कक्षा 10 इतिहास के अंतिम अध्याय ‘मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया’ के पहले भाग में आपका बहुत-बहुत स्वागत है।
आज हमारे चारों तरफ छपी हुई चीज़ें हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया में छपाई (Printing) की मशीन नहीं थी, तब किताबें कैसे तैयार होती थीं? मुद्रण की सबसे पहली तकनीक यूरोप में नहीं, बल्कि पूर्वी एशिया में विकसित हुई थी। आइए जानते हैं चीन, जापान और कोरिया में छपाई की शुरुआत कैसे हुई!
चीन में छपाई की शुरुआत कैसे हुई?
मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई, जहाँ यह छपाई मुख्य रूप से हाथ से होती थी। तक़रीबन 594 ईस्वी से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक (लकड़ी के ठप्पों) पर कागज़ को रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं। इसे ‘वुडब्लॉक प्रिंटिंग’ कहा जाता है।
चूँकि उस समय के कागज़ बहुत पतले होते थे और दोनों तरफ छपाई संभव नहीं थी, इसलिए पारंपरिक चीनी किताब ‘एकॉर्डियन’ शैली में बनाई जाती थी, जिसमें पन्नों के किनारों को मोड़ने के बाद सिल दिया जाता था।
सुलेखन कला और नौकरशाही की भूमिका
इन किताबों की नक़ल उतारने वाले लोग बहुत दक्ष सुलेखक (खुशखत) होते थे, जो हाथ से बड़े सुंदर-सुडौल अक्षरों में कलात्मक लिखाई (सुलेखन) करते थे। एक लंबे समय तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतंत्र ही था। चीन में नौकरशाही (अधिकारियों) की भर्ती ‘सिविल सेवा परीक्षा’ के जरिए होती थी, जिसके लिए चीनी राजतंत्र बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। 16वीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी, जिससे छपी किताबों की मात्रा भी बहुत बढ़ गई。
व्यापारियों और महिलाओं ने पढ़ने को कैसे अपनाया?
सत्रहवीं सदी तक आते-आते चीन में शहरी संस्कृति फलने-फूलने लगी। अब मुद्रित सामग्री का उपयोग सिर्फ अधिकारी नहीं करते थे, बल्कि व्यापारी भी अपने रोज़मर्रा के कारोबार की जानकारी लेने के लिए इसका इस्तेमाल करने लगे।
पढ़ना एक शगल (शौक) बन गया। अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने तो खुद के रचे हुए काव्य और नाटक भी छापे। 19वीं सदी के अंत में पश्चिमी शक्तियों ने चीन में अपनी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस का आयात किया, जिससे शंघाई शहर प्रिंट-संस्कृति का एक नया केंद्र बन गया。
जापान में मुद्रण कैसे पहुँचा?
चीनी बौद्ध प्रचारक 768-770 ईस्वी के आसपास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए। जापान की सबसे पुरानी पुस्तक ‘डायमंड सूत्र’ है, जो 868 ईस्वी में छपी थी। इसमें पाठ के साथ-साथ काठ (लकड़ी) पर खुदे हुए चित्र भी मौजूद हैं。
अठारहवीं सदी के अंत में, एदो (जिसे आज तोक्यो कहा जाता है) के शहरी इलाके की संस्कृति बहुत विकसित हो गई थी। यहाँ की दुकानें और पुस्तकालय महिलाओं, संगीत के साज़ों, चाय अनुष्ठान और रसोई पर लिखी किताबों से भरे पड़े थे। कितागावा उतामारो जैसे चित्रकारों ने आम शहरी जीवन का चित्रण करने के लिए ‘उकियो’ (तैरती दुनिया के चित्र) नाम की एक नई चित्रकला शैली विकसित की थी。
कोरिया की मुद्रण कला क्या थी?
कोरिया में 13वीं शताब्दी के मध्य में ‘त्रिपीटका कोरियाना’ नामक बौद्ध ग्रंथों का संग्रह तैयार किया गया, जिसे लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था। इसके अलावा, कोरिया की ‘जिक्जी’ (Jikji) नामक पुस्तक मूवेबल मेटल टाइप (Movable metal type) से मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक है, जिसे 14वीं शताब्दी के अंत में छापा गया था。
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अध्याय 5 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- You are Reading Here: शुरुआती छपी किताबें: चीन, जापान और कोरिया की कहानी
- भाग 2: यूरोप में मुद्रण का आना और गुटेन्बर्ग प्रेस
- भाग 3: मुद्रण क्रांति और उसका असर: पाठक वर्ग और धार्मिक विवाद
- भाग 4: भारत में मुद्रण का संसार और शुरुआती छपाई
- भाग 5: भारत में प्रेस, महिलाएँ, गरीब जनता और सेंसरशिप