हमें लगता है कि जब मशीनें आ गईं, तो सारे उद्योगपतियों ने तुरंत मशीनें खरीद ली होंगी और हाथ से काम करना बंद कर दिया होगा। लेकिन सच तो कुछ और ही था! उन्नीसवीं सदी के विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों से ज़्यादा इंसानी हाथों को पसंद करते थे। आइए जानते हैं ऐसा क्यों था और उस दौर में मज़दूरों का जीवन कितना कठिन था!
उद्योगपतियों को हाथ का श्रम क्यों पसंद था?
विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम (मज़दूरों) की कोई कमी नहीं थी। काम की तलाश में गाँव से हज़ारों लोग शहरों की तरफ आ रहे थे। इसलिए वेतन बहुत कम था। उद्योगपतियों को मशीनों की बजाय हाथ का श्रम पसंद था, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
- मशीनें महँगी थीं: नई मशीनें बहुत महँगी होती थीं और अक्सर खराब हो जाती थीं। उनकी मरम्मत पर भी भारी खर्च आता था।
- मौसमी काम: बहुत सारे उद्योगों (जैसे गैस घरों, शराबखानों, बुक बाइंडिंग) में काम केवल एक खास मौसम (जैसे सर्दियों या क्रिसमस के समय) में ही होता था। ऐसे में उद्योगपति पूरे साल के लिए महँगी मशीनें खरीदने के बजाय, कुछ महीनों के लिए मज़दूर रखना ज़्यादा सस्ता मानते थे।
- बारीक डिज़ाइन की माँग: मशीनों से केवल एक ही तरह का (एक सांचे में ढला हुआ) सामान भारी मात्रा में बन सकता था। लेकिन बाज़ार में अक्सर बारीक डिज़ाइन और खास आकारों वाली चीज़ों की माँग रहती थी, जिन्हें केवल इंसानी हाथों से ही बनाया जा सकता था। ब्रिटेन के उच्च वर्ग और अमीर लोग हाथ से बनी चीज़ों को ही ज़्यादा महत्व देते थे।
मज़दूरों का जीवन कैसा था?
बाज़ार में श्रम की बहुतायत (बहुत ज़्यादा मज़दूर) होने के कारण मज़दूरों का जीवन बहुत भयानक था। शहर में नौकरी मिलना इस बात पर निर्भर करता था कि वहाँ आपका कोई दोस्त या रिश्तेदार है या नहीं। जिनके जान-पहचान वाले नहीं थे, उन्हें हफ्तों तक इंतज़ार करना पड़ता था।
काम की तलाश में आए लोग पुलों के नीचे या रैन बसेरों में सोते थे। मौसमी काम होने के कारण जब काम का सीज़न खत्म हो जाता था, तो मज़दूर फिर से सड़क पर आ जाते थे। कुछ लोग गाँवों की तरफ लौट जाते, तो कुछ शहरों में ही छोटे-मोटे काम ढूँढने लगते। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में मज़दूरी में थोड़ी वृद्धि तो हुई, लेकिन महंगाई बढ़ने के कारण मज़दूरों की असली आमदनी में कोई फायदा नहीं हुआ।
नई तकनीक का विरोध क्यों हुआ?
बेरोज़गारी की आशंका के कारण मज़दूर नई तकनीक से नफ़रत करते थे। जब मशीनों के आने से उनका काम छिनने लगा, तो उन्होंने मशीनों पर हमले करने शुरू कर दिए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्पिनिंग जेनी है।
स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) एक ऐसी मशीन थी जिसे जेम्स हरग्रीव्ज़ ने 1764 में बनाया था। यह मशीन सूत कातने (धागा बनाने) की प्रक्रिया को बहुत तेज़ कर देती थी। इस मशीन का एक ही पहिया घुमाकर एक मज़दूर एक साथ कई तकलियों को घुमा सकता था और कई धागे एक साथ कात सकता था।
जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीनें लगाई गईं, तो हाथ से ऊन कातने वाली महिलाओं को लगा कि उनकी नौकरी चली जाएगी। इसलिए उन महिलाओं ने इन नई मशीनों पर हमला कर दिया और उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया। मशीनों के खिलाफ यह टकराव लंबे समय तक चलता रहा।
कारखानों में काम के हालात
1840 के दशक के बाद शहरों में निर्माण कार्य तेज़ी से बढ़े। नई सड़कें बनाई गईं, रेलवे स्टेशन बने, रेलवे लाइनों का विस्तार किया गया और नदियों को गहरा किया गया। इससे परिवहन उद्योग में रोज़गार के अवसर दोगुने हो गए। हालांकि रोज़गार तो बढ़े, लेकिन मज़दूरों के रहने के हालात बहुत गंदे और अमानवीय बने रहे।
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अध्याय 4 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: पूर्व-औद्योगीकरण और कारखानों का उदय
- You are Reading Here: हाथ का श्रम, वाष्प शक्ति और मज़दूरों का जीवन
- भाग 3: भारतीय कपड़े का युग और गुमाश्तों की भूमिका
- भाग 4: भारत में शुरुआती कारखाने और उद्यमी
- भाग 5: औद्योगिक विकास की विशेषताएँ और वस्तुओं का विज्ञापन