कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा के अंतिम भाग में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। पिछले भाग में हमने प्रथम विश्व युद्ध और भयंकर महामंदी के बारे में पढ़ा था, जिसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था।
लेकिन मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुईं। महामंदी के कुछ ही साल बाद दुनिया एक और भयानक युद्ध—’द्वितीय विश्व युद्ध’ की आग में झुलसने लगी। युद्ध के बाद यह तय था कि अगर दुनिया को बचाना है, तो अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करना होगा। आज के इस अंतिम भाग में हम ‘ब्रेटन वुड्स समझौते’ और आधुनिक वैश्वीकरण के उदय की कहानी जानेंगे!
द्वितीय विश्व युद्ध का क्या प्रभाव पड़ा?
दूसरा विश्व युद्ध (1939-1945) दो बड़े गुटों के बीच लड़ा गया था। एक तरफ मित्र राष्ट्र (ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और अमेरिका) थे, तो दूसरी तरफ धुरी शक्तियाँ (नात्सी जर्मनी, जापान और इटली) थीं। यह युद्ध पहले युद्ध से भी ज्यादा भयानक था। इसमें कम से कम 6 करोड़ लोग मारे गए (जो उस समय दुनिया की आबादी का 3% था)।
इस युद्ध ने दुनिया का नक्शा बदल दिया। युद्ध के बाद दो नई महाशक्तियाँ उभर कर सामने आईं: अमेरिका (जो आर्थिक और सैन्य रूप से सबसे ताकतवर था) और सोवियत संघ (जिसने अपने देश को एक पिछड़े खेतिहर देश से एक विश्व शक्ति बना लिया था)।
ब्रेटन वुड्स समझौता क्या था?
युद्ध के बाद विश्व के नेताओं को यह बात समझ आ गई थी कि अगर दुनिया में शांति बनाए रखनी है, तो पूर्ण रोज़गार और आर्थिक स्थिरता बहुत ज़रूरी है। इसके लिए औद्योगिक देशों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ।
जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर के ‘ब्रेटन वुड्स’ (Bretton Woods) नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसी सम्मेलन में विश्व अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने की रूपरेखा तैयार की गई, जिसे ‘ब्रेटन वुड्स समझौता’ कहा जाता है।
ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानें कौन थीं?
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में विश्व की अर्थव्यवस्था को सँभालने के लिए दो बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की गई:
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF): इसका काम सदस्य देशों के बाहरी व्यापार में होने वाले मुनाफे या घाटे से निपटना था।
- विश्व बैंक (World Bank): इसका असली नाम ‘अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक’ (IBRD) था। इसका काम युद्ध से तबाह हुए देशों के पुनर्निर्माण (फिर से बनाने) के लिए पैसा उधार देना था।
इन दोनों संस्थाओं (IMF और विश्व बैंक) को ही ‘ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान’ कहा जाता है। इन संस्थाओं पर अमेरिका जैसी पश्चिमी ताकतों का नियंत्रण था और अमेरिका के पास इनके फैसलों पर ‘वीटो’ (Veto – विशेषाधिकार) की ताकत थी।
जी-सत्तर का गठन क्यों हुआ?
1950 और 1960 के दशक में एशिया और अफ्रीका के कई देश आज़ाद तो हो गए थे, लेकिन वे भयंकर गरीबी का सामना कर रहे थे। IMF और विश्व बैंक का निर्माण अमीर देशों की समस्याओं को सुलझाने के लिए किया गया था, इसलिए उन्होंने विकासशील (गरीब) देशों की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
इससे परेशान होकर विकासशील देशों ने अपने हितों की रक्षा के लिए एक नया समूह बनाया, जिसे जी-77 (G-77) कहा जाता है। उन्होंने नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO) की माँग की। वे एक ऐसी प्रणाली चाहते थे जिसमें उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण मिल सके, विकास के लिए अधिक सहायता मिले, और उनके माल को अमीर देशों के बाज़ार में पहुँचने का मौका मिले।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का उदय कैसे हुआ?
1970 के दशक के बाद विश्व अर्थव्यवस्था में एक और बड़ा बदलाव आया। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) वे कंपनियाँ होती हैं जिनका व्यापार और कारखाने एक से अधिक देशों में फैले होते हैं।
इन कंपनियों ने देखा कि चीन जैसे एशियाई देशों में मज़दूरों की दिहाड़ी बहुत कम है। इसलिए उन्होंने अपना उत्पादन (फैक्ट्रियाँ) अमेरिका और यूरोप से हटाकर चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे कम वेतन वाले देशों में ले जाना शुरू कर दिया। इस कदम से विश्व व्यापार का भूगोल पूरी तरह बदल गया और यही वह ‘वैश्वीकरण’ है जिसे आज हम अपने चारों तरफ देखते हैं!
अब खेलें: ब्रेटन वुड्स और विश्व अर्थव्यवस्था क्विज़
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अध्याय 3 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: आधुनिक युग से पहले: सिल्क मार्ग, भोजन की यात्रा और बीमारियाँ
- भाग 2: उन्नीसवीं शताब्दी: विश्व अर्थव्यवस्था, तकनीक और रिंडरपेस्ट
- भाग 3: भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना और वैश्विक व्यापार
- भाग 4: महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था: महामंदी और उसका प्रभाव
- You are Reading Here: विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: ब्रेटन वुड्स और वैश्वीकरण