छपाई की तकनीक ने केवल अमीर लोगों या धर्मगुरुओं को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि इसने महिलाओं और समाज के सबसे निचले व गरीब तबके को भी एक नई आवाज़ दी। लेकिन जब ये आवाज़ें अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ उठने लगीं, तो सरकार ने प्रेस पर पाबंदियाँ लगा दीं। आइए इस अंतिम भाग में महिलाओं, मज़दूरों और अंग्रेज़ों की ‘सेंसरशिप’ की कहानी पढ़ते हैं!
महिलाओं का जीवन और मुद्रण
मुद्रण संस्कृति ने महिलाओं की ज़िंदगी में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया। कई महिलाओं ने छपे हुए शब्दों के जरिए अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुँचाई। रूढ़िवादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी लड़की विधवा हो जाती है, और मुस्लिम मानते थे कि उर्दू के रोमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी। इसके बावजूद कई महिलाओं ने छुपकर पढ़ना सीखा।
कुछ प्रमुख लेखिकाएँ और उनकी किताबें:
- रससुंदरी देवी: बंगाल की इस महिला ने रसोई में छुपकर पढ़ना सीखा और 1876 में ‘अमर जीबन’ (Amar Jiban) नामक आत्मकथा लिखी। यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्मकथा थी।
- कैलाशबाशिनी देवी: 1860 के दशक में इन्होंने महिलाओं के घरेलू जीवन और उनके कठोर परिश्रम के बारे में लिखा।
- ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई: 1880 के दशक में महाराष्ट्र की इन महिलाओं ने उच्च जाति की हिंदू महिलाओं और विधवाओं के दयनीय जीवन को लेकर बहुत कड़ी आलोचना लिखी।
पंजाब में राम चड्ढा ने औरतों को आज्ञाकारी बीवी बनने की सीख देने के लिए ‘स्त्री धर्म विचार’ नामक किताब लिखी, जो बहुत बिकी।
गरीब जनता और छपी किताबें
उन्नीसवीं सदी के अंत तक बाज़ारों में किताबें बहुत सस्ती हो गई थीं, जिन्हें गरीब लोग भी खरीद सकते थे। शहरों और कस्बों में अमीर लोगों द्वारा ‘सार्वजनिक पुस्तकालय’ (Public Libraries) खोले गए, जिससे किताबों तक आम लोगों की पहुँच और आसान हो गई।
जाति प्रथा का विरोध और मज़दूरों की आवाज़:
- ज्योतिबा फुले: महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक समाज’ के संस्थापक ज्योतिबा फुले ने 1871 में ‘गुलामगिरी’ (Gulamgiri) नामक किताब लिखी, जिसमें उन्होंने जाति प्रथा के अन्याय पर ज़ोरदार प्रहार किया।
- बी.आर. आंबेडकर और ई.वी. रामास्वामी नायकर: बीसवीं सदी में डॉ. आंबेडकर (महाराष्ट्र) और रामास्वामी नायकर (जिन्हें पेरियार कहा जाता था, मद्रास) ने भी जाति व्यवस्था के खिलाफ बहुत सी किताबें और लेख लिखे।
- काशीबाबा: कानपुर के एक मिल मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में ‘छोटे और बड़े का सवाल’ नाम की किताब लिखी और छापी, जिसमें उन्होंने जातीय और वर्गीय शोषण के बीच का रिश्ता समझाया।
भारत में सेंसरशिप और पाबंदियाँ
शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी प्रेस पर पाबंदी लगाने के पक्ष में नहीं थी। लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ सरकार का रवैया पूरी तरह बदल गया। जब देशी भाषाओं (वर्नाक्यूलर) के अखबारों में अंग्रेज़ों के खिलाफ ‘राष्ट्रवादी’ विचार छपने लगे, तो सरकार घबरा गई।
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878)
देशी अखबारों पर लगाम कसने के लिए 1878 में ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ (देशी प्रेस कानून) लागू किया गया। यह कानून आयरिश प्रेस कानून पर आधारित था। इस कानून ने सरकार को यह शक्ति दे दी कि वह किसी भी ऐसे अखबार की छपाई मशीन और संपत्ति को ज़ब्त कर सकती थी, जो सरकार के खिलाफ भड़काऊ लेख छापता हो।
लेकिन इन पाबंदियों के बावजूद राष्ट्रवादी अखबार बढ़ते रहे। जब 1907 में पंजाब के क्रांतिकारियों को काला पानी (देश निकाला) भेजा गया, तो बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार ‘केसरी’ में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई। इसके कारण अंग्रेज़ सरकार ने 1908 में तिलक को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया, जिसके विरोध में पूरे भारत में भयंकर प्रदर्शन हुए।
अब खेलें: प्रेस, महिलाएँ और सेंसरशिप क्विज़
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अध्याय 5 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: शुरुआती छपी किताबें: चीन, जापान और कोरिया की कहानी
- भाग 2: यूरोप में मुद्रण का आना और गुटेन्बर्ग प्रेस
- भाग 3: मुद्रण क्रांति और उसका असर: पाठक वर्ग और धार्मिक विवाद
- भाग 4: भारत में मुद्रण का संसार और शुरुआती छपाई
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