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भाग 3: वर्षा जल संग्रहण की पारंपरिक और आधुनिक विधियाँ

कक्षा 10 भूगोल के अध्याय 3 ‘जल संसाधन’ के इस अंतिम भाग में आपका स्वागत है। पिछले भाग में हमने पढ़ा कि बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ और बड़े बाँध किस प्रकार कई पर्यावरणीय और सामाजिक विवादों का कारण बन गए हैं। इन परियोजनाओं के अलाभप्रद असर और उठने वाले विवादों के चलते, आज ‘वर्षा जल संग्रहण’ (Rainwater Harvesting) को एक बहुत ही शानदार, सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प माना जाता है। भारत में प्राचीन काल से ही वर्षा के जल को सहेजने की समृद्ध परंपरा रही है। हमारे पूर्वजों को वर्षा की पद्धति और मिट्टी के गुणों का बहुत गहरा ज्ञान था। आइए, भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनाए जाने वाले वर्षा जल संग्रहण के पारंपरिक और आधुनिक तरीकों के बारे में विस्तार से पढ़ें।

विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण के तरीके

भारत की भौगोलिक विविधता के कारण, यहाँ के लोगों ने अपनी स्थानीय पारिस्थितिकीय परिस्थितियों और जल की आवश्यकता के अनुसार वर्षा जल, भौमजल (Groundwater), नदी जल और बाढ़ के जल को इकट्ठा करने के कई अनूठे तरीके विकसित किए हैं:

1. पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में

पश्चिमी हिमालय जैसे पहाड़ी और पर्वतीय इलाकों में लोग खेतों की सिंचाई के लिए नदी की मुख्य धारा का रास्ता बदलकर छोटी-छोटी वाहिकाएँ (नहरें) बनाते हैं। इन छोटी वाहिकाओं को स्थानीय भाषा में ‘गुल’ अथवा ‘कुल’ कहा जाता है।

2. बाढ़ के मैदानों और कृषि क्षेत्रों में

पश्चिम बंगाल में बाढ़ के मैदानों में रहने वाले लोग अपने खेतों की सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ (Inundation channels) बनाते थे। वहीं, शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बारिश के पानी को खेतों में ही रोकने के लिए बड़े गड्ढे बनाए जाते हैं, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और पानी ज़मीन के नीचे जा सके। राजस्थान के जैसलमेर जिले में इन्हें ‘खादीन’ और अन्य इलाकों में ‘जोहड़’ कहा जाता है।

छत वर्षा जल संग्रहण (Rooftop Rainwater Harvesting)

राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों, विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में, पीने का पानी इकट्ठा करने के लिए ‘छत वर्षा जल संग्रहण’ का तरीका बहुत आम रहा है। यहाँ लगभग हर घर में पीने का पानी सुरक्षित रखने के लिए एक भूमिगत टैंक बनाया जाता है, जिसे ‘टाँका’ कहते हैं।

  • इन टाँकों का आकार एक बड़े कमरे जितना हो सकता है। इन्हें घर के मुख्य आँगन में बनाया जाता है।
  • ये घर की ढलवाँ छतों से पी.वी.सी (PVC) पाइप द्वारा जुड़े होते हैं। छत पर गिरने वाला बारिश का पानी इन पाइपों से होकर भूमिगत टाँका तक पहुँचता है।
  • वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में प्रयोग होता है, इसलिए उसे इकट्ठा नहीं किया जाता। इसके बाद होने वाली बारिश का पानी सहेजा जाता है।
  • इन क्षेत्रों में बारिश के पानी को ‘पालर पानी’ कहा जाता है और इसे प्राकृतिक जल का सबसे शुद्ध रूप माना जाता है।

आज के समय में इंदिरा गांधी नहर के आ जाने से राजस्थान के कुछ हिस्सों में इस प्रणाली का चलन कम हुआ है, लेकिन फिर भी कई घरों में यह आज भी मौजूद है क्योंकि लोगों को नल के पानी का स्वाद पसंद नहीं आता।

वर्षा जल संग्रहण के कुछ रोचक तथ्य

भारत के अन्य राज्यों में भी जल संग्रहण के कुछ बेहतरीन और रोचक उदाहरण देखने को मिलते हैं:

  • मेघालय (शिलांग): मेघालय में चेरापूँजी और मॉसिनराम में दुनिया की सबसे ज़्यादा बारिश होती है, फिर भी इससे महज़ 55 किलोमीटर दूर स्थित राजधानी शिलांग में पीने के पानी की भारी कमी है। इसलिए, शिलांग के लगभग हर घर में छत वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था है। इसके अलावा, यहाँ झरनों के पानी को बाँस के पाइपों (Bamboo Drip Irrigation) द्वारा खेतों तक ले जाने की 200 साल पुरानी विधि भी प्रचलित है।
  • कर्नाटक (गंडाथूर): मैसूरु जिले के गंडाथूर गाँव के लगभग 200 घरों ने अपने यहाँ छत वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था की है। इस गाँव ने ‘वर्षा जल संपन्न गाँव’ की ख्याति अर्जित की है।
  • तमिलनाडु: तमिलनाडु पूरे भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने पूरे राज्य में हर घर के लिए छत वर्षा जल संग्रहण ढाँचा बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया है। नियम न मानने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है।
👨‍🏫 शिक्षक की सलाह: बोर्ड परीक्षा में ‘राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण किस प्रकार किया जाता है?’ यह प्रश्न बहुत बार पूछा जाता है। अपने उत्तर में ‘टाँका’ प्रणाली और ‘पालर पानी’ का ज़िक्र ज़रूर करें। इसके साथ ही ‘गुल और कुल’ तथा ‘खादीन और जोहड़’ की परिभाषाएँ भी अच्छे से याद कर लें।

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