कक्षा 10 इतिहास की हमारी इस यात्रा में आपका पुनः स्वागत है। पिछले भाग में हमने जाना था कि छपाई की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई थी।
लेकिन आज हम जिस छपाई मशीन (Printing Press) को देखते हैं, वह पूर्वी एशिया से निकलकर यूरोप कैसे पहुँची? और यूरोप के लोगों ने किताबों को कैसे अपनाया? आइए इस भाग में हम ‘मार्को पोलो’ की यात्रा, अमीर लोगों के चोंचलों और ‘योहान गुटेन्बर्ग’ के उस महान आविष्कार के बारे में पढ़ते हैं जिसने पूरी दुनिया को बदल कर रख दिया!
मुद्रण की तकनीक यूरोप कैसे पहुँची?
ग्यारहवीं सदी में सिल्क मार्ग (रेशम मार्ग) से चीनी कागज़ यूरोप पहुँचा था। लेकिन छपाई की तकनीक यूरोप पहुँचने में थोड़ा और समय लगा। 1295 ईस्वी में मार्को पोलो नामक एक महान खोजी यात्री चीन में कई सालों तक खोज करने के बाद वापस अपने देश इटली लौटा।
मार्को पोलो चीन से अपने साथ ‘वुडब्लॉक’ (काठ की तख्ती) वाली छपाई की तकनीक भी लेकर आया। इसके बाद इतालवी लोग भी तख्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बाक़ी पूरे यूरोप में फैल गई।
अमीर लोग छपी किताबें क्यों नहीं पढ़ते थे?
हालाँकि छपाई की तकनीक आ गई थी, लेकिन यूरोप के कुलीन वर्गों (अमीर लोगों) और भिक्षु संघों को छपी हुई किताबें पसंद नहीं थीं। वे मुद्रित किताबों को सस्ता और अश्लील मानते थे।
अमीर लोग केवल हाथ से लिखी गई पुरानी पांडुलिपियों को ही पढ़ना अपनी शान समझते थे। ये विलासी संस्करण एक विशेष और बहुत महँगे कागज़ पर लिखे जाते थे जिसे ‘वीलम’ (Vellum) कहा जाता था। वीलम जानवरों के चमड़े (चर्म-पत्र) से बनाया जाता था। सस्ती मुद्रित किताबें केवल व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी ही खरीदते थे।
पांडुलिपियों में क्या समस्याएँ थीं?
जैसे-जैसे यूरोप में किताबों की माँग बढ़ी, केवल हाथ से लिखकर (पांडुलिपियों से) इस माँग को पूरा करना असंभव हो गया। हस्तलिखित पांडुलिपियों की नक़ल उतारना बेहद ख़र्चीला, समयसाध्य और श्रमसाध्य काम था। ये किताबें बहुत नाजुक होती थीं, इसलिए इन्हें लाने-ले जाने और रख-रखाव में भारी मुश्किलें आती थीं। इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा किताबें छापने के लिए एक तेज़ और सस्ती मशीन की ज़रूरत थी।
योहान गुटेन्बर्ग और आधुनिक छापाखाना
यह तेज़ छपाई 1430 के दशक में संभव हुई जब योहान गुटेन्बर्ग ने जर्मनी के स्ट्रैसबर्ग में आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस (छापेखाने) का आविष्कार किया।
गुटेन्बर्ग के पिता एक व्यापारी थे और वह बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें (Olive Press) देखता आया था। उसने शीशे को आकृतियों में गढ़ने की कला भी सीखी थी। अपने ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए उसने ‘जैतून प्रेस’ को ही अपने प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल (आदर्श) बनाया, और शीशे के साँचों का उपयोग करके अक्षरों की धातुई आकृतियाँ गढ़ीं।
गुटेन्बर्ग द्वारा छापी गई पहली किताब कौन सी थी?
गुटेन्बर्ग ने 1448 तक अपना यह यंत्र मुकम्मल कर लिया था। उसने इस आधुनिक प्रेस में जो सबसे पहली किताब छापी, वह थी ‘बाइबल’। इसकी तक़रीबन 180 प्रतियाँ बनाने में उसे तीन साल लगे, जो उस समय के हिसाब से काफ़ी तेज़ था!
दिलचस्प बात यह है कि शुरू-शुरू में छपी किताबें भी अपने रंग-रूप में हाथ से लिखी पांडुलिपियों जैसी ही दिखती थीं। गुटेन्बर्ग ने इबारत (पाठ) को काले रंग में छापा, लेकिन पन्नों के किनारे (हाशिये) खाली छोड़ दिए, ताकि अमीर लोग अपनी पसंद के चित्रकारों से वहाँ हाथ से डिज़ाइन बनवा सकें और रंग भरवा सकें।
मुद्रण क्रांति की शुरुआत कैसे हुई?
क़रीब सौ सालों (1450-1550) के बीच यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेखाने लग गए थे। जर्मनी के मुद्रक (प्रिंटर) दूसरे देशों में जाकर नए छापेखाने खुलवाते थे।
पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में यूरोप के बाज़ार में 2 करोड़ मुद्रित किताबें आईं और सोलहवीं सदी आते-आते यह संख्या 20 करोड़ हो गई। हाथ की छपाई की जगह मशीनी छपाई (यांत्रिक मुद्रण) के इसी तेज़ बदलाव को इतिहास में ‘मुद्रण क्रांति’ कहा जाता है।
अब खेलें: यूरोप में मुद्रण क्विज़
अब नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और मार्को पोलो, वीलम, गुटेन्बर्ग और बाइबल की छपाई पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण इतिहास प्रश्नों का अभ्यास करें!
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अध्याय 5 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: शुरुआती छपी किताबें: चीन, जापान और कोरिया की कहानी
- You are Reading Here: यूरोप में मुद्रण का आना और गुटेन्बर्ग प्रेस
- भाग 3: मुद्रण क्रांति और उसका असर: पाठक वर्ग और धार्मिक विवाद
- भाग 4: भारत में मुद्रण का संसार और शुरुआती छपाई
- भाग 5: भारत में प्रेस, महिलाएँ, गरीब जनता और सेंसरशिप