पिछले भाग में हमने भारत में खुले शुरुआती कारखानों और उद्यमियों के बारे में जाना था।
आज के इस अंतिम भाग में हम जानेंगे कि बीसवीं सदी में भारत का औद्योगिक विकास कैसे हुआ। इसके साथ ही हम यह भी समझेंगे कि जब कारखानों में ढेरों सामान बनने लगा, तो ब्रिटिश और भारतीय निर्माताओं ने उसे बेचने के लिए विज्ञापनों, लेबलों और कैलेंडरों का कैसा अनोखा इस्तेमाल किया!
औद्योगिक विकास की अनूठी विशेषताएँ क्या थीं?
भारत में औद्योगिक उत्पादन पर वर्चस्व रखने वाली यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की दिलचस्पी मुख्य रूप से उन चीज़ों में थी जिन्हें निर्यात (विदेश भेजा) किया जा सके। इसलिए उन्होंने चाय, कॉफ़ी, जूट और खनन में भारी निवेश किया।
जब भारतीय व्यवसायियों ने अपने कारखाने लगाने शुरू किए, तो उन्होंने मैनचेस्टर (इंग्लैंड) की चीज़ों से टक्कर लेने से परहेज किया। भारतीय मिलों में कपड़े के बजाय मोटा सूत (Yarn) बनाया जाता था, जिसे चीन को निर्यात किया जाता था। बीसवीं सदी के पहले दशक में ‘स्वदेशी आंदोलन’ के कारण लोगों ने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया। अब भारतीय उद्योगपतियों ने सूत की बजाय भारत में ही कपड़ा बनाना शुरू कर दिया।
प्रथम विश्व युद्ध का औद्योगिक प्रभाव क्या पड़ा?
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारत के औद्योगिक विकास को पूरी तरह बदल दिया। युद्ध के दौरान ब्रिटिश कारखाने सेना की ज़रूरतें पूरी करने में व्यस्त हो गए। इसलिए भारत में मैनचेस्टर से आने वाले माल (आयात) में भारी गिरावट आ गई।
अब भारतीय बाज़ार को रातों-रात एक विशाल देसी बाज़ार मिल गया। इसके अलावा, ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कारखानों को भी युद्ध का सामान (जूट की बोरियाँ, फौजियों की वर्दियाँ, टेंट और चमड़े के जूते) बनाने का काम सौंप दिया। नए कारखाने लगाए गए और मज़दूरों को कई शिफ्टों में काम करना पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध के कारण भारत में औद्योगिक उत्पादन बहुत तेज़ी से बढ़ा।
लघु उद्योगों का दबदबा कैसे बना रहा?
युद्ध के बाद फैक्ट्री उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन फिर भी अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों (Small-scale industries) का ही दबदबा था। ज़्यादातर मज़दूर रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि छोटी वर्कशॉप्स या घरेलू इकाइयों में काम करते थे।
हथकरघा बुनकर भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे। उन्होंने नई तकनीक अपना ली थी। बुनकरों ने अपने करघों में ‘फ्लाइंग शटल’ (हथकरघे में इस्तेमाल होने वाला एक यांत्रिक औज़ार) लगा लिया था। फ्लाइंग शटल के आने से काम की रफ़्तार बढ़ गई और मज़दूरों की उत्पादकता में भारी सुधार हुआ, जिससे वे मिलों के कपड़े से मुकाबला कर सके।
वस्तुओं के लिए बाज़ार कैसे तैयार किया गया?
जब नई चीज़ें बनती हैं, तो लोगों को उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करना पड़ता है। इसके लिए विज्ञापनों का इस्तेमाल किया गया। विज्ञापनों ने नए उत्पादों को ज़रूरत का हिस्सा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीरें
मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने कपड़ों के बंडलों पर लेबल (पर्चियाँ) लगाने शुरू किए। लेबलों पर “मेड इन मैनचेस्टर” लिखा होता था जिससे ग्राहकों को माल की गुणवत्ता का भरोसा होता था। लेकिन बात सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं थी।
ब्रिटिश निर्माताओं ने इन लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं (जैसे कृष्ण और सरस्वती) की तस्वीरें छापनी शुरू कर दीं। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि विदेशी उत्पादों को भारतीय देवताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त है और लोग उसे अपना समझकर खरीदें।
कैलेंडरों का प्रयोग
अखबारों और पत्रिकाओं के अलावा कैलेंडरों का इस्तेमाल खूब हुआ। जो लोग पढ़-लिख नहीं सकते थे, वे भी कैलेंडर देखकर विज्ञापन समझते थे। चाय की दुकानों, दफ्तरों और गरीब लोगों के घरों में कैलेंडर टँगे रहते थे, जिन पर भगवान या नवाबों की तस्वीरें और कंपनी का विज्ञापन होता था।
राष्ट्रवादी विज्ञापन कैसे थे?
भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापनों का इस्तेमाल राष्ट्रवादी संदेश देने के लिए किया। उनके विज्ञापनों का साफ संदेश था: “अगर आप अपने देश की परवाह करते हैं, तो उन चीज़ों को खरीदें जो भारतीय लोगों ने बनाई हैं।” विज्ञापनों के इस तरीके ने स्वदेशी आंदोलन को बहुत मज़बूती दी।
अब खेलें: औद्योगिक विकास और विज्ञापन क्विज़
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अध्याय 4 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: पूर्व-औद्योगीकरण और कारखानों का उदय
- भाग 2: हाथ का श्रम, वाष्प शक्ति और मज़दूरों का जीवन
- भाग 3: भारतीय कपड़े का युग और गुमाश्तों की भूमिका
- भाग 4: भारत में शुरुआती कारखाने और उद्यमी
- You are Reading Here: औद्योगिक विकास की विशेषताएँ और वस्तुओं का विज्ञापन