हमारी पृथ्वी एक अत्यंत विशाल और विविध ग्रह है जहाँ हम सूक्ष्म जीवाणुओं, बैक्टीरिया, जोंक से लेकर वटवृक्ष, हाथी और ब्लू व्हेल तक करोड़ों दूसरे जीवधारियों के साथ रहते हैं[cite: 1]। यह पूरा आवासीय स्थल जिस पर हम निवास करते हैं, अत्यधिक जैव-विविधताओं से भरा हुआ है[cite: 1]। मानव और दूसरे जीवधारी मिलकर एक अत्यंत जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं[cite: 1]। हम मनुष्य इस विशाल तंत्र का मात्र एक छोटा सा हिस्सा हैं और अपने अस्तित्व के लिए इसके विभिन्न तत्त्वों पर पूरी तरह से निर्भर करते हैं[cite: 1]।
पारिस्थितिकी तंत्र में वनों की भूमिका
वन पारिस्थितिकी तंत्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं[cite: 1]। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- वन पर्यावरण के प्राथमिक उत्पादक हैं जिन पर दूसरे सभी सजीव प्राणी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर करते हैं[cite: 1]।
- पौधे, पशु और सूक्ष्मजीवी पर्यावरण में जल, वायु और मृदा का पुनः सृजन करते हैं, जिनके बिना हमारा जीवित रहना असंभव है[cite: 1]।
- वन्य जीवन और कृषि फसल उपजातियों में अत्यधिक जैव विविधताएँ पाई जाती हैं जो एक जटिल जाल द्वारा आपस में गुँथी हुई हैं[cite: 1]।
भारत में जैव विविधता की स्थिति
यदि हम अपने आस-पास नज़र दौड़ाते हैं, तो हम पाते हैं कि कुछ प्राणी और पौधे केवल हमारे क्षेत्र विशेष में ही पाए जाते हैं[cite: 1]। वास्तव में भारत दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में से एक है[cite: 1]। हमारे देश में विश्व की सारी जैव उपजातियों की लगभग 8 प्रतिशत संख्या पाई जाती है, जो कि लगभग 16 लाख के बराबर है[cite: 1]। यह संख्या अभी खोजी जाने वाली नई उपजातियों से दो या तीन गुना अधिक है[cite: 1]!
पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता
ये विविध वनस्पतिजात (पेड़-पौधे) और प्राणिजात (जीव-जंतु) हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इतने गहरे गुँथे हुए हैं कि हम अक्सर इनकी अहमियत की कद्र नहीं करते[cite: 1]। पिछले कुछ समय से पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदना और लापरवाही के कारण इन प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ा है[cite: 1]। वन्य जीवन और वनों में तेज गति से हो रहे ह्रास के कारण आज इनका संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक हो गया है[cite: 1]।
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