीक—एक चरखा बना हुआ था, जो स्वावलंबन (अपना काम खुद करने) का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामकर चलना अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संकेत बन गया था।
इतिहास की पुनर्व्याख्या ने क्या भूमिका निभाई?
अंग्रेज़ भारतीयों को पिछड़ा और आदिम मानते थे, जो अपना शासन खुद नहीं चला सकते। इसके जवाब में भारतीयों ने अपने महान इतिहास की ओर देखना शुरू किया। उन्होंने भारत की कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित, धर्म और व्यापार के गौरवशाली अतीत के बारे में लिखना शुरू किया। इस ‘इतिहास की पुनर्व्याख्या’ ने भारतीयों के मन में अपने देश के प्रति भारी गर्व (Pride) की भावना भर दी और उन्हें अंग्रेजों की गुलामी से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया।
अब खेलें: सामूहिक अपनेपन का भाव क्विज़
अब नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और भारत माता, वंदे मातरम्, स्वराज झंडा और लोक-कथाओं पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण इतिहास प्रश्नों का अभ्यास करें!
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अध्याय 2 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: प्रथम विश्व युद्ध, सत्याग्रह का विचार और रॉलट एक्ट
- भाग 2: असहयोग आंदोलन: शहरों से लेकर गाँवों तक विद्रोह
- भाग 3: सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर और नमक यात्रा
- भाग 4: सविनय अवज्ञा की सीमाएँ और पूना पैक्ट
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